{"_id":"6a66db6a8ce54814e8034f04","slug":"from-matchbox-factory-to-commonwealth-games-2026-silver-raja-muthupandi-inspirational-journey-story-2026-07-27","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"Who is Raja Muthupandi: भाई ने छोड़ा अपना सपना, पिता ने की मजदूरी...मुथुपांडी ने CWG 2026 में जीत लिया रजत पदक","category":{"title":"Sports","title_hn":"खेल","slug":"sports"}}
Who is Raja Muthupandi: भाई ने छोड़ा अपना सपना, पिता ने की मजदूरी...मुथुपांडी ने CWG 2026 में जीत लिया रजत पदक
Mon, 27 Jul 2026 09:45 AM IST
स्वप्निल शशांक
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, ग्लास्गो
स्पोर्ट्स डेस्क, अमर उजाला, ग्लास्गो
Published by: स्वप्निल शशांक
Updated Mon, 27 Jul 2026 09:45 AM IST
सार
तमिलनाडु के कोविलपट्टी के रहने वाले राजा मुथुपांडी ने आर्थिक तंगी, गंभीर चोटों और कई सर्जरी जैसी मुश्किलों को पीछे छोड़ते हुए ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेल 2026 में पुरुषों के 65 किग्रा भारवर्ग का रजत पदक जीत लिया। कभी परिवार का पेट भरना सबसे बड़ी चुनौती था, लेकिन आज वही बेटा देश का नाम रोशन कर रहा है।
विज्ञापन
राजा मुथुपांडी
- फोटो : IANS
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
कुछ कहानियां सिर्फ पदक जीतने की नहीं होतीं, बल्कि उन सपनों की होती हैं जिन्हें गरीबी भी नहीं रोक पाती। भारतीय भारोत्तोलक राजा मुथुपांडी की कहानी भी ऐसी ही है। तमिलनाडु के एक छोटे से कस्बे से निकलकर राष्ट्रमंडल खेल 2026 के पोडियम तक पहुंचने वाले राजा ने सिर्फ रजत पदक नहीं जीता, बल्कि लाखों युवाओं को यह भरोसा भी दिलाया कि हालात कितने भी कठिन हों, हौसले उनसे बड़े हो सकते हैं।
विज्ञापन
ग्लास्गो में खेले जा रहे राष्ट्रमंडल खेलों में राजा ने पुरुषों के 65 किग्रा वर्ग में कुल 286 किग्रा (126 किग्रा स्नैच और 160 किग्रा क्लीन एंड जर्क) वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। स्वर्ण पदक मलयेशिया के मुहम्मद अजनिल बिन बिदिन (299 किग्रा) ने जीता, जबकि पापुआ न्यू गिनी के मोरिया बारू (282 किग्रा) को कांस्य मिला।
विज्ञापन
राजा मुथुपांडी
- फोटो : IANS
माचिस फैक्ट्री से शुरू हुआ सफर
12 जनवरी 2000 को तमिलनाडु के कोविलपट्टी में जन्मे राजा का बचपन अभावों में बीता। उनके पिता माचिस फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर हैं, जबकि मां एक मिठाई की दुकान में सफाई का काम करती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता था।
राजा के बड़े भाई ने सबसे पहले भारोत्तोलन शुरू किया था। राजा भी उनके साथ जिम जाने लगे। लेकिन घर की जिम्मेदारियों ने बड़े भाई को खेल छोड़ने पर मजबूर कर दिया। भाई ने अपने सपने कुर्बान किए ताकि परिवार चल सके, जबकि राजा ने उसी सपने को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली।
12 जनवरी 2000 को तमिलनाडु के कोविलपट्टी में जन्मे राजा का बचपन अभावों में बीता। उनके पिता माचिस फैक्ट्री में दिहाड़ी मजदूर हैं, जबकि मां एक मिठाई की दुकान में सफाई का काम करती हैं। परिवार की आर्थिक स्थिति इतनी कमजोर थी कि कई बार दो वक्त की रोटी जुटाना भी मुश्किल हो जाता था।
राजा के बड़े भाई ने सबसे पहले भारोत्तोलन शुरू किया था। राजा भी उनके साथ जिम जाने लगे। लेकिन घर की जिम्मेदारियों ने बड़े भाई को खेल छोड़ने पर मजबूर कर दिया। भाई ने अपने सपने कुर्बान किए ताकि परिवार चल सके, जबकि राजा ने उसी सपने को आगे बढ़ाने की जिम्मेदारी अपने कंधों पर उठा ली।
राजा मुथुपांडी
- फोटो : IANS
18 साल की उम्र में पहचान, फिर किस्मत ने लिया कठिन इम्तिहान
- राजा की प्रतिभा जल्द ही सामने आ गई। 2017 में उन्होंने कॉमनवेल्थ यूथ और जूनियर चैंपियनशिप में पदक जीतकर पहचान बनाई। इसके बाद सिर्फ 18 साल की उम्र में 2018 गोल्ड कोस्ट राष्ट्रमंडल खेलों में भारत का प्रतिनिधित्व किया और छठे स्थान पर रहे।
