हिमाचल: हाईकोर्ट ने कहा, कोर्ट के आदेशों के सहारे काम कर रहे अनुबंध कर्मी भी बढ़े हुए वेतन के हकदार
प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अनुबंध कर्मचारियों को केवल इसलिए संशोधित वेतन (रिवाइज पे) के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि कोई कर्मचारी अदालती आदेश के बल पर सेवा में बना हुआ है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने कहा कि अनुबंध कर्मचारियों को केवल इसलिए संशोधित वेतन (रिवाइज पे) के लाभ से वंचित नहीं किया जा सकता कि कोई कर्मचारी अदालती आदेश के बल पर सेवा में बना हुआ है। अदालत ने ईसीएचएस के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें ऐसे कर्मचारियों को बढ़ा हुआ वेतन देने पर रोक लगाई थी। अदालत ने याचिकाकर्ताओं के पक्ष में फैसला सुनाते हुए केंद्र सरकार को निर्देश दिए हैं कि 28 नवंबर 2025 के उस आदेश को रद्द किया जाए, जो वेतन वृद्धि रोकता है। याचिकाकर्ताओं को अन्य अनुबंध कर्मचारियों की तरह संशोधित वेतन और बकाया देय तिथि से प्रदान किया जाए। इसके साथ ही विभाग इन कर्मचारियों से किसी भी प्रकार की रिकवरी न करे।
यह मामला पूर्व सैनिक अंशदायी स्वास्थ्य योजना (ईसीएचएस) के तहत कार्यरत अनुबंध कर्मचारियों से जुड़ा है। विभाग ने नई नियुक्तियां करने के लिए विज्ञापन जारी किए थे, जिसे इन कर्मचारियों ने अदालत में चुनौती दी थी। वर्तमान में ये कर्मचारी हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के अंतरिम आदेशों के आधार पर अपनी सेवाएं दे रहे हैं। विवाद तब शुरू हुआ, जब विभाग ने 24 जुलाई 2025 को अनुबंध कर्मचारियों के वेतन में संशोधन किया, लेकिन 28 नवंबर 2025 को एक आदेश जारी कर यह कह दिया कि जो कर्मचारी अदालती आदेशों के सहारे काम कर रहे हैं, उन्हें बढ़ा हुआ वेतन नहीं मिलेगा। न्यायालय ने सुनवाई के दौरान सरकार के उस तर्क को खारिज कर दिया, जिसमें कहा गया था कि नियमित अनुबंध कर्मचारी और अदालती आदेश पर कार्यरत कर्मचारी दो अलग-अलग श्रेणियां हैं। कोर्ट ने कहा कि दोनों श्रेणियों के कर्मचारी एक ही तरह की ड्यूटी कर रहे हैं। जब काम समान है, तो वेतन में भेदभाव नहीं किया जा सकता। विभाग का यह वर्गीकरण तर्कहीन है और भारतीय संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार) का उल्लंघन करता है।
अवैध खनन, ब्लास्टिंग पर सरकार और अन्य प्रतिवादियों को नोटिस
हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट ने जिला कुल्लू के दूरदराज इलाके में स्लेट के लिए अवैध खनन और सुरंगें खोदने के लिए की जा रही ब्लास्टिंग के खिलाफ दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कड़ा रुख अपनाया है। मुख्य न्यायाधीश गुरमीत सिंह संधावालिया और न्यायाधीश बिपिन चंद्र नेगी की खंडपीठ ने इस मामले में राज्य सरकार सहित अन्य प्रतिवादियों को नोटिस जारी किए हैं। हाईकोर्ट में याचिकाकर्ता तेजा सिंह और अन्य की ओर से दायर याचिका में आरोप लगाया गया है कि क्षेत्र में बड़े स्तर पर अवैध खनन हो रहा है।
स्लेट निकालने के लिए गहरी सुरंगें खोदी जा रहीं
याचिका में कहा गया है कि स्लेट निकालने के लिए गहरी सुरंगें खोदी जा रही हैं और ब्लास्टिंग का इस्तेमाल किया जा रहा है। इससे स्थानीय ग्रामीण बेहद परेशान हैं। इस अवैध गतिविधियों से मुख्य रूप से नीनू, जेष्ठा, अशानी और पुइन गांव के निवासी प्रभावित हो रहे हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश अधिवक्ता ने अदालत को अवगत कराया कि गांव वासियों ने पहले भी कई बार आधिकारिक स्तर पर शिकायतें की हैं। इस मामले में 4 सितंबर 2024 को डिविजनल फॉरेस्ट ऑफिसर ने निजी प्रतिवादियों के खिलाफ एफआईआर भी दर्ज की थी, लेकिन समस्या का समाधान नहीं हो पाया। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए निजी प्रतिवादियों को भी नोटिस जारी कर चार सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने के निर्देश दिए हैं। इसके अलावा खंडपीठ ने राज्य सरकार को इस मामले में शिकायतों पर कार्रवाई करने की स्वतंत्रता दी है। मामले की अगली सुनवाई 27 अप्रैल को होगी।