Himachal: हाईकोर्ट ने सेवानिवृत्ति पर लगाई रोक, 60 वर्ष की आयु तक सेवा में बनाए रखने का दिया आदेश, जानें पूरा
हाईकोर्ट की खंडपीठ ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को उसे 60 वर्ष की आयु पूरी होने या इस संबंध में कोई अगला आदेश आने तक सेवा में बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया है।
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हिमाचल प्रदेश हाईकोर्ट की खंडपीठ ने चतुर्थ श्रेणी कर्मचारी को बड़ी राहत देते हुए राज्य सरकार को उसे 60 वर्ष की आयु पूरी होने या इस संबंध में कोई अगला आदेश आने तक सेवा में बनाए रखने का अंतरिम आदेश दिया है। यह आदेश न्यायाधीश विवेक सिंह ठाकुर और न्यायाधीश रंजन शर्मा की खंडपीठ ने दिया है।
याचिकाकर्ता की ओर से दायर अंतरिम प्रार्थना पत्र पर सुनवाई करते हुए खंडपीठ ने राज्य सरकार को नोटिस जारी करते हुए 4 सप्ताह के भीतर जवाब दाखिल करने का समय दिया है। इसके बाद याचिकाकर्ता को अगले 4 सप्ताह के भीतर अपना प्रत्युत्तर दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई 7 अक्तूबर को होगी।
फर्जी आय प्रमाणपत्र से आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बनी महिला की याचिका खारिज
प्रदेश हाईकोर्ट ने फर्जी व तथ्य छिपाकर बनाए गए आय प्रमाणपत्र के आधार पर आंगनबाड़ी कार्यकर्ता बनी महिला की याचिका को खारिज कर दिया है। न्यायाधीश विपिन चंद्र नेगी की एकल पीठ ने मामले पर फैसला सुनाते हुए निचले प्रशासनिक अधिकारियों और उपायुक्त हमीरपुर के उस आदेश को सही ठहराया, जिसमें याचिकाकर्ता रेखा देवी की नियुक्ति रद्द करने और नए सिरे से चयन प्रक्रिया शुरू करने का निर्देश दिया गया था। न्यायालय ने माना कि तहसीलदार भोरंज के 16 मई 2013 और एसडीओ सिविल भोरंज 28 फरवरी 2014 की ओर से आय प्रमाणपत्र रद्द करने का निर्णय पूरी तरह वैधानिक और सही है। तथ्य छिपाकर हासिल किए गए आय प्रमाणपत्र के आधार पर याचिकाकर्ता की आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के रूप में नियुक्ति को अमान्य ठहराया गया।
उच्च न्यायालय ने उपायुक्त हमीरपुर और संबंधित सीडीपीओ टौणी देवी को निर्देश दिया है कि आंगनबाड़ी केंद्र भुरदान में आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद के लिए अगले 3 महीने के भीतर नए सिरे से चयन प्रक्रिया पूरी की जाए। गौरतलब है कि वर्ष 2007 में टौणी देवी बाल विकास परियोजना (आईसीडीएस) के तहत भुरदान आंगनबाड़ी केंद्र में याचिकाकर्ता का चयन आंगनबाड़ी कार्यकर्ता के पद पर हुआ था। इस चयन को प्रतिद्वंद्वी उम्मीदवारों ने उपायुक्त हमीरपुर के समक्ष चुनौती दीई। उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में तहसीलदार भोरंज की जांच रिपोर्ट का हवाला देते हुए पाया कि याचिकाकर्ता के पति ने आय प्रमाणपत्र (जिसमें वार्षिक आय मात्र 7,500 दर्शाई गई थी) प्राप्त करते समय कई महत्वपूर्ण तथ्य छिपाए थे। याचिकाकर्ता के पति वर्ष 2003-04 से लोक निर्माण विभाग में क्लास श्रेणी के ठेकेदार के रूप में कार्यरत थे।