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हिमाचल: सूचना देने वाले को पीटना और अवैध हिरासत में रखना ड्यूटी नहीं, पुलिस अधिकारी पर चलेगा मुकदमा

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 28 Apr 2026 05:00 AM IST
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सार

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी सूचना देने वाले के साथ मारपीट करता है या उसे अवैध रूप से हिरासत में रखता है, तो इसे आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता। 

Beating an Informant and Holding Them in Illegal Custody Is Not Part of Duty; Police Officer to Face Prosecuti
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया है कि यदि कोई पुलिस अधिकारी किसी सूचना देने वाले के साथ मारपीट करता है या उसे अवैध रूप से हिरासत में रखता है, तो इसे आधिकारिक कर्तव्य का हिस्सा नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने कहा कि ऐसे मामलों में आरोपी पुलिसकर्मी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 197 के तहत सरकार से पूर्व अनुमति लेने की आवश्यकता नहीं है। न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने आरोपी पुलिस अधिकारी को मिली डिस्चार्ज की राहत को रद्द करते हुए ट्रायल कोर्ट को मामले में आगे बढ़ने के निर्देश दिए हैं। यह मामला मार्च 2016 का है, जब याचिकाकर्ता नितेश गुप्ता ने सड़क पर कुछ लोगों द्वारा एक व्यक्ति की पिटाई होते देखी थी। एक जागरूक नागरिक के नाते उन्होंने इसकी सूचना पुलिस को दी। मदद करने के बजाय तत्कालीन थाना प्रभारी बालूगंज वीरी सिंह ने सूचना देने वाले को ही थाने बुलाकर प्रताड़ित किया। आरोप था कि नितेश को रातभर थाने में रखा गया, उनके साथ मारपीट की गई, मोबाइल छीन लिया गया और उनकी पत्नी के साथ भी दुर्व्यवहार हुआ। पुलिस ने उल्टा नितेश के खिलाफ ही झूठी सूचना देने का मामला दर्ज कर दिया। मामले की गंभीरता को देखते हुए पुलिस महानिदेशक से जांच कराई।

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जांच रिपोर्ट में शिकायतकर्ता द्वारा दी गई जानकारी बिल्कुल सही पाई गई। एसएचओ ने गवाहों की मौजूदगी में शिकायतकर्ता को पीटा। मेडिकल रिपोर्ट में शिकायतकर्ता के शरीर पर चोटों की पुष्टि हुई। मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट और अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, शिमला ने आरोपी पुलिस अधिकारी को इस आधार पर छोड़ दिया था कि उसके खिलाफ सीआरपीसी की धारा 197 के तहत प्रॉसिक्यूशन सेंक्शन (सरकारी अनुमति) नहीं ली गई थी। कानून के अनुसार यदि कोई लोक सेवक अपनी ड्यूटी के दौरान कोई अपराध करता है, तो उस पर मुकदमा चलाने के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी होती है। हाईकोर्ट ने कहा कि सरकारी कर्तव्य के नाम पर किए गए कार्यों को अपराध करने की ढाल नहीं बनाया जा सकता। धारा 197 सीआरपीसी का उद्देश्य ईमानदार अधिकारियों को परेशान होने से बचाना है, न कि उन्हें आपराधिक गतिविधियों की खुली छूट देना। किसी बेकसूर नागरिक को पीटना या उसे अवैध हिरासत में रखना किसी भी तरह से पुलिस की ड्यूटी नहीं हो सकती। चूंकि मारपीट और उत्पीड़न ड्यूटी का हिस्सा नहीं है, इसलिए इस मामले में आरोपी के खिलाफ मुकदमा चलाने के लिए धारा 197 के तहत सरकारी मंजूरी की आवश्यकता नहीं है।

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