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Sawan 2026: श्रावण मास का रहस्य, आखिर क्यों भगवान शिव को सबसे प्रिय है सावन ?
Mon, 03 Aug 2026 08:03 PM IST
विनोद शुक्ला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Mon, 03 Aug 2026 08:03 PM IST
सार
Sawan 2026: सावन माह में शिवजी की उपासना का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार,सावन में भगवान शिव की उपासना करने से सभी तरह की मनोकामनाओं की पूर्ति होती है।
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सावन में शिवजी की पूजा का होता है विशेष महत्व
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
Sawan 2026: शास्त्रों में कहा गया है कि 'श्रावणे पूजयेत् शिवम्', अर्थात सावन के महीने में भगवान शिव की पूजा विशेष रूप से फलदायी मानी गई है। इस पावन मास में भोलेनाथ अपने भक्तों पर शीघ्र प्रसन्न होकर उनकी मनोकामनाएं पूर्ण करते हैं। काल के भी महाकाल भगवान शिव के बारे में कहा गया है कि सभी देवताओं की आत्मा में रुद्र उपस्थित हैं और सभी देवता रुद्र की आत्मा हैं। शास्त्रों में वर्णित है "रुतं दुःखं द्रावयति-नाशयतीति रुद्रः", अर्थात जो सभी प्रकार के दुःखों का नाश कर दें, वही रुद्र हैं। इसलिए श्रावण मास में भगवान शिव की आराधना करने से जीवन के कष्टों का शमन होता है। ऐसी मान्यता है कि इस माह में की गई शिव पूजा तत्काल शुभ फल प्रदान करती है। इसके पीछे स्वयं भगवान शिव का वरदान माना गया है। आइए जानते हैं, श्रावण मास से जुड़ी प्रमुख पौराणिक कथाएं।
पार्वती की कठोर तपस्या से मिला शिव का अटूट सान्निध्य
मान्यता है कि पर्वतराज हिमालय के घर देवी सती ने माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया था। भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने कठोर तप, व्रत और उपवास किए। उनकी अखंड भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया और विवाह किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के पावन मास में ही भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यही कारण है कि श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है और इस महीने में की गई उनकी उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है।
समुद्र मंथन और नीलकंठ की महागाथा, यहीं से शुरू हुई जलाभिषेक की परंपरा
समुद्र मंथन के समय जब कालकूट नामक विष निकला तो उसके प्रभाव से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता और दानव सभी भयभीत हो उठे। समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में ही धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष की तीव्र ज्वाला से व्याकुल होकर भगवान शिव तीनों लोकों में भ्रमण करते रहे, लेकिन उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। अंततः वे पृथ्वी पर एक पीपल वृक्ष के नीचे विराजमान हुए। मान्यता है कि उस समय सभी देवी-देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियां पीपल में समाहित कर भगवान शिव को शीतल छाया और प्राणदायिनी वायु प्रदान की। इसके बाद सभी देवताओं ने भगवान शिव पर जल अर्पित किया, जिससे विष का प्रभाव शांत हुआ। तभी से श्रावण मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा प्रारंभ हुई।
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एक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी श्रावण मास में सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर देवघर स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया था। तभी से श्रावण मास में जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई। आज भी लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, काशी, सुल्तानगंज और अन्य तीर्थों से गंगाजल लेकर कांवड़ यात्रा करते हैं तथा भगवान शिव का जलाभिषेक कर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।
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पार्वती की कठोर तपस्या से मिला शिव का अटूट सान्निध्य
मान्यता है कि पर्वतराज हिमालय के घर देवी सती ने माता पार्वती के रूप में पुनर्जन्म लिया था। भगवान शिव को पुनः पति रूप में प्राप्त करने के लिए माता पार्वती ने कठोर तप, व्रत और उपवास किए। उनकी अखंड भक्ति और तपस्या से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने उन्हें अपनी अर्धांगिनी के रूप में स्वीकार किया और विवाह किया। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार सावन के पावन मास में ही भगवान शिव ने माता पार्वती को पत्नी के रूप में स्वीकार किया था। यही कारण है कि श्रावण मास भगवान शिव को अत्यंत प्रिय माना जाता है और इस महीने में की गई उनकी उपासना विशेष फलदायी मानी जाती है।
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समुद्र मंथन और नीलकंठ की महागाथा, यहीं से शुरू हुई जलाभिषेक की परंपरा
समुद्र मंथन के समय जब कालकूट नामक विष निकला तो उसके प्रभाव से तीनों लोकों में हाहाकार मच गया। देवता और दानव सभी भयभीत हो उठे। समस्त सृष्टि की रक्षा के लिए भगवान शिव ने उस विष का पान कर लिया और उसे अपने कंठ में ही धारण कर लिया। विष के प्रभाव से उनका कंठ नीला पड़ गया और वे नीलकंठ कहलाए। विष की तीव्र ज्वाला से व्याकुल होकर भगवान शिव तीनों लोकों में भ्रमण करते रहे, लेकिन उन्हें कहीं भी शांति नहीं मिली। अंततः वे पृथ्वी पर एक पीपल वृक्ष के नीचे विराजमान हुए। मान्यता है कि उस समय सभी देवी-देवताओं ने अपनी दिव्य शक्तियां पीपल में समाहित कर भगवान शिव को शीतल छाया और प्राणदायिनी वायु प्रदान की। इसके बाद सभी देवताओं ने भगवान शिव पर जल अर्पित किया, जिससे विष का प्रभाव शांत हुआ। तभी से श्रावण मास में भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा प्रारंभ हुई।
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श्रीराम की शिवभक्ति बनी श्रावण जलाभिषेक की अमर प्रेरणाएक अन्य धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान श्रीराम ने भी श्रावण मास में सुल्तानगंज से गंगाजल लाकर देवघर स्थित वैद्यनाथ ज्योतिर्लिंग का जलाभिषेक किया था। तभी से श्रावण मास में जलाभिषेक और कांवड़ यात्रा की परंपरा विशेष रूप से प्रचलित हुई। आज भी लाखों श्रद्धालु हरिद्वार, काशी, सुल्तानगंज और अन्य तीर्थों से गंगाजल लेकर कांवड़ यात्रा करते हैं तथा भगवान शिव का जलाभिषेक कर उनकी कृपा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं।