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Shimla: मनरेगा में 55 लाख रुपये का गबन, विजिलेंस ने चंबा के वन अधिकारियों और कर्मचारियों पर दर्ज की एफआईआर
Sun, 02 Aug 2026 06:23 AM IST
दुष्यंत शर्मा
देवेंद्र ठाकुर, शिमला
देवेंद्र ठाकुर, शिमला
Published by: दुष्यंत शर्मा
Updated Sun, 02 Aug 2026 06:23 AM IST
सार
आरोप है कि सरकारी रिकॉर्ड में फर्जी कार्य और सामग्री दर्शाकर करीब 55 लाख रुपये के सरकारी धन का गबन और दुरुपयोग किया गया।
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- फोटो : संवाद
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विस्तार
राज्य सतर्कता एवं भ्रष्टाचार रोधी ब्यूरो (विजिलेंस) ने चंबा जिले में मनरेगा के तहत कराए गए कार्यों में कथित वित्तीय अनियमितताओं के मामले में तत्कालीन वन अधिकारियों और कर्मचारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की है। इनमें तत्कालीन रेंज एवं ब्लॉक अधिकारी, फॉरेस्ट गार्ड और अन्य संबंधित कर्मचारी शामिल हैं।
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आरोप है कि सरकारी रिकॉर्ड में फर्जी कार्य और सामग्री दर्शाकर करीब 55 लाख रुपये के सरकारी धन का गबन और दुरुपयोग किया गया। आरोपियों पर बीएनएस की धाराओं 409, 420, 467, 468, 471 व 120-बी और भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 (संशोधित-2018) की धारा 13(2) सहपठित 13(1)(ए) के तहत एफआईआर दर्ज की गई है। विजिलेंस ब्यूरो रिकॉर्ड, भुगतान प्रक्रिया और संबंधित अधिकारियों की भूमिका की गहन पड़ताल कर रहा है।
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यह मामला वर्ष 2022 में प्राप्त दो शिकायतों की जांच के बाद सामने आया। शिकायतें पूर्व जिला परिषद सदस्य कर्मचंद ठाकुर और अन्य ग्रामीणों ने दी थीं। प्रारंभिक शिकायत वर्ष 2019 की थी, जिसमें भारी बर्फबारी के बाद देवदार के पेड़ों के कथित अवैध कटान और मनरेगा कार्यों में अनियमितताओं के आरोप लगाए गए थे।
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मनरेगा से जुड़े आरोपों की जांच के लिए उपायुक्त चंबा ने मामला जिला ग्रामीण विकास अभिकरण (डीआरडीए) को भेजा। डीआरडीए की ओर से गठित तकनीकी समिति ने वन परिक्षेत्र तीसा, मसरूंड और टिकरीगढ़ में मनरेगा के तहत कराए गए 41 कार्यों का निरीक्षण किया। इनमें से 32 में गंभीर तकनीकी एवं वित्तीय अनियमितताएं पाई गईं।
कई कार्यों में सामग्री मद में भुगतान दिखाया, मौके पर नहीं हुआ सामग्री का इस्तेमाल
रिपोर्ट के अनुसार कई कार्यों में सामग्री मद में भुगतान तो दर्शाया गया, लेकिन मौके पर वह सामग्री या तो उपयोग में नहीं लाई गई या वास्तविक कार्य रिकॉर्ड में दर्शाए गए काम से काफी कम पाया गया। तीसा रेंज के सीओ लैंड डेवलपमेंट वर्क एट गुवाड़ी सेकेंड में सामग्री मद में 1.96 लाख रुपये खर्च दिखाए गए, जबकि पुनर्मूल्यांकन में सामग्री का उपयोग शून्य पाया गया।
विजिलेंस के अनुसार दस्तावेजों, तकनीकी मूल्यांकन रिपोर्ट और संबंधित अधिकारियों के बयानों से प्रथम दृष्टया यह सामने आया कि आपराधिक षड्यंत्र के तहत सरकारी अभिलेखों में वास्तविक कार्य और सामग्री से अधिक कार्य दर्शाकर फर्जी रिकॉर्ड तैयार किए। इन्हीं के आधार पर भुगतान प्राप्त किए जाने का आरोप है।