आस्था की खुशबू ...भक्ति की महक, हर व्यक्ति को श्रद्धा से सराबोर कर देती है.. ईश्वर में विश्वास हमारे देश की परंपरा ही नहीं, बल्कि हर व्यक्ति के जीवन का अभिन्न हिस्सा बन गया है। भक्तिमय माहौल विचारों को शुद्ध करता है और मन को शांति देता है, जिसका एहसास आत्मा को छूता है। यही वजह है कि जब भी हमें कोई ख़ुशी मिलती है या मन की बात ईश्वर से करनी होती है, तो हमारे कदम मंदिरों की ओर चल पड़ते हैं। उत्तराखंड के चार धाम आस्था के वे पावन स्थल हैं, जहां सदियों से हमारी संस्कृति जीवंत रही है। मान्यता है कि यदि एक ही यात्रा में चारों धामों के दर्शन करने हों तो पहले यमुनोत्री, फिर गंगोत्री उसके बाद केदारनाथ और आखिर में बदरीनाथ जाना चाहिए।
Char Dham Yatra 2019 : जानें देवभूमि में की जाने वाली चार धाम की अद्भुत यात्रा का धार्मिक महत्व
समुद्र तल से 3293 मी. यानी 10804 फीट की ऊंचाई पर स्थित यमुनोत्री धाम, चार धाम यात्रा का पहला तीर्थ है। ऋषिकेश से यमुनोत्री की दूरी करीब 248 कि.मी. है। यमुनोत्री तीर्थ धार्मिक महत्त्व के साथ ही साथ मनमोहक प्राकृतिक सौंदर्य के कारण भी तीर्थ यात्रियों और पर्यटकों को आकर्षित करता है। यहां पर दिखाई देने वाले बर्फ से ढके ऊंचे पर्वत शिखर, देवदार और चीड़ के हरे-भरे जंगल, उनके बीच फैला कोहरा, बर्फीले पहाड़ों पर चांदी सी चमकती हुई सूर्य की रोशनी, पहाड़ों के बीच बहती सुगन्धित हवाओं की ध्वनि के साथ बहती हुई यमुना नदी की शीतल धारा मन को मोह लेती है। घुमावदार रास्ते, भूस्खलन, सुरक्षित यात्रा और जंगलों को बचाने के लिए जगह-जगह लिखे स्लोगन यात्रा पर आने वाले लोगों को उनकी ज़िम्मेदारी का एहसास कराते हैं।
पुराणों में यमुनोत्री के साथ असित ऋषि की कथा भी जुडी है। कहा जाता है कि वृद्धावस्था के कारण असित ऋषि कुंड में स्नान करने नहीं जा पाते थे। उनकी श्रद्धा देखकर यमुना स्वयं उनकी कुटिया में ही प्रकट हो गईं। इसी स्थान को यमुनोत्री कहा जाता है। कालिंद पर्वत से निकलने के कारण इसे कालिंदी भी कहा जाता है। माना जाता है कि यमुनोत्री धाम के कपाट खुलने वाले दिन अक्षय तृतीया को भगवान कृष्ण ने सूर्यपुत्री यमुना का वरण किया था। सूर्यपुत्री तथा शनि एवं यमराज की बहन यमुना मनुष्य को ग्रहजनित कष्टों से मुक्ति दिलाने वाली मानी जाती हैं।
बगलामुखी जयंती के अवसर पर अभीष्ट कार्य सिद्धि के लिए सामूहिक बगलामुखी अनुष्ठान 12 मई 2019, रविवार
यमुनोत्री में स्थित ग्लेशियर और गरम पानी के कुंड सभी पर्यटकों के आकर्षण का केंद्र हैं। मंदिर में दिव्य शिला है। मां यमुना के दर्शन और पूजा के साथ ही दिव्य शिला की पूजा की जाती है। इसी शिला के पास से गुफानुमा द्वार से जल की एक पतली धारा बहती है, यही यमुना का उद्गम स्थल है।
इस पवित्र स्थल के पास सप्तऋषि कुंड एवं सप्तसरोवर है, जिनमें तीर्थयात्री स्नान करके अपना जीवन धन्य करते हैं। प्रकृति का करिश्मा यहां स्थित सूर्यकुंड है। इसका जल इतना गरम है कि पोटली में डालकर चावल और आलू कुछ ही देर में पक जाते हैं। धर्मशास्त्रों के अनुसार कलयुग में यदि कोई मनुष्य यमुनोत्री तीर्थ यात्रा करके माँ यमुना का पूजन-दर्शन करता है, तो उसे शनि व यम का भय कभी नहीं सताता।
गंगोत्री धाम
गंगोत्री धाम समुद्र तल से 3415 मी. ऊंचाई पर स्थित है। सर्वप्रथम गंगा का अवतरण होने के कारण यह स्थान गंगोत्री कहलाया। उत्तरकाशी से 97 कि.मी. दूरी पर गंगोत्री मंदिर स्थित है। गंगा भारत की प्रमुख नदी है, जो हिमालय के पर्वतों से निकलकर पूर्व की ओर बहती हुई बड़े मैदानी इलाकों से गुज़रकर बंगाल की खाड़ी में मिल जाती है।

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