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हिमाचल: मूक बधिर होने का मतलब मानसिक अस्वस्थ नहीं, हाईकोर्ट ने खारिज की दलीलें

संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला। Published by: Krishan Singh Updated Tue, 19 May 2026 10:52 AM IST
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सार

प्रदेश हाईकोर्ट ने गिफ्ट डीड के एक मामले में स्पष्ट किया है कि वसीयतकर्ता मूक बधिर होने का मतलब यह नहीं कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है।

Himachal: Being Deaf Mute Does Not Imply Mental Unsoundness; High Court Dismisses Arguments
हिमाचल प्रदेश उच्च न्यायालय। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार

हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने गिफ्ट डीड के एक मामले में स्पष्ट किया है कि वसीयतकर्ता मूक बधिर होने का मतलब यह नहीं कि वह मानसिक रूप से अस्वस्थ है। केवल सुनने और बोलने की अक्षमता (मूक-बधिर होना) किसी व्यक्ति को मानसिक रूप से अस्वस्थ या दस्तावेज निष्पादित करने के लिए अयोग्य नहीं बनाती है। न्यायाधीश राकेश कैंथला की अदालत ने कहा कि केवल आम लोगों के बयान के आधार पर किसी को मानसिक रूप से अक्षम नहीं माना जा सकता, जबकि इसके विपरीत दस्तावेजी और आधिकारिक साक्ष्य मौजूद हो। अदालत ने वादी अपीलकर्ताओं की दलीलों को खारिज करते हुए निचली अदालत और प्रथम अपीलीय अदालत के फैसलों को सही ठहराया।

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अदालत ने पाया कि वादी के मानसिक रूप से अस्वस्थ होने का कोई ठोस या विशेषज्ञ प्रमाण रिकॉर्ड पर नहीं था। सर्जिकल विशेषज्ञ की ओर से जारी चिकित्सा प्रमाण पत्र के अनुसार, वादी को सुनने में कठिनाई अवश्य थी, लेकिन जोर से बोलने पर वह सब कुछ समझ सकती थी और उसका मानसिक स्तर पूरी तरह सतर्क था। उपहार विलेख लिखने वाले लेखक और गवाहों के बयानों से यह साबित हुआ कि विलेख वादी की मर्जी से लिखा गया था। इसके अलावा, तत्कालीन तहसीलदार/सब-रजिस्ट्रार के बयान से स्पष्ट हुआ कि पंजीकरण के समय वादी से पूछताछ की गई थी और उसने सही जवाब दिए थे, जिसके बाद ही उसने अपने अंगूठे का निशान लगाया था।

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हाईकोर्ट ने कहा कि जब कोई व्यक्ति खुद को मानसिक रूप से अस्वस्थ बताकर अपने नेक्स्ट फ्रेंड के माध्यम से मुकदमा दायर करता है, तो अदालत के लिए यह अनिवार्य है कि वह उस व्यक्ति की मानसिक स्थिति की जांच करे। निचली अदालत ने ऐसी कोई औपचारिक जांच नहीं की गई थी, जिससे मुकदमे का मूल आधार ही कमजोर साबित हुआ। यह विवाद जिला बिलासपुर के घुमारवीं का था, जहां वादी की ओर से दावा किया गया था कि वह जन्म से ही मूक-बधिर और मानसिक रूप से कमजोर है, जिसके कारण वह 28 नवंबर 1989 को निष्पादित किए गए उपहार विलेख (गिफ्ट डीड) को समझने या उसे वैध रूप से निष्पादित करने में असमर्थ थी।

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चेक बाउंस में छह माह की जेल और 3.50 लाख जुर्माने की सजा बरकरार

प्रदेश हाईकोर्ट ने चेक बाउंस मामलों में कड़ा रुख अपनाया है। ऐसे ही एक मामले में न्यायाधीश संदीप शर्मा की अदालत ने आरोपी को निचली अदालतों की ओर से सुनाई गई 6 महीने की साधारण कारावास और 3.50 लाख रुपये मुआवजे की सजा को सही ठहराते हुए बरकरार रखा है। अदालत ने आपराधिक पुनरीक्षण याचिका को पूरी तरह खारिज करते हुए आरोपी को आदेश दिया है कि वह 15 दिनों के भीतर ट्रायल कोर्ट के समक्ष आत्मसमर्पण करे। यह कानूनी विवाद साल 2007 से चल रहा है। शिकायतकर्ता और आरोपी के बीच दोस्ताना संबंध थे। शिकायतकर्ता ने आरोपी को उनके मकान की मरम्मत और बेटी की शादी के लिए 3 लाख रुपये दिए थे। इस कर्ज को चुकाने के लिए आरोपी ने 1 जनवरी 2007 को पंजाब नेशनल बैंक का एक चेक जारी किया था। पर्याप्त राशि न होने के कारण यह बाउंस हो गया। इसके बाद शिकायतकर्ता ने कानूनी नोटिस भेजा, लेकिन पैसे वापस न मिलने पर उन्होंने सोलन की अदालत में आपराधिक शिकायत दर्ज कराई। न्यायिक मजिस्ट्रेट प्रथम श्रेणी सोलन ने आरोपी को दोषी पाते हुए 6 महीने की कैद और 3.50 लाख रुपये मुआवजे की सजा सुनाई थी। आरोपी ने इस फैसले के खिलाफ 2025 में अतिरिक्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश-II, सोलन की अदालत में अपील की, लेकिन वहां भी उसकी अपील खारिज हो गई। मई 2026 में आरोपी ने आखिरकार हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। हाईकोर्ट ने शुरुआत में आरोपी को इस शर्त पर राहत दी थी कि वह मुआवजे का 30 फीसदी हिस्सा जमा करे, लेकिन बार-बार समय दिए जाने के बाद भी आरोपी शेष राशि जमा करने में असफल रहा। इसके बाद अदालत ने यह फैसला पारित किया। हाईकोर्ट ने अपने फैसले में टिप्पणी की कि आरोपी देव राज शर्मा ने अपने बचाव में दो ऐसी दलीलें दी जो आपस में ही मेल नहीं खाती थीं।

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