तकनीकी शिक्षा: हिमाचल के युवाओं इंजीनियरिंग और डी-फार्मेसी से मोह भंग, जानें पूरा मामला
प्रदेश के सरकारी और निजी बहुतकनीकी (पॉलीटेक्निक) एवं डी-फार्मेसी संस्थानों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या में साल-दर-साल भारी गिरावट दर्ज की जा रही है।
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हिमाचल प्रदेश में कभी युवाओं की पहली पसंद रहने वाली तकनीकी शिक्षा से अब युवाओं का मोह भंग हो गया है। प्रदेश के सरकारी और निजी बहुतकनीकी (पॉलीटेक्निक) एवं डी-फार्मेसी संस्थानों में दाखिला लेने वाले विद्यार्थियों की संख्या में साल-दर-साल भारी गिरावट दर्ज की जा रही है। ताजा आंकड़ों के अनुसार शैक्षणिक सत्र 2025-2026 में कुल उपलब्ध सीटों में से 3,263 सीटें खाली रह गई हैं। तकनीकी शिक्षा बोर्ड धर्मशाला द्वारा आयोजित पैट और लीट परीक्षाओं के माध्यम से प्रदेश के करीब 40 संस्थानों में प्रवेश दिया जाता है। पिछले तीन वर्षों के आंकड़े बताते हैं कि सीटें भरने का प्रयास लगातार विफल हो रहा है। सत्र 2023-24 में कुल 6,852 सीटों में से 4,264 भरी गई, जबकि 2,588 खाली रहीं। 2024-25 में कुल 6,775 सीटों में से 3,990 भरी गई, जबकि 2,785 खाली रहीं। इसी तरह सत्र 2025-26 में 7,525 सीटों का लक्ष्य था, लेकिन 4,262 सीटें ही भरी गई, 3263 सीटें रिक्त रहीं।
विशेषज्ञों और शिक्षाविदों के अनुसार इस गिरावट के पीछे कई सामाजिक और आर्थिक कारण जिम्मेदार हैं। निजी क्षेत्र में इंजीनियरिंग और डिप्लोमा धारकों को मिलने वाले शुरुआती वेतन में कमी और कैंपस प्लेसमेंट के घटते अवसरों ने छात्रों को निराश किया है। वर्तमान में छात्र पारंपरिक इंजीनियरिंग के बजाय डिजिटल मार्केटिंग, डाटा साइंस, होटल मैनेजमेंट और अन्य कौशल-आधारित छोटे कोर्सों की ओर अधिक आकर्षित हो रहे हैं।
निजी क्षेत्र में इंजीनियरिंग पॉलीटेक्निक और डी-फार्मेसी संस्थानों में नामांकन प्रक्रिया चलाई जाती है। इस वर्ष 4,262 छात्रों ने दाखिला लिया है। बोर्ड का लक्ष्य अधिक युवाओं को तकनीकी रूप से कुशल बनाना है। - अशोक पाठक, सचिव तकनीकी शिक्षा बोर्ड धर्मशाला
नामांकन बढ़ाने के लिए तकनीकी शिक्षा बोर्ड कर रहा प्रयास
नामांकन बढ़ाने के लिए तकनीकी शिक्षा बोर्ड नए सिरे से रणनीति बना रहा है। बोर्ड का प्रयास है कि स्कूलों के स्तर पर काउंसलिंग सत्र आयोजित किए जाएं, ताकि छात्रों को इंजीनियरिंग और फार्मेसी के भविष्य के महत्व को समझाया जा सके। हालांकि वर्तमान स्थिति को देखते हुए पाठ्यक्रम में बदलाव और उद्योगों की मांग के अनुरूप प्रशिक्षण देना समय की बड़ी जरूरत बन गया है।