AI Plagiarism: चैटजीपीटी के युग में कैसे होगी पढ़ाई? प्रोफेसर्स ने खोज निकाला नया तरीका
Generative AI In College: कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में जेनेरेटिव एआई के बढ़ते इस्तेमाल ने पढ़ाई और परीक्षा की परंपरागत व्यवस्था को चुनौती दी है। रिसर्च बताती है कि अब छात्रों की केवल याददाश्त नहीं, बल्कि यह परखना जरूरी है कि वे एआई का जिम्मेदारी से और समझदारी के साथ उपयोग कैसे करते हैं।
विस्तार
आजकल कॉलेजों और यूनिवर्सिटीज में जेनेरेटिव एआई (जैसे चैटजीपीटी) का इस्तेमाल आम बात हो गई है। छात्र अपनी पढ़ाई के लिए और प्रोफेसर्स पढ़ाने के लिए इसका खूब इस्तेमाल कर रहे हैं। लेकिन यह सिर्फ एक नई टेक्नोलॉजी भर नहीं है, बल्कि इसने हमारे सीखने और परीक्षा लेने के तरीके को पूरी तरह बदल दिया है।
कनाडा के 28 प्रोफेसर्स और जानकारों के साथ किए गए हमारे रिसर्च से पता चला है कि शिक्षा के क्षेत्र में एक बहुत बड़ा बदलाव आ गया है। अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि जब कंप्यूटर का प्रोग्राम (एआई) इंसानों की तरह सोच सकता है और काम कर सकता है, तो हमें छात्रों की किस काबिलियत को परखना चाहिए? क्या हमें उनकी याददाश्त देखनी चाहिए या यह कि वे इस टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल कैसे करते हैं?
एआई और शैक्षणिक अखंडता पर शोध
पिछले 15 वर्षों की रिसर्च से यह साफ हो गया है कि पढ़ाई में एआई एक दोधारी तलवार की तरह है, जिसके अपने फायदे और नुकसान हैं। एक तरफ जहां एआई इंसानों जैसी भाषा लिखने में इतना माहिर हो चुका है कि नकल पकड़ना मुश्किल हो गया है और यह कभी-कभी गलत जानकारी या भेदभाव वाली बातें भी फैला देता है, वहीं दूसरी तरफ यह विकलांग छात्रों और नई भाषा सीखने वालों के लिए एक बेहतरीन मददगार भी साबित हो रहा है। चूंकि अब हर एआई टूल को ब्लॉक करना नामुमकिन है, इसलिए स्कूलों को अपना सारा ध्यान सिर्फ नकल पकड़ने पर खर्च करने के बजाय अपने नियमों को सुधारना चाहिए और छात्रों व शिक्षकों को यह सिखाना चाहिए कि वे इस टेक्नोलॉजी का सही और जिम्मेदारी से इस्तेमाल कैसे करें।
मूल्यांकन के तीन प्रमुख क्षेत्र
हमारे रिसर्च में शामिल शिक्षकों का मानना है कि उनका काम सिर्फ नकल पकड़ना नहीं, बल्कि ईमानदारी से पढ़ाई को बढ़ावा देना है। उन्होंने ऐसे तीन मुख्य तरीके बताए हैं जहां हम देख सकते हैं कि छात्र अपनी बुद्धि का इस्तेमाल कर रहे हैं या नहीं।
सही आदेश देना (प्रॉम्ट) भी एक कला
