Himachal: योग्य होने के बावजूद रोकी नियुक्ति, सुप्रीम कोर्ट ने सरकार पर लगाया पांच लाख रुपये जुर्माना
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हिमाचल सरकार को फटकार लगाते हुए 90 फीसदी दिव्यांगता वाले जिला अदालत शिमला के एक वकील को तुरंत सहायक जिला अटॉर्नी (एडीए) के पद पर नियुक्त करने का आदेश दिया है।
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सुप्रीम कोर्ट ने सरकारी नौकरियों में दिव्यांगों के लिए आरक्षण देते समय दिव्यांगता की अधिकतम सीमा तय करने को असांविधानिक और मनमाना करार दिया है। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने हिमाचल सरकार को फटकार लगाते हुए 90 फीसदी दिव्यांगता वाले जिला अदालत शिमला के एक वकील को तुरंत सहायक जिला अटॉर्नी (एडीए) के पद पर नियुक्त करने का आदेश दिया है। सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को बिना वजह कानूनी लड़ाई में घसीटने और योग्य होने के बावजूद नियुक्ति रोकने के लिए प्रदेश सरकार पर पांच लाख का जुर्माना भी लगाया है, जो अपीलकर्ता को दिया जाएगा।
खंडपीठ ने हिमाचल सरकार को दो हफ्ते में प्रार्थी किन्नाैर जिला निवासी प्रभु कुमार नेगी को नियुक्ति पत्र जारी करने का आदेश दिया है। इसके साथ ही उनकी नियुक्ति पिछली तारीख 19 सितंबर 2019 से मानी जाएगी और उन्हें वरिष्ठता सहित सभी तरह के लाभ दिए जाएंगे। सुप्रीम कोर्ट ने आदेश दिया है कि यदि कोई पद खाली न हो तो विशेष रूप से उनके लिए एक पद सृजित करें। अदालत ने कहा कि दिव्यांग जन अधिकार अधिनियम 2016 दिव्यांगता की न्यूनतम सीमा 40 फीसदी तो तय करता है, लेकिन यह कहीं नहीं कहता कि अधिक दिव्यांगता वाले व्यक्ति को अयोग्य माना जाए। खंडपीठ ने कहा कि 60 फीसदी की अधिकतम सीमा तय करना पूरी तरह से मनमाना है और इसका पद की कार्यप्रणाली से कोई लेना-देना नहीं है। गौर किया कि यदि प्रभु कुमार नेगी पिछले 10 वर्षों से सफलतापूर्वक वकालत कर सकते हैं, तो वह जिला अटॉर्नी के रूप में भी सेवाएं दे सकते हैं। शारीरिक स्थिति को उनकी क्षमता का पैमाना नहीं बनाया जा सकता।
अपीलकर्ता प्रभु कुमार नेगी 90 फीसदी लोकोमोटर डिसेबिलिटी से ग्रसित हैं और 2015 से वकालत कर रहे हैं। साल 2018 में हिमाचल प्रदेश लोक सेवा आयोग ने एडीए के 24 पदों के लिए विज्ञापन निकाला था। इसमें एक शर्त रखी गई थी कि दिव्यांग श्रेणी के आवेदक की दिव्यांगता 40 फीसदी से कम और 60 फीसदी से अधिक नहीं होनी चाहिए। अपीलकर्ता ने लिखित परीक्षा और इंटरव्यू दोनों पास कर लिए और मेरिट सूची में शीर्ष स्थान प्राप्त किया।
आयोग ने उनके नाम की सिफारिश भी की, लेकिन राज्य सरकार ने यह कहकर नियुक्ति रोक दी कि उनकी दिव्यांगता 60 फीसदी की निर्धारित सीमा से अधिक है। इस आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी गई। हाईकोर्ट ने प्रार्थी की याचिका खारिज कर दी। हाईकोर्ट की ओर से पारित 19 सितंबर 2020 के फैसले को प्रार्थी ने सुप्रीम कोर्ट में चुनौती थी।