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Cloud Storage: फोन में जगह खत्म होते ही शुरू हो जाती है टेक कंपनियों की कमाई, समझिए क्लाउड स्टोरेज का पूरा खेल

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Nitish Kumar Updated Wed, 10 Jun 2026 07:16 PM IST
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सार

Cloud Subscription Business: स्मार्टफोन में स्टोरेज फुल होने की आम समस्या को टेक और टेलीकॉम कंपनियों ने अपने सबसे बड़े मुनाफे के धंधे में बदल दिया है। डेटा डिलीट न करने की आदत और एआई के बढ़ते इस्तेमाल के बीच, क्लाउड स्टोरेज अब एक बार की खरीद नहीं बल्कि हर महीने आने वाले जरूरी यूटिलिटी बिल में तब्दील हो चुका है।

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भारत में 60 अरब डॉलर का हो सकता है क्लाउड स्टोरेज मार्केट - फोटो : एआई जनरेटेड
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विस्तार

स्मार्टफोन इस्तेमाल करने वाले लगभग हर व्यक्ति ने कभी न कभी एक परेशानी का सामना किया होगा। कोई खास पल कैमरे में कैद करने वाले होते हैं और तभी स्क्रीन पर स्टोरेज फुल होने का नोटिफिकेशन आता है। फोन अचानक तस्वीरें लेना बंद कर देता है। व्हाट्सएप बैकअप, पुराने वीडियो, स्क्रीनशॉट, डाउनलोड फाइलें और अब AI से बनी तस्वीरें फोन की पूरी जगह घेर चुकी होती हैं। यहीं से शुरू होता है एक बड़ा बिजनेस। यूजर के सामने दो विकल्प होते हैं- या तो वे पुरानी फाइलें डिलीट करें, या फिर जेब ढीली करके क्लाउड पर एक्स्ट्रा स्पेस खरीद लें।

फोन की मेमोरी भरने से शुरू होती है अरबों डॉलर की कमाई

  • शुरुआत में यह परेशानी एक मामूली सी असुविधा जैसी लगती है। लेकिन आज इसी मामूली असुविधा को दुनिया की बड़ी तकनीकी कंपनियों ने अपने सबसे तेजी से बढ़ते और कभी न खत्म होने वाले सब्सक्रिप्शन बिजनेस में बदल दिया है। एक ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म IMARC Group के आंकड़े बताते हैं कि साल 2025 में भारत का क्लाउड स्टोरेज बाजार 5.43 अरब डॉलर का था, जो साल 2034 तक आते-आते लगभग 60 अरब डॉलर तक पहुंचने का अनुमान है। 
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  • यह बदलाव सिर्फ भारत में ही नहीं, बल्कि वैश्विक स्तर पर साफ दिखाई दे रहा है। अकेले Google One के पास साल 2025 में 15 करोड़ से ज्यादा पेड सब्सक्राइबर हो चुके हैं। कंपनियां अब स्टोरेज को सिर्फ डेटा बैकअप का जरिया नहीं मान रहीं, बल्कि इसे अपने एआई (AI) और डिजिटल इकोसिस्टम की मजबूत बुनियाद बना रही हैं।
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क्लाउड स्टोरेज के धंधे में उतरीं टेलीकॉम कंपनियां

अब टेलीकॉम कंपनियां भी इस बहती गंगा में हाथ धोने के लिए आगे आ चुकी हैं। एयरटेल ने अपने करोड़ों ग्राहकों तक स्टोरेज बेचने के लिए गूगल के साथ हाथ मिलाया है, तो दूसरी तरफ रिलायंस जियो ने अपना JioAICloud बाजार में उतार दिया है। इसके पीछे का बिजनेस मॉडल बेहद आसान और अचूक है। हम जितनी ज्यादा तस्वीरें खींचेंगे, जितने ज्यादा वीडियो और व्हाट्सएप बैकअप बनाएंगे, हमें उतने ही ज्यादा स्टोरेज की जरूरत होगी। चाहे आप ज्यादा मेमोरी वाला महंगा फोन खरीदें, iCloud का सब्सक्रिप्शन लें या Google One का प्लान, आपकी स्टोरेज की मजबूरी टेक कंपनियों के लिए हर महीने होने वाली पक्की कमाई का जरिया बन चुकी है।

आखिर इतनी जल्दी क्यों भर जाती है फोन की स्टोरेज?

