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Shimla News: एनईपी लागू होते ही कॉलेज शिक्षकों पर बढ़ा बहुस्तरीय अकादमिक दायित्व
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पढ़ाई के साथ इंटर्नशिप, फील्ड प्रोजेक्ट, सामुदायिक कार्य और शोध मूल्यांकन की जिम्मेदारी
चौथे वर्ष में शोध मार्गदर्शन भी करना होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 के तहत लागू नई स्नातक व्यवस्था ने सरकारी महाविद्यालयों में शिक्षकों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव कर दिया है। अब शिक्षक केवल कक्षाएं लेने और परीक्षा कराने तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्हें विद्यार्थियों की इंटर्नशिप, फील्ड आधारित परियोजनाओं, सामुदायिक सहभागिता गतिविधियों और शोध कार्य की निगरानी भी करनी होगी।
विश्वविद्यालय की नई शैक्षणिक संरचना के अनुसार प्रत्येक पाठ्यक्रम में सतत मूल्यांकन को अनिवार्य बनाया गया है। इसके तहत शिक्षकों को विद्यार्थियों की उपस्थिति, असाइनमेंट, प्रस्तुतियां, कक्षा परीक्षण और अन्य अकादमिक गतिविधियों का रिकॉर्ड तैयार करना होगा। प्रत्येक पेपर में आंतरिक मूल्यांकन का हिस्सा होने के कारण पूरे सेमेस्टर के दौरान विद्यार्थियों के प्रदर्शन का आकलन करना भी शिक्षकों की जिम्मेदारी होगी।
नई व्यवस्था में विद्यार्थियों के लिए 120 घंटे की इंटर्नशिप, 120 घंटे का फील्ड आधारित प्रोजेक्ट और 120 घंटे की सामुदायिक सहभागिता गतिविधि निर्धारित की गई है। इन गतिविधियों की योजना, पर्यवेक्षण, प्रगति की समीक्षा और मूल्यांकन संबंधित विभागों के शिक्षकों को करना होगा। विद्यार्थियों की ओर से तैयार की जाने वाली रिपोर्टों, प्रस्तुतियों और वाइवा का दायित्व भी शिक्षकों पर रहेगा। चार वर्षीय ऑनर्स और ऑनर्स विद रिसर्च कार्यक्रमों ने शिक्षकों के लिए अतिरिक्त अकादमिक जिम्मेदारियां निर्धारित की हैं। अंतिम वर्ष में विद्यार्थियों को 360 घंटे का शोध कार्य पूरा करना होगा। शोध प्रस्ताव तैयार करने, शोध पद्धति समझाने, प्रगति की समीक्षा करने और शोध प्रबंध के मूल्यांकन की प्रक्रिया में शिक्षकों की सीधी भूमिका रहेगी। जिन विषयों में ऑनर्स विद रिसर्च कार्यक्रम संचालित होंगे, वहां मान्यता प्राप्त पीएचडी पर्यवेक्षक शोध मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे।
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नई व्यवस्था के तहत विद्यार्थियों को मेजर, माइनर, कौशल आधारित और बहुविषयक पाठ्यक्रमों का विकल्प दिया गया है। इससे विभिन्न विभागों के बीच अकादमिक समन्वय की आवश्यकता भी बढ़ गई है। समय सारिणी निर्माण, क्रेडिट प्रबंधन और पाठ्यक्रम संचालन में शिक्षकों को पहले की तुलना में अधिक समन्वित ढंग से कार्य करना होगा। एनईपी के पूर्ण क्रियान्वयन के साथ प्रदेश के महाविद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था अब केवल कक्षा आधारित मॉडल तक सीमित नहीं रहेगी। इंटर्नशिप, परियोजना, शोध और सतत मूल्यांकन को अकादमिक ढांचे का अनिवार्य हिस्सा बनाए जाने से शिक्षकों की भूमिका शिक्षण से आगे बढ़कर अकादमिक मार्गदर्शन और शोध पर्यवेक्षण तक विस्तारित हो गई है।