पहला है प्रॉम्प्टिंग, यानी एआई को सही निर्देश देना। अब इसे भी एक हुनर माना जा रहा है क्योंकि एआई से सही काम करवाने के लिए छात्र को अपनी बात साफ-साफ कहनी पड़ती है और बड़े काम को छोटे हिस्सों में बांटना पड़ता है। लेकिन यह तभी सही है जब छात्र इसे छुपकर नहीं बल्कि ईमानदारी से अपने ज्ञान के आधार पर करे। दूसरा तरीका है आलोचनात्मक सोच (क्रिटिकल थिंकिंग)। चूंकि एआई कई बार गलत या मनगढ़ंत बातें भी सच बोलकर बता देता है, इसलिए छात्रों को अब यह सिखाना जरूरी है कि वे एआई की बातों पर आंख बंद करके भरोसा न करें, बल्कि उसमें कमियां और गलतियां ढूंढें। आने वाले समय में दफ्तरों में भी इसकी बहुत जरूरत पड़ेगी।
ब्रेनस्टॉर्मिंग में एआई की मदद लेना ठीक लेकिन विचार खुद के हों
सबसे ज्यादा बहस लिखने (राइटिग) को लेकर है। यहां शिक्षकों ने साफ लक्ष्मण रेखा खींची है। लिखने के लिए नए विचार जुटाने (ब्रेनस्टॉर्मिंग) में एआई की मदद लेना ठीक है, बशर्ते विचार छात्र के अपने हों। अपनी लिखी हुई बात की ग्रामर सुधारने (एडिटिंग) के लिए भी एआई का इस्तेमाल तब सही है जब छात्र ने मूल बात खुद लिखी हो। लेकिन एआई से पूरा का पूरा लेख या ड्राफ्ट लिखवाना (ड्राफ्टिंग) बिल्कुल गलत माना गया है, क्योंकि शिक्षकों का मानना है कि जब छात्र खुद लिखने के लिए संघर्ष करता है, तभी उसका दिमाग असली मायने में विकसित होता है।
'पोस्ट-प्लैजिरिज्म' युग क्या है?
अब हम एक ऐसे दौर में पहुंच गए हैं जहां इंसान और एआई मिलकर लिख रहे हैं, और इस वजह से 'असली लेखकीय काम' की पुरानी परिभाषा बदल रही है। इसे 'पोस्ट-प्लैजिरिज्म' का नाम दिया गया है, जिसका मतलब यह कतई नहीं है कि अब चोरी या बेईमानी करना सही है। इसका असली मतलब यह है कि अगर कोई इंसान एआई की मदद लेकर कुछ नया बना रहा है, तो उसे सीधे तौर पर नकल या चोरी नहीं कहा जा सकता। आज की जरूरत यह है कि हम छात्रों को यह सिखाएं कि वे एआई को अपना दुश्मन नहीं, बल्कि एक साथी बनाकर उसके साथ मिलकर नई चीजें बनाना (को-क्रिएट) सीखें।
भविष्य के लिए पांच डिजाइन सिद्धांत
एआई के दौर में छात्रों की योग्यता को सही ढंग से परखने के लिए हमने 5 मुख्य बातें (सिद्धांत) सुझाई हैं:
सबसे पहले, नियम बिल्कुल साफ होने चाहिए। टीचर को पहले ही बता देना चाहिए कि किसी होमवर्क या प्रोजेक्ट में एआई की मदद लेनी है या नहीं, और अगर लेनी है तो कितनी। दूसरा, हमें सिर्फ अंतिम रिजल्ट नहीं, बल्कि काम करने के तरीके को देखना चाहिए। यानी छात्र ने शुरुआत कैसे की, नोट्स कैसे बनाए और खुद कितनी मेहनत की। तीसरा, छात्रों को ऐसे काम देने चाहिए जिनमें दिमाग ज्यादा लगे, जैसे कि किसी गंभीर समस्या पर अपनी राय देना या अपने आसपास के माहौल के हिसाब से फैसला लेना, जो एआई आसानी से नहीं कर सकता।
चौथी बात यह कि छात्रों को एआई की कमियां पहचानना सिखाना होगा, ताकि वे जान सकें कि एआई कहां गलती कर रहा है या कहां पक्षपात कर रहा है। और आखिरी सबसे जरूरी बात- छात्र की अपनी सोच को अहमियत देना। परीक्षा इस बात की होनी चाहिए कि छात्र ने कोई चीज कैसे सीखी और उसके बारे में उसकी अपनी क्या राय है, न कि सिर्फ इस बात की कि उसे कितनी जानकारी याद है।
