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Ratha Saptami 2026: रथ आरोग्य सप्तमी आज, जानिए धार्मिक महत्व, पूजाविधि और सफलता प्राप्ति के उपाय
धर्म डेस्क, अमर उजाला
Published by: विनोद शुक्ला
Updated Sun, 25 Jan 2026 06:21 AM IST
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सार
हिंदू धर्म में रथ सप्तमी का विशेष महत्व होता है। धार्मिक मान्यताओं के अनुसार रथ सप्तमी पर भगवान सूर्य का आविर्भाव हुआ। इस दिन सूर्य उपासना का खास महत्व होता है।
रथ सप्तमी पूजा विधि और महत्व
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
माघ मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि सूर्य नारायण की पूज -अर्चना के लिए श्रेयकर मानी गई है। इस तिथि को अचला सप्तमी, रथ आरोग्य सप्तमी और यदि यह रविवार के दिन हो तो इसे अचला भानू सप्तमी भी कहा जाता है। सप्तमी तिथि को भगवान सूर्य का आविर्भाव हुआ। भगवान सूर्य ने इसी दिन सारे जगत को अपने प्रकाश से आलोकित किया था। उन्हें अपनी भार्या संज्ञा उत्तरकुरु में और संतानें भी सप्तमी तिथि के दिन प्राप्त हुईं, अतः सप्तमी तिथि भगवान सूर्य को अतिप्रिय है।
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विश्वकर्मा द्वारा भगवान सूर्य ने इसी दिन अपना उत्तम दिव्य रूप प्राप्त किया था ,इसलिए इस दिन को सूर्य जयंती के रूप में भी मनाया जाता है । यह सप्तमी पुण्यदायिनी, पापविनाशिनी तथा कल्याणकारी है। भविष्य पुराण के अनुसार श्री कृष्ण ने सूर्य को संसार के प्रत्यक्ष देवता बताते हुए कहा है कि इनसे बढ़कर दूसरा कोई देवता नहीं है। सम्पूर्ण जगत इन्हीं से उत्पन्न हुआ है और अंत में इन्हीं में विलीन हो जाएगा। जिनके उदय होने से ही सारा संसार चेष्टावान होता है। जिनके हाथों से लोकपूजित ब्रह्मा और विष्णु तथा ललाट से शंकर उत्पन्न हुए हैं।
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रथ सप्तमी का धार्मिक महत्त्व
इस सप्तमी से सम्बंधित कथा का उल्लेख भविष्य पुराण में मिलता है। कथा के अनुसार श्री कृष्ण के पुत्र शाम्ब को अपने शारीरिक बल और सौष्ठव पर बहुत अधिक अभिमान हो गया था। अपने इसी अभिमान के मद में उन्होंने दुर्वासा ऋषि, जिनका शरीर तप से दुर्बल हो गया था , का अपमान कर दिया। शाम्ब की इस धृष्टता को देखकर उन्होंने शाम्ब को कुष्ठ होने का श्राप दे दिया । तब भगवान श्री कृष्ण ने शाम्ब को सूर्य भगवान की उपासना करने को कहा। शाम्ब ने आज्ञा मानकर सूर्य भगवान की आराधना आरम्भ कर दी जिसके फलस्वरूप उन्हें अपने कष्ट से मुक्ति मिल गई । इस सप्तमी को सूर्य भगवान की पूजा-अर्चना जो श्रद्धालु विधिवत तरीके से करते हैं उन्हें आरोग्य , अच्छी संतान व धन की प्राप्ति होती है।
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मनोरथ पूर्ण करती है पूजा
इस दिन प्रातः जल्दी उठकर किसी जलाशय , नदी अथवा घर में ही ताजा जल से स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें । तांबे के लोटे में पवित्र जल लेकर जल में अष्टगंध , लाल पुष्प व अक्षत डालकर ''ॐ सूर्याय नमः '' , इस सरल मंत्र से उदय होते सूर्य को अर्घ्य दें। तिल के तेल का दीपक इस दिन सूर्यनारायण के निमित्त अर्पित करें। उसके पश्चात्त ''ॐ घृणि सूर्याय नमः '' का जाप 108 बार करना चाहिए , संभव हो सके तो आदित्य हृदय स्त्रोत का पाठ भी करें । इस दिन अपाहिजों , गरीबों तथा ब्राह्मणों को अपनी सामर्थ्य के अनुसार जरूरत की वस्तुएं देनी चाहिए।
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आज के दिन सूर्य उपासना करने वालों के लिए एक समय नमक रहित भोजन अथवा फलाहार करने का विधान है। पुराणों के अनुसार व्रती को नीले वस्त्र धारण नहीं करने चाहिए अन्यथा पूजा निष्फल हो जाती है। पापों का हरण करने वाली इस रथ सप्तमी को भगवान सूर्य के निमित्त किया गया स्नान, दान, हवन, पूजा आदि सत्कर्म हजार गुना फलदायक हो जाता है। यदि कोई व्यक्ति भगवान सूर्य की मानसिक पूजा भी करता है तो वह भी समस्त आदि-व्याधियों से रहित होकर सुखपूर्वक जीवन व्यतीत करता है। जिस प्रकार भगवान भास्कर देव को कोहरा स्पर्श नहीं कर पाता, उसी प्रकार सूर्यनारायण की किसी ना किसी रूप में पूजा करने वाले साधक को किसी भी प्रकार की आपत्तियां स्पर्श नहीं कर पातीं। इस व्रत के प्रभाव से व्रती अपने अभीष्ट मनोरथ को प्राप्त करता है।
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