World Theatre Day: पहाड़ों में हुनर को निखारकर कई रंगकर्मियों ने मायानगरी में भरी सफलता की ऊंची उड़ान
गेयटी थियेटर शिमला में मनोहर सिंह, प्रेम चोपड़ा, नसीरुदीन शाह, प्राण, मदन पुरी और अमरीश पुरी जैसे बड़े सितारे रंगमंच कर मुंबई तक पहुंचे हैं। गायक केएल सहगल ने भी गेयटी थियेटर में अपनी आवाज से बिखेरा था जादू...
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पहाड़ों के रंगमंच ने मुंबई तक अपनी धमक कायम रखी है। यहां के थियेटर से मायानगरी तक कई कलाकारों ने उड़ान भरी, वहीं मायानगरी से भी कई बड़े थियेटर के कलाकारों ने शिमला आकर प्रतिभा का प्रदर्शन किया। भारतीय रंगमंच और हिंदी सिनेमा में हिमाचल का योगदान विशेष स्थान रखता है।
मनोहर सिंह, अनुपम खेर, प्रेम चोपड़ा ये कुछ ऐसे नाम हैं, जिन्होंने शिमला के गेयटी थियेटर में प्रतिभा को निखारा और फिर बॉलीवुड में अपने अभिनय से सबको प्रभावित किया। इसके अलावा पृथ्वी राज कपूर, प्राण, मदन पुरी और अमरीश पुरी, हबीब तनवीर, टॉम अल्टर, संजय मिश्रा, शशि कपूर, नसीरुदीन शाह, बलराज साहनी, अनुपम खेर, गिरीश कर्नाड जैसे बड़े नाम भी शिमला में रहकर थियेटर कर चुके हैं।
गायक केएल सहगल भी अपनी आवाज का जादू गेयटी में बिखेर चुके हैं। 12 अप्रैल 1938 को शिमला जिले के शोघी क्षेत्र के छोटे से गांव खवारा चौकी में जन्मे मनोहर सिंह ने अपने कॅरिअर की शुरुआत रंगमंच से की और बाद में फिल्म, टेलीविजन जगत में भी अपनी अलग पहचान बनाई।
ऐतिहासिक गेयटी थियेटर में पहले मशालें जलाकर नाटकों का मंचन किया जाता था। 1895 मेंं शिमला के चाबा में बिजली तैयार कर गेयटी तक पहुंचाई गई। बाद में बिजली की रोशनी से पहली बार नाटक का मंचन किया गया। अब गेयटी में देशभक्ति और पहाड़ी संस्कृति की प्रस्तुतियों की धूम रहती है। अंग्रेजी हुकूमत के दौरान थियेटर में भारतीय नागरिकों के आने पर पाबंदी थी। यहां वायसराय के लिए एक विशेष सीट होती थी लेकिन अब गेयटी में स्कूली बच्चों से लेकर आम आदमी तक नाटकों और सांस्कृतिक कार्यक्रम का लुत्फ उठाते हैं।
मंडी को रंगमंच प्रतिभाओं की जन्मस्थली माना जाता है। यहां के छोटे-छोटे मंचों से निकले कलाकारों गगन प्रदीप, अतीत भंडारी, तमन्ना, अरुण, नीरज सूद, सपना और अन्य ने बॉलीवुड और राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाई। आज यही रंगमंच उपेक्षा, आर्थिक और बदलते समय के दबाव के चलते अस्तित्व के संकट से जूझ रहा है।
कलाकारों की स्थिति आज भी संघर्षपूर्ण है। रंगमंच कभी समाप्त नहीं होगा बल्कि हर दौर में नए रूप में स्वयं को पुन: स्थापित करता रहेगा।- सीमा शर्मा, संचालिका, हिमाचल सांस्कृतिक शोध संस्थान, मंडी
हिमाचल में कुछ जगहों को छोड़कर रंगमंच की जड़ें कमजोर होती जा रही हैं। सामाजिक और सरकारी स्तर पर इसे नजरअंदाज किया गया है। स्कूल और कॉलेज स्तर पर रंगमंच को बढ़ावा देना जरूरी है, तभी नई पीढ़ी इससे जुड़ पाएगी और इसे पेशे के रूप में अपनाएगी। -इंद्रराज, युवा निदेशक, रंगमंच मंडी
वर्ष 1838 में तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड ऑकलैंड की बहन एमिली ईडन ने यहां एक छोटे से कमरे में छोटा और गर्म और कुछ गंदा... नामक एक नाटक प्रदर्शित किया। बताया जाता है कि एक अभिनेता ने एक लघु नाटक में महिला की भूमिका निभाने से मना कर दिया। वह अपनी मूंछें नहीं काटना चाहता था। दूसरे ने सोचा कि भालू के शिकार के लिए समय आ गया है तो वह भी छोड़ गया। इसके बाद अभिनेताओं को बदल दिया गया और 1838 में आखिरकार पहले नाटक का प्रदर्शन किया गया।
यह नाटक आज के सब्जी मंडी क्षेत्र में स्थित पुराने असंबली रूम्स में करवाया गया। एमिली ईडन के समय का यह दमघोंटू कमरा 1887 में नव निर्मित टाउन हॉल में बने गेयटी थियेटर की नींव रख गयाा। 1887 क्वीन विक्टोरिया का जयंती वर्ष था। 30 मई 1887 को नोबेल पुरस्कार विजेता रुडयार्ड किपलिंग ने गॉथिक हॉल में द टाइम विल टेल नामक पहले नाटक का मंचन किया। इसके बाद से यहां अब बड़ी संख्या में आयोजन हो चुके हैं। समय-समय पर बड़े कलाकार भी यहां आते रहते हैं। गेयटी थियेटर मौजूदा समय में रंगकर्मियों की गतिविधियों का भी प्रमुख केंद्र बन गया है। हालांकि, यहां दूसरे कार्यक्रम भी करवाए जाते हैं।
