सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Himachal Pradesh ›   Shimla News ›   Transformation In Himachal apples brought prosperity but wiped out the existence of traditional watermills

बदलाव: हिमाचल प्रदेश में सेब ने समृद्धि तो दी, पर मिटा दिया पारंपरिक घराटों का वजूद; अब लहलहा रहे बगीचे

सुरेश शांडिल्य, क्यार (शिमला)। Published by: Ankesh Dogra Updated Mon, 30 Mar 2026 01:16 PM IST
विज्ञापन
सार

हिमाचल प्रदेश के शिमला जिले का क्यार कस्बा जो कभी कभी बहते पानी की घरघराहट से गूंजता था। लेकिन अब घराट यहां से अंतिम सांस ले रहे हैं। स्थानीय लोगों का कहना है कि अब इस क्षेत्र में गेहूं, मक्की व अनाज की अन्य फसलें नहीं होतीं। अनाज के खेतों का स्थान अब सेब के बगीचों ने ले लिया है, इसलिए घराट की जरूरत नहीं है। पढ़ें पूरी खबर विस्तार से...

Transformation In Himachal apples brought prosperity but wiped out the existence of traditional watermills
सेब ने मिटा दिया पारंपरिक घराटों का वजूद - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
विज्ञापन

विस्तार

राजधानी शिमला से करीब 50 किलोमीटर दूर क्यार कस्बा। यहां के आसपास के गांवों के लिए क्यार खड्ड से बनी उठाऊ सिंचाई की एक योजना के पंप हाउस के अंदर रोहित कंवर बैठे हैं। वह आउटसोर्स के माध्यम से नियुक्त हैं। इसी जगह से करीब 300 मीटर की दूरी पर क्यार खड्ड के किनारे इनके दादा स्वर्गीय अमर सिंह का घराट था। दादा का कई वर्ष पहले देहांत हो गया था और उनका घराट भी ढह चुका है। 
Trending Videos

 

रोहित का कहना है कि अब इस क्षेत्र में गेहूं, मक्की व अनाज की अन्य फसलें नहीं हाेतीं। अनाज के खेतों का स्थान अब सेब के बगीचों ने ले लिया है, इसलिए घराट की भी जरूरत नहीं है। 
विज्ञापन
विज्ञापन

इसी पंप हाउस से करीब 100 मीटर की दूरी पर एक घराट अभी भी अस्तित्व में है। यह देवी कामाक्षा का घराट है। इस घराट में कुछ परिवारों को देव परंपरा की वजह से ड्यूटी देनी होती है, इसलिए यह बचा हुआ है। रविवार को यहां 82 वर्षीय खांपा राम की ड्यूटी थी। खांपा राम ने बताया कि यह देवी का घराट है। यहां कोई पीसने आए या न आए, पर यहां उन्हें बारी-बारी से काम करना ही होता है। एक खलटा यानी छोटी बोरी की पिसाई के लिए 30 रुपये का पारिश्रमिक मिलता है। 

खांपा राम ने खड़े घराट दिखाते हुए कहा-देखो, इनमें से कोई भी नहीं चल रहा है। चलेगा कहां से, अब अनाज नहीं होता। अनाज जहां उगता था, वहां सेब के पौधे उगे हैं। 

लोगों को अनाज उगाना घाटे का सौदा लग रहा है तो सेब उगाने से उनकी आमदनी अच्छी होने लगी है। उन्होंने कहा कि एक वक्त था, जब दिन-रात घराट चलते थे। घराट में ही सोना होता था। अब ऐसा नहीं। इसी स्थान से करीब 500 मीटर दूर पलाना गांव के देवता मंगलेश्वर का घराट है। घराट के बाहर दरवाजों में कुंडियां लगी थीं।
 

गिरि नदी के किनारे का घराट दस साल पहले बंद 
चौपाल विधानसभा क्षेत्र के तहत रैणा गांव से नीचे गिरि नदी में भी एक घराट था। यह अब ढहने लगा है। इसके मालिक रमेश चंदेल ने कहा कि दस साल पहले उन्होंने इसे बंद कर दिया है। कोई अनाज पीसने ही नहीं आता था तो बंद कर दिया। रमेश के घराट के साथ गिरि नदी के उस पार देवता ग्रहणेश्वर का घराट अभी सलामत है, पर यहां भी पिसाई करने कोई नहीं आता। इस स्थान से करीब एक किलोमीटर आगे कोटखाई की दिशा में गिरि नदी के किनारे ही आगे मियां का एक घराट था, यह भी अब बंद है। स्थानीय विधायक कुलदीप सिंह राठौर का कहना है कि घराटों को बचाने के लिए विशेष प्रयास किए जाने की जरूरत है। समाज शास्त्री दिनेश शर्मा ने कहा कि औद्योगिक क्रांति और बाजार-नियंत्रित उत्पादन व्यवस्था से घराट गौण हो गए हैं। गांवों में विद्युत संचालित मशीनों का प्रयोग बढ़ रहा है।

घराटों से पैदा की जा सकती है बिजली : बाल्दी
हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्य सचिव और पूर्व वित्त एवं ऊर्जा सचिव डॉ. श्रीकांत बाल्दी ने कहा कि घराटों में बिजली पैदा की जा सकती है। घराटों के लिए ट्रांसमिशन लाइन बनाने की जरूरत है। इनमें उत्पादित बिजली की खपत आसपास के गांवों में हो सकती है। ये 100 किलोवाट या इससे अधिक बिजली पैदा कर सकते हैं। यह ग्रामीण स्वराेजगार का भी अच्छा साधन हो सकता है।
विज्ञापन
विज्ञापन

रहें हर खबर से अपडेट, डाउनलोड करें Android Hindi News App, iOS Hindi News App और Amarujala Hindi News APP अपने मोबाइल पे|
Get all India News in Hindi related to live update of politics, sports, entertainment, technology and education etc. Stay updated with us for all breaking news from India News and more news in Hindi.

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

एप में पढ़ें

Followed