  • आज के डिजिटल दौर में ई-कॉमर्स, इन्फ्लुएंसर इकोनॉमी, वर्क फ्रॉम होम, एआई और बिग डेटा की वजह से हर रोज अथाह डिजिटल कचरा पैदा हो रहा है। भारत में 5जी नेटवर्क के तेजी से फैलने के बाद भारी-भरकम फाइलों, हाई-रिजॉल्यूशन तस्वीरों और 4के वीडियो को अपलोड और शेयर करना बच्चों का खेल हो गया है। इस रफ्तार ने लोगों को ज्यादा से ज्यादा डेटा बनाने की लत लगा दी है।
  • इस खेल में व्हाट्सएप सबसे बड़ा विलेन बनकर उभरा है। सुबह के गुड मॉर्निंग मैसेज से लेकर दफ्तर के भारी-भरकम डॉक्यूमेंट्स, वीडियो और वॉयस नोट्स चुपचाप फोन में जमा होते रहते हैं। एंड्रॉयड फोन पर व्हाट्सएप का यह पूरा बैकअप आपके गूगल अकाउंट के उस मुफ्त 15GB स्टोरेज में जाता है, जहां पहले से ही जीमेल, गूगल फोटोज और गूगल ड्राइव अपना डेरा जमाए बैठे होते हैं। जैसे ही व्हाट्सएप बैकअप का आकार बढ़ता है, यूजर को न चाहते हुए भी पेड प्लान की तरफ कदम बढ़ाना ही पड़ता है।
  • इसके अलावा, स्मार्टफोन कंपनियों के बीच बेहतर कैमरे की जो होड़ मची है, उसने फाइलों का साइज कई गुना बढ़ा दिया है। अब सिर्फ कुछ सेकेंड का एक 4K वीडियो मोबाइल की सैकड़ों MB मेमोरी चट कर जाता है। अपनी यादों को सुरक्षित रखने के चक्कर में यूजर क्लाउड बैकअप खरीदने को मजबूर हो जाता है।

AI बना नई चुनौती: डेटा खाता भी है और बनाता भी है

  • आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी एआई टूल्स आज के समय में स्टोरेज की मांग को बढ़ाने वाले सबसे बड़े कारक बनकर उभरे हैं। एआई से फोटो एडिट करने, नई तस्वीरें या वीडियो जेनरेट करने पर हर बार एक नई फाइल बनती है जिसे संभाल कर रखना पड़ता है। टेक कंपनियां इस बात को बहुत अच्छे से समझती हैं। यही वजह है कि गूगल का 'एआई प्लस' प्लान अपने जेमिनी एआई टूल के साथ 200जीबी का क्लाउड स्टोरेज बंडल करके बेच रहा है।
  • हाइब्रिड क्लाउड प्लेटफॉर्म CTERA की एक रिपोर्ट इस समस्या के एक और दिलचस्प पहलू को उजागर करती है। एआई सिर्फ डेटा का उपभोग नहीं करता, बल्कि यह नया डेटा पैदा करता है। दफ्तरों में एआई टूल्स लगातार नई फाइलें, लॉग्स और डुप्लिकेट कॉपियां बनाते रहते हैं। यही ढर्रा अब आम उपभोक्ताओं के फोन में भी दिख रहा है, जहां एआई इमेज जनरेटर अलग-अलग वर्जन और कैशे फाइलें बनाकर चुपके से स्टोरेज को खत्म कर रहे हैं।

अब मासिक बिल बन चुका है स्टोरेज

आज स्टोरेज हर महीने आने वाले बिजली-पानी के बिल जैसा बन चुका है। बाजार की कीमतों पर नजर डालें तो एपल का iCloud आज भी केवल 5GB मुफ्त स्टोरेज देता है, जो साल 2011 से अब तक नहीं बदला है। इसके बाद भारत में उनके प्लान ₹75 से शुरू होकर ₹749 प्रति माह तक जाते हैं। वहीं Google One की शुरुआत ₹125 प्रति माह से होती है। इस बिजनेस मॉडल ने अल्फाबेट (गूगल की पैरेंट कंपनी) को सिर्फ विज्ञापनों पर निर्भर रहने के बजाय कमाई का एक ऐसा जरिया दे दिया है जो कभी बंद नहीं होने वाला है।

भविष्य में और बढ़ेगा यह कारोबार

  • विशेषज्ञों का मानना है कि क्लाउड स्टोरेज अब वैकल्पिक सेवा नहीं बल्कि बिजली और इंटरनेट की तरह एक नियमित जरूरत बनती जा रही है।
  • जैसे-जैसे एआई, 5G और डिजिटल कंटेंट का इस्तेमाल बढ़ेगा, वैसे-वैसे क्लाउड स्टोरेज पर निर्भरता भी बढ़ेगी। उपभोक्ताओं के लिए यह एक नया मासिक खर्च बन रहा है, जबकि टेक और टेलीकॉम कंपनियों के लिए यह सबसे भरोसेमंद कमाई के स्रोतों में से एक बन चुका है।
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