- इसके बाद उनकी जिंदगी में ऐसा दौर आया जिसने उन्हें तोड़कर रख दिया। 2019 से 2025 के बीच उन्होंने तीन बड़ी सर्जरी कराईं। पहले बाएं हाथ की कोहनी के लिगामेंट में गंभीर चोट लगी। फिर अपेंडिक्स का ऑपरेशन हुआ।
- इस दौरान उन्हें दो बार डेंगू और एक बार पीलिया भी हुआ, जिससे उनका वजन और फिटनेस दोनों प्रभावित हुए। जब वापसी की कोशिश की तो राष्ट्रीय चैंपियनशिप के दौरान बाएं घुटने का लिगामेंट भी फट गया और फिर ऑपरेशन कराना पड़ा।
राजा मुथुपांडी
- फोटो : IANS
एक समय खेल छोड़ने का भी बना मन
लगातार चोट, आर्थिक परेशानियां और लंबे समय तक पुनर्वास ने राजा को मानसिक रूप से भी झकझोर दिया था। भारतीय रेलवे में नौकरी मिलने के बाद उन्होंने खेल छोड़कर दूसरी राह चुनने का भी मन बना लिया था।
वह भुवनेश्वर में स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग का कोर्स करने पहुंचे, ताकि भविष्य में नया करियर बना सकें, लेकिन वहीं दूसरे खिलाड़ियों को अभ्यास करते देख उनके भीतर का खिलाड़ी फिर जाग उठा। दोस्तों और कोच ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्होंने एक बार फिर बारबेल उठाने का फैसला किया।
लगातार चोट, आर्थिक परेशानियां और लंबे समय तक पुनर्वास ने राजा को मानसिक रूप से भी झकझोर दिया था। भारतीय रेलवे में नौकरी मिलने के बाद उन्होंने खेल छोड़कर दूसरी राह चुनने का भी मन बना लिया था।
वह भुवनेश्वर में स्ट्रेंथ एंड कंडीशनिंग का कोर्स करने पहुंचे, ताकि भविष्य में नया करियर बना सकें, लेकिन वहीं दूसरे खिलाड़ियों को अभ्यास करते देख उनके भीतर का खिलाड़ी फिर जाग उठा। दोस्तों और कोच ने उनका हौसला बढ़ाया और उन्होंने एक बार फिर बारबेल उठाने का फैसला किया।
राजा मुथुपांडी
- फोटो : IANS
विजय शर्मा की देखरेख में बदली किस्मत
- राष्ट्रीय कोच विजय शर्मा के मार्गदर्शन में राजा ने नई शुरुआत की। 2025 कॉमनवेल्थ वेटलिफ्टिंग चैंपियनशिप में रजत पदक जीतकर उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर दमदार वापसी की।
- इसके बाद विश्व चैंपियनशिप में नौवां स्थान हासिल किया। फरवरी 2026 में सीनियर नेशनल चैंपियनशिप में 302 किग्रा कुल वजन उठाकर राष्ट्रीय रिकॉर्ड बनाया और ग्लास्गो राष्ट्रमंडल खेलों का टिकट भी पक्का कर लिया।
राजा मुथुपांडी
- फोटो : IANS
ग्लास्गो में पूरा हुआ वर्षों का सपना
ग्लास्गो में राजा ने 126 किग्रा स्नैच और 160 किग्रा क्लीन एंड जर्क के साथ कुल 286 किग्रा वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। यह उनके करियर का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है। पदक जीतने के बाद राजा ने अपनी सफलता अपने माता-पिता और कोच को समर्पित करते हुए भावुक अंदाज में कहा, 'यह पदक मेरे माता-पिता के नाम है। उन्होंने अपनी जरूरतों और कई बार अपने हिस्से का खाना तक छोड़कर मेरे सपने को जिंदा रखा। अगर उनका त्याग और मेरे कोच विजय शर्मा का भरोसा नहीं होता, तो मैं आज यहां तक नहीं पहुंच पाता।'
राजा मुथुपांडी की यह कहानी सिर्फ एक रजत पदक की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है जिसमें गरीबी हार गई, चोटें हार गईं और आखिर में जीत सिर्फ मेहनत, विश्वास और परिवार के त्याग की हुई। यही वजह है कि ग्लास्गो का यह रजत भारतीय खेल इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।
ग्लास्गो में राजा ने 126 किग्रा स्नैच और 160 किग्रा क्लीन एंड जर्क के साथ कुल 286 किग्रा वजन उठाकर रजत पदक अपने नाम किया। यह उनके करियर का सबसे बड़ा अंतरराष्ट्रीय पदक है। पदक जीतने के बाद राजा ने अपनी सफलता अपने माता-पिता और कोच को समर्पित करते हुए भावुक अंदाज में कहा, 'यह पदक मेरे माता-पिता के नाम है। उन्होंने अपनी जरूरतों और कई बार अपने हिस्से का खाना तक छोड़कर मेरे सपने को जिंदा रखा। अगर उनका त्याग और मेरे कोच विजय शर्मा का भरोसा नहीं होता, तो मैं आज यहां तक नहीं पहुंच पाता।'
राजा मुथुपांडी की यह कहानी सिर्फ एक रजत पदक की नहीं, बल्कि उस संघर्ष की है जिसमें गरीबी हार गई, चोटें हार गईं और आखिर में जीत सिर्फ मेहनत, विश्वास और परिवार के त्याग की हुई। यही वजह है कि ग्लास्गो का यह रजत भारतीय खेल इतिहास में लंबे समय तक याद रखा जाएगा।