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Ghost Guns: 3D-प्रिंटिंग तकनीक से बनी घोस्ट गन की हो सकेगी पहचान, वैज्ञानिकों ने खोजा ट्रेस करने का तरीका

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: सुयश पांडेय Updated Tue, 24 Feb 2026 12:02 PM IST
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सार

3D-Printed Ghost Guns: 3D-प्रिंटिंग तकनीक से बने हथियार अब तक 'अनट्रेसेबल' यानी बिना पहचान वाले हथियार माने जाते थे। लेकिन हाल के शोध में दावा किया गया है कि इनका पता लगाया जा सकता है। अध्ययन के अनुसार, 3D-प्रिंटिंग में इस्तेमाल होने वाले फिलामेंट की अलग रासायनिक पहचान होती है जिसे इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी जैसी तकनीक से ट्रेस किया जा सकता है।

3D-Printed 'Ghost Guns' May Not Be Untraceable: Study Finds Chemical Fingerprints
3-D प्रिटिंग तकनीक (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एक्स
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विस्तार

3D-प्रिंटिंग तकनीक ने एक तरफ जहां उद्योग, स्वास्थ्य और शिक्षा के क्षेत्र में नई संभावनाएं खोली हैं। वहीं दूसरी तरफ 3D-प्रिंटेड गन के रूप में इसका एक खतरनाक पहलू भी सामने आ रहा है। इन हथियारों के ब्लूप्रिंट इंटरनेट पर आसानी से उपलब्ध हैं। एक साधारण 3D प्रिंटर और थोड़ी तकनीकी जानकारी के सहारे कोई भी व्यक्ति घर पर बिना लाइसेंस की बंदूक तैयार कर सकता है। इसी वजह से इन्हें अक्सर 'घोस्ट गन' या 'अनट्रेसेबल हथियार' कहा जाता है।

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क्या होती है 3D-प्रिंटिंग तकनीक?

3D-प्रिंटिंग को एडिटिव मैन्युफैक्चरिंग भी कहा जाता है। यह एक ऐसी तकनीक है जिसमें कंप्यूटर पर बनी 3D डिजाइन (CAD फाइल) के आधार पर मशीन किसी चीज को परत-दर-परत बनाती है। इसमें प्लास्टिक, धातु या दूसरी सामग्री को थोड़ा-थोड़ा जोड़कर एक ठोस 3D वस्तु तैयार की जाती है। इस तकनीक की खास बात यह है कि इससे जटिल डिजाइन आसानी से बनाए जा सकते हैं। कोई भी प्रोटोटाइप जल्दी तैयार किया जा सकता है और सामग्री की बर्बादी भी कम होती है।

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'घोस्ट गन' का बढ़ता खतरा

पिछले साल ऑस्ट्रेलिया में हुई एक बड़ी कार्रवाई में सैकड़ों 3D-प्रिंटेड हथियार और उनके पुर्जे बरामद किए गए। चिंता की बात यह है कि 3D-प्रिंटेड हिस्सों को बाजार में मिलने वाले सामान्य हार्डवेयर पार्ट्स के साथ जोड़कर 'हाइब्रिड' हथियार भी बनाए जा सकते हैं। ये हथियार मजबूती और घातक क्षमता में फैक्ट्री में बने हथियारों के बराबर हो सकते हैं। ऐसे में कानून प्रवर्तन एजेंसियों के सामने सबसे बड़ी चुनौती यह है कि इन हथियारों के स्रोत तक कैसे पहुंचा जाए।

क्या सच में 'अनट्रेसेबल' हैं ये हथियार?

अब इसी चुनौती का संभावित समाधान सामने आया है। जर्नल फोरेंसिक केमिस्ट्री में प्रकाशित एक नए अध्ययन ने दावा किया है कि 3D-प्रिंटेड गन उतनी अनट्रेसेबल नहीं हैं, जितना अब तक माना जाता था। शोध में पाया गया है कि 3D प्रिंटर में इस्तेमाल होने वाले फिलामेंट यानी वह प्लास्टिक सामग्री जिससे ये हथियार प्रिंट किए जाते हैं। अपनी अलग रासायनिक पहचान रखते हैं। यही पहचान इन हथियारों को ट्रेस करने की कुंजी बन सकती है।

3D-प्रिंटिंग फिलामेंट क्या होते हैं?