आधुनिकता के दौर में भी रंगमंच का मंच बखूबी सजा है। यूट्यूब, फेसबुक, इंस्टाग्राम और ओटीटी जैसे प्लेटफॉर्म मनोरंजन के प्रमुख माध्यम बेशक बन गए हैं, लेकिन रंगमंच आज भी अपनी जीवंतता और सामाजिक भूमिका के साथ कायम है। भले ही दर्शकों की संख्या पहले जैसी न रही हो, लेकिन शहरों से लेकर छोटे कस्बों और गांवों तक रंगकर्मी पूरी निष्ठा के साथ नाटकों के मंचन में जुटे हुए हैं। केंद्र, प्रदेश की सरकारों की ओर से भी रंगकर्मियों को मिलने वाली सुविधाएं भी लगभग समाप्त कर दी हैं। केंद्र सरकार से संस्कृति मंत्रालय से मिलने अनुदान दो वर्षों से बंद है। कुल्लू में रंगकर्मी वर्षभर रंगमंच की गतिविधियों में सक्रिय रहते हैं और नए कलाकारों को अपनी प्रतिभा निखारने का अवसर प्रदान कर रहे हैं। रंगकर्मियों का मानना है कि यदि रंगमंच को केवल मनोरंजन के रूप में देखा जाए तो यह आधुनिक डिजिटल माध्यमों की प्रतिस्पर्धा में पीछे रह सकता है।
संस्कृति मंत्रालय से मिलने वाला अनुदान बंद
एक्टिव मोनाल कल्चरल एसोसिएशन के अध्यक्ष और वरिष्ठ रंगकर्मी केहर सिंह ठाकुर का कहना है कि पिछले दो वर्षों से केंद्र सरकार के संस्कृति मंत्रालय से मिलने वाला वित्तीय अनुदान बंद है। हिमाचल सरकार के भाषा एवं संस्कृति विभाग की ओर से ऑडिटोरियम में मिलने वाली रियायतें भी समाप्त कर दी हैं। इससे नाटकों का मंचन महंगा हो गया है। वे हिम्मत नहीं हारे हैं और अब वह ग्रामीण क्षेत्रों में नाटकों का मंचन कर रहे हैं, जहां उन्हें लोगों का भरपूर सहयोग मिल रहा है।
रंगमंच को बढ़ावा देने को बनानी चाहिए योजना
रंगसभा समूह शमशी के अध्यक्ष परमानंद पिंकू, रंगकर्मी रेवत राम विक्की और मीनाक्षी का कहना है कि भाषा एवं संस्कृति विभाग को जमीनी स्तर पर रंगमंच को बढ़ावा देने के लिए योजना बनानी चाहिए। शिमला के गेयटी थियेटर की तर्ज पर कुल्लू के अटल सदन को भी रियायती दरों पर उपलब्ध कराया जाए, ताकि नए कलाकारों को प्रोत्साहन मिल सके। युवा रंगकर्मी अनन्या राठौर का कहना है कि रंगमंच उन्हें पढ़ाई में विषयों को समझने और सोशल मीडिया के लिए बेहतर कंटेंट चुनने में मदद करता है।
‘चिट्टा बॉय’ का किरदार, जो बता रहा नशे का भयावह अंत
धर्मशाला। जुनून कुछ करने का हो तो छोटे शहर की गलियां भी बड़े सपनों का मंच बन जाती हैं। धर्मशाला के युवा रंगकर्मी रोहित वोहरा की कहानी उन हजारों युवाओं के लिए प्रेरणास्रोत है, जो ग्लैमर की तलाश में महानगरों का रुख करते हैं। रोहित ने मुंबई और चंडीगढ़ जैसे बड़े शहरों के बजाय अपनी मिट्टी को चुना और आज वे हिमाचल में थियेटर को नई पहचान दिला रहे हैं। हाल ही में धर्मशाला में सरकार की एंटी चिट्टा मुहिम के दौरान उन्होंने सड़कों पर नुक्कड़ नाटक किए। इसमें वह चिट्टे के आदी युवा की भूमिका निभा रहे थे। सड़क पर नशे की आपूर्ति के लिए तड़पते हुए देख असली कहानी समझ कई लोगों ने अपने मोबाइल फोन में उनके वीडियो बनाए, जो सोशल मीडिया पर जमकर वायरल हुए थे।
वायरल वीडियो के बाद चिट्टा बॉय का उनका किरदार देशभर में मशहूर हो गया। उन्होंने अपने सशक्त अभिनय से यह संदेश दिया कि चिट्टे की लत किस तरह जीवन बर्बाद कर रही है। पंजाब यूनिवर्सिटी चंडीगढ़ से थियेटर में स्नातकोत्तर (एमए) की डिग्री हासिल करने वाले रोहित उसी संस्थान की उपज हैं, जहां से अनुपम खेर, मंगल ढिल्लों और सुनील ग्रोवर जैसे दिग्गज निकले हैं। वे अब तक लगभग 3000 नुक्कड़ नाटक कर चुके हैं।
धर्मशाला में ओपन एयर थियेटर की मांग
रोहित का मानना है कि कांगड़ा में थियेटर की अपार संभावनाएं हैं, लेकिन उचित मंच का अभाव है। उन्होंने प्रदेश सरकार से धर्मशाला में एक ओपन एयर थियेटर बनाने की मांग की है। रोहित कहते हैं कि अपनी जड़ों से जुड़कर ही हम आने वाली पीढ़ी के लिए रास्ता बना सकते हैं।