चौथे वर्ष में शोध मार्गदर्शन भी करना होगा
संवाद न्यूज एजेंसी
शिमला। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी)-2020 के तहत लागू नई स्नातक व्यवस्था ने सरकारी महाविद्यालयों में शिक्षकों की कार्यप्रणाली में बड़ा बदलाव कर दिया है। अब शिक्षक केवल कक्षाएं लेने और परीक्षा कराने तक सीमित नहीं रहेंगे। उन्हें विद्यार्थियों की इंटर्नशिप, फील्ड आधारित परियोजनाओं, सामुदायिक सहभागिता गतिविधियों और शोध कार्य की निगरानी भी करनी होगी।
विश्वविद्यालय की नई शैक्षणिक संरचना के अनुसार प्रत्येक पाठ्यक्रम में सतत मूल्यांकन को अनिवार्य बनाया गया है। इसके तहत शिक्षकों को विद्यार्थियों की उपस्थिति, असाइनमेंट, प्रस्तुतियां, कक्षा परीक्षण और अन्य अकादमिक गतिविधियों का रिकॉर्ड तैयार करना होगा। प्रत्येक पेपर में आंतरिक मूल्यांकन का हिस्सा होने के कारण पूरे सेमेस्टर के दौरान विद्यार्थियों के प्रदर्शन का आकलन करना भी शिक्षकों की जिम्मेदारी होगी।
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नई व्यवस्था में विद्यार्थियों के लिए 120 घंटे की इंटर्नशिप, 120 घंटे का फील्ड आधारित प्रोजेक्ट और 120 घंटे की सामुदायिक सहभागिता गतिविधि निर्धारित की गई है। इन गतिविधियों की योजना, पर्यवेक्षण, प्रगति की समीक्षा और मूल्यांकन संबंधित विभागों के शिक्षकों को करना होगा। विद्यार्थियों की ओर से तैयार की जाने वाली रिपोर्टों, प्रस्तुतियों और वाइवा का दायित्व भी शिक्षकों पर रहेगा। चार वर्षीय ऑनर्स और ऑनर्स विद रिसर्च कार्यक्रमों ने शिक्षकों के लिए अतिरिक्त अकादमिक जिम्मेदारियां निर्धारित की हैं। अंतिम वर्ष में विद्यार्थियों को 360 घंटे का शोध कार्य पूरा करना होगा। शोध प्रस्ताव तैयार करने, शोध पद्धति समझाने, प्रगति की समीक्षा करने और शोध प्रबंध के मूल्यांकन की प्रक्रिया में शिक्षकों की सीधी भूमिका रहेगी। जिन विषयों में ऑनर्स विद रिसर्च कार्यक्रम संचालित होंगे, वहां मान्यता प्राप्त पीएचडी पर्यवेक्षक शोध मार्गदर्शक की भूमिका निभाएंगे।
नई व्यवस्था के तहत विद्यार्थियों को मेजर, माइनर, कौशल आधारित और बहुविषयक पाठ्यक्रमों का विकल्प दिया गया है। इससे विभिन्न विभागों के बीच अकादमिक समन्वय की आवश्यकता भी बढ़ गई है। समय सारिणी निर्माण, क्रेडिट प्रबंधन और पाठ्यक्रम संचालन में शिक्षकों को पहले की तुलना में अधिक समन्वित ढंग से कार्य करना होगा। एनईपी के पूर्ण क्रियान्वयन के साथ प्रदेश के महाविद्यालयों में शिक्षण व्यवस्था अब केवल कक्षा आधारित मॉडल तक सीमित नहीं रहेगी। इंटर्नशिप, परियोजना, शोध और सतत मूल्यांकन को अकादमिक ढांचे का अनिवार्य हिस्सा बनाए जाने से शिक्षकों की भूमिका शिक्षण से आगे बढ़कर अकादमिक मार्गदर्शन और शोध पर्यवेक्षण तक विस्तारित हो गई है।