3D-प्रिंटिंग फिलामेंट आमतौर पर अलग-अलग प्रकार के पॉलीमर यानी प्लास्टिक से बनाए जाते हैं। इनमें PLA (पॉलीलैक्टिक एसिड), ABS और PETG सबसे आम हैं। PLA एक बायोप्लास्टिक है, ABS अपनी मजबूती के लिए जाना जाता है और PETG लचीला और टिकाऊ होता है। हालांकि कई कंपनियां इन बेस प्लास्टिक में अतिरिक्त रसायन या एडिटिव्स मिलाती हैं। ताकि उत्पाद ज्यादा मजबूत, लचीला या आकर्षक दिखे। दिलचस्प बात यह है कि इन एडिटिव्स की पूरी जानकारी अक्सर पैकेजिंग पर नहीं दी जाती।

रिसर्च में क्या सामने आया?

शोधकर्ताओं ने इन्फ्रारेड स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीक की मदद से 60 से ज्यादा फिलामेंट सैंपल का विश्लेषण किया। यह तकनीक बताती है कि कोई पदार्थ इन्फ्रारेड रोशनी को किस तरह अवशोषित करता है। हर फिलामेंट का एक अलग 'इन्फ्रारेड प्रोफाइल' होता है जिसे उसकी केमिकल फिंगरप्रिंट कहा जा सकता है। यह अध्ययन ऑस्ट्रेलिया की फॉरेंसिक लैब केमसेंटर के सहयोग से किया गया। जांच में सामने आया कि देखने में एक जैसे लगने वाले कई फिलामेंट रासायनिक रूप से अलग थे। यहां तक कि एक ही प्रकार के पॉलीमर से बने दो फिलामेंट में भी अलग-अलग एडिटिव्स के कारण स्पष्ट अंतर पाया गया। एक सैंपल में तो ऐसा एडिटिव मिला जिसका जिक्र पैकेजिंग पर था ही नहीं।

इन निष्कर्षों का मतलब साफ है, अगर किसी 3D-प्रिंटेड गन के साथ इस्तेमाल हुआ फिलामेंट भी बरामद हो जाए। तो दोनों के बीच वैज्ञानिक रूप से एक पहचान स्थापित की जा सकती है। अलग-अलग मामलों में बरामद हथियारों को आपस में जोड़ा जा सकता है और सप्लाई चेन तक पहुंचने की संभावना बढ़ जाती है। यानी घोस्ट गन की जिसे पूरी तरह अनट्रेसेबल माना जाता था, अब उसकी पहचान की जा सकती है।

आगे की दिशा

हालांकि शोधकर्ता यह भी मानते हैं कि हर फिलामेंट को फिलहाल पूरी तरह अलग पहचानना संभव नहीं है। इसलिए आगे और उन्नत तकनीकों के जरिए फिलामेंट की विस्तृत रासायनिक और तत्वीय संरचना पर काम किया जा रहा है। लक्ष्य यह है कि जब भी कोई 3D-प्रिंटेड हथियार बरामद हो तो उसके केमिकल फिंगरप्रिंट के आधार पर यह पता लगाया जा सके कि वह किस सामग्री और किस प्रिंटर से बना है। स्पष्ट है कि तकनीक ने जहां एक नया खतरा पैदा किया है वहीं उसी तकनीक की मदद से उसका समाधान भी खोजा जा रहा है। अगर यह वैज्ञानिक तरीका व्यापक रूप से अपनाया जाता है तो 3D-प्रिंटेड घोस्ट गन के पीछे छिपना अब अपराधियों के लिए पहले जितना आसान नहीं रहेगा।

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