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Jhalawar News: मां की तलाश में साधु बन गया बेटा, बरसों बाद पुनर्वास गृह ने कराया मिलन, घर लौटी खुशियां

न्यूज डेस्क, अमर उजाला, झालावाड़ Published by: झालावाड़ ब्यूरो Updated Sat, 13 Jun 2026 09:20 PM IST
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सार

बरसों से मां की तलाश में भटक रहे बेटे की उम्मीद आखिरकार रंग लाई। बिहार से झालावाड़ पहुंचे गोपीचंद जब अपनी मां से मिले तो दोनों की आंखों से खुशी के आंसू छलक पड़े और वहां मौजूद हर शख्स भावुक हो गया।

Jhalawar News: Son lived like a hermit searching for his mother, reunited after years by rehabilitation home
बिछुड़ी मा से मिला बेटा बिहार से आया झालावाड़ - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

कहते हैं कि उम्मीद जिंदा हो तो बिछड़े रिश्ते भी एक दिन फिर मिल जाते हैं। ऐसा ही एक भावुक और हृदयस्पर्शी दृश्य साईं मानसिक मुख्यमंत्री पुनर्वास गृह, झालावाड़ में देखने को मिला, जहां वर्षों से परिवार से बिछड़ी एक बुजुर्ग महिला आखिरकार अपने बेटे से मिल सकी। इस मार्मिक पुनर्मिलन ने वहां मौजूद हर व्यक्ति की आंखें नम कर दीं।


सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता विभाग के अधिकारी रामनिवास यादव तथा योगिता उद्यमिता एवं विकास संस्थान की संचालिका प्रतिमा सिंह चौहान के नेतृत्व में संचालित साईं मानसिक मुख्यमंत्री पुनर्वास गृह में महिला पुलिस थाना, झालावाड़ द्वारा एक बुजुर्ग महिला को लाया गया। बाद में उनकी पहचान बासमती देवी के रूप में हुई। पुलिस अधिकारियों के अनुसार बासमती देवी रात के समय शहर की सड़कों पर भूखी-प्यासी, भयभीत अवस्था में और नंगे पैर भटकती हुई मिली थीं। उनके पास कोई पहचान पत्र नहीं था और न ही वे अपने परिवार के बारे में कोई स्पष्ट जानकारी दे पा रही थीं। ऐसे में उनकी सुरक्षा और देखभाल को ध्यान में रखते हुए उन्हें पुनर्वास गृह में आश्रय दिया गया।
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पुनर्वास गृह पहुंचने पर संचालिका प्रतिमा सिंह चौहान और संस्था मैनेजर सौरभ सिंह ने उनकी पहचान और परिवार के बारे में जानकारी जुटाने का प्रयास किया लेकिन उनकी मानसिक स्थिति अत्यंत खराब होने के कारण वे अपने बारे में कुछ भी स्पष्ट नहीं बता पा रही थीं। इसके बावजूद संस्था ने हार नहीं मानी। बासमती देवी को आश्रय, भोजन, चिकित्सा सुविधा और नियमित देखभाल उपलब्ध कराई गई। संस्था मैनेजर सौरभ सिंह लगातार 15 दिनों तक धैर्य और संवेदनशीलता के साथ उनसे बातचीत करते रहे, ताकि उनके परिवार तक पहुंचने का कोई सुराग मिल सके।
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संस्था सचिव प्रतिमा सिंह चौहान ने बताया कि पुनर्वास गृह में मिले अपनत्व, नियमित चिकित्सा और सेवा के कारण बासमती देवी के मानसिक स्वास्थ्य में धीरे-धीरे सुधार होने लगा। कुछ दिनों बाद वे छोटी-छोटी बातें याद करने लगीं। बातचीत के दौरान वे बार-बार केवल एक ही वाक्य दोहराती थीं- "हरि नगर कॉलोनी, बंगाली टोला"। यही शब्द संस्था के लिए उम्मीद की किरण बन गए। हालांकि इतनी सीमित जानकारी के आधार पर परिवार तक पहुंचना आसान नहीं था लेकिन संस्था मैनेजर सौरभ सिंह ने इसे चुनौती के रूप में स्वीकार किया। सौरभ सिंह ने इंटरनेट और अन्य माध्यमों की मदद से देशभर में मौजूद ‘हरि नगर’ और ‘बंगाली टोला’ नामक स्थानों की जानकारी जुटानी शुरू की। कई जगह संपर्क करने और लगातार खोजबीन के बाद पता चला कि बिहार के पश्चिमी चंपारण जिले में ‘बंगाली टोला, हरि नगर’ नामक क्षेत्र मौजूद है।

वहां संपर्क स्थापित कर स्थानीय लोगों और पड़ोसियों से बातचीत की गई। वीडियो कॉल के माध्यम से बासमती देवी की तस्वीर दिखाई गई। तस्वीर देखते ही पड़ोसियों ने उन्हें पहचान लिया और बताया कि वे गोपीचंद की मां हैं, जो बरसों पहले परिवार से बिछड़ गई थीं। पड़ोसियों ने यह भी बताया कि मां के लापता होने के बाद गोपीचंद लगातार उनकी तलाश करते रहे और इस दुख में उन्होंने लगभग साधु जैसा जीवन अपना लिया था।

पुनर्वास गृह की ओर से गोपीचंद से संपर्क किया गया। जब उन्हें बताया गया कि उनकी मां सुरक्षित हैं और झालावाड़ के मुख्यमंत्री पुनर्वास गृह में रह रही हैं, तो उनकी खुशी का ठिकाना नहीं रहा। मां के मिलने की खबर मिलते ही गोपीचंद बिना समय गंवाए बिहार से झालावाड़ के लिए रवाना हो गए। जैसे ही गोपीचंद पुनर्वास गृह पहुंचे और उनकी नजर अपनी मां पर पड़ी, दोनों एक-दूसरे से लिपटकर फूट-फूटकर रो पड़े। वर्षों का बिछोह, दर्द और इंतजार मानो उस एक पल में आंसुओं के रूप में बह निकला।

मां की आंखों में बेटे को देखकर जो चमक थी, वह शब्दों में बयान नहीं की जा सकती थी। वहीं बेटे की आंखों में वर्षों बाद मां को पाने की खुशी साफ दिखाई दे रही थी। इस भावुक दृश्य को देखकर पुनर्वास गृह का पूरा परिसर भावनाओं से भर गया। वहां मौजूद अधिकारी, कर्मचारी और अन्य लोग भी अपनी भावनाएं नहीं रोक सके।

गोपीचंद ने महिला प्रभारी अमरीन कौसर, संचालिका प्रतिमा सिंह चौहान, संस्था मैनेजर सौरभ सिंह और पूरे स्टाफ का आभार व्यक्त किया। भावुक होकर उन्होंने कहा, जब से मेरी मां लापता हुई थीं, तब से मैं उनकी तलाश में भटकता रहा। मैंने प्रण लिया था कि मां के मिलने तक साधु वेश नहीं छोड़ूंगा। यह केवल मेरी मां से मिलने की कहानी नहीं है, बल्कि उन लोगों की मेहनत, सेवा और मानवता की जीत है, जिन्होंने मुझे मेरी मां वापस लौटा दी। मैं जीवनभर उनका ऋणी रहूंगा।
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