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IPL 2026: जानें आईपीएल की हर वो तकनीक जो हमें टीवी स्क्रीन पर दिखती है, अंपायर कैसे लेते हैं इतने सटीक फैसले?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Suyash Pandey Updated Mon, 30 Mar 2026 06:14 PM IST
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सार

IPL 2026 Technology: इंडियन प्रीमियर लीग का 19वां सत्र शुरू हो चुका है और इस बार के आईपीएल में सिर्फ बल्लेबाजों और गेंदबाजों का ही नहीं, बल्कि हाई-टेक तकनीक का भी बड़ा रोल रहने वाला है। इस सीजन में स्मार्ट रीप्ले सिस्टम से लेकर एआई-पावर्ड DRS और हॉट स्पॉट जैसी शानदार तकनीकें इस्तेमाल हो रही हैं। आज उन सभी तकनीकों के बारे में जानेंगे जो हमें टीवी पर विजुअल ग्राफिक्स के जरिए दिखाई देती हैं। इन तकनीकों से आईपीएल निष्पक्ष बनता है और अंपायरों की गलती की गुंजाइश खत्म हो जाती है। अगर आप क्रिकेट फैन हैं जो ये तकनीक आपको जरूर अच्छी लगेंगी।

IPL 2026 Tech Explained: Hawk-Eye, UltraEdge, Smart Stumps and AI Making Umpiring Almost Perfect
IPL 2026 - फोटो : AI
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विस्तार

IPL 2026 शुरू हो चुका है और इसका खुमार क्रिकेट फैंस के सिर चढ़कर बोल रहा है। इस साल क्रिकेट के मैदान पर ऐसे शानदार टेक टूल्स का इस्तेमाल हो रहा है, जिन्होंने अंपायरिंग को लगभग 100 प्रतिशत सटीक बना दिया है। हम बात कर रहे हैं क्रिकेट में इस्तेमाल होने वाली 'एडवांस्ड तकनीक' की, जिसका हर मैच में निष्पक्ष योगदान होता है। अब वो दिन गए जब अंपायर के एक गलत फैसले से मैच का नतीजा बदल जाता था। मैच में जब भी LBW या रन-आउट का कोई पेचीदा मामला फंसता है तो अंपायरों सटीक फैसले के लिए इसी आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल करते हैं। आज के इस लेख में हम जानेंगे कि IPL 2026 में कौन-कौन सी अत्याधुनिक तकनीकें इस्तेमाल हो रही हैं और ये कैसे काम करती है?

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1. हॉक-आई: गेंद का रास्ता बताने वाली 3D तकनीक

क्रिकेट मैदान पर सबसे अहम और भरोसेमंद तकनीकों में से एक है हॉक-आई, जो गेंद का सटीक रास्ता बताने वाली एक बेहतरीन 3D तकनीक है। इसे काम करने के लिए पूरे स्टेडियम के अलग-अलग कोनों में कई हाई-स्पीड कैमरे लगाए जाते हैं, जो छूटते ही गेंद की हर छोटी-बड़ी हरकत पर बारीकी से नजर रखते हैं। मैच के दौरान जब कोई गेंद बल्लेबाज के पैड पर जा टकराती है और LBW की जोरदार अपील होती है, तब यह तकनीक अपना कमाल दिखाती है। हॉक-आई इन कैमरों के डेटा और 3D ग्राफिक्स का इस्तेमाल करके टीवी स्क्रीन पर यह बिल्कुल साफ कर देती है कि गेंद आगे जाकर विकेट पर लगती या नहीं। इसी सटीक विजुअल की मदद से थर्ड अंपायर बिना किसी शक के अपना सही फैसला सुना पाते हैं।

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2. स्मार्ट रीप्ले सिस्टम 

यह सिस्टम थर्ड अंपायर (टीवी अंपायर) का सबसे अच्छा दोस्त है। इसमें अंपायर को 8 हाई-स्पीड कैमरों की लाइव फीड सीधे मिलती है। सबसे खास बात ये है कि हॉक-आई टेक्नोलॉजी के ऑपरेटर भी अंपायर के साथ ही बैठते हैं। इससे बिना समय बर्बाद किए झटपट और साफ रीप्ले देखे जा सकते हैं।

3. अल्ट्राएज और स्निकोमीटर: हर हल्की आवाज की पहचान

मैच के दौरान कई बार ऐसे मौके आते हैं जब गेंद बल्ले या पैड को इतनी बारीकी से छूकर निकलती है कि उसे अपनी आंखों से देख पाना या इंसानी कानों से सुन पाना लगभग नामुमकिन होता है। ऐसे पेचीदा मामलों में अल्ट्रा-एज और स्निकोमीटर जैसी तकनीकें अंपायरों के लिए मददगार साबित होती हैं।


यह सिस्टम स्टेडियम में लगे बेहद संवेदनशील ऑडियो सेंसर्स और हाई-स्पीड कैमरों के तालमेल पर काम करता है। जैसे ही गेंद बल्ले, पैड या शरीर के किसी हिस्से से टकराती है, यह तकनीक उस कंपन को पकड़ लेती है और तुरंत टीवी स्क्रीन पर एक ग्राफ के रूप में दिखा देती है। अगर ग्राफ में हलचल दिखती है तो इसका मतलब है कि संपर्क हुआ है। यही वजह है कि कैच-आउट और LBW जैसे करीबी फैसलों में यह तकनीक दूध का दूध और पानी का पानी कर देती है।

4. स्मार्ट स्टंप्स: पलक झपकते ही जलती हैं बत्तियां

आजकल क्रिकेट के मैदान पर इस्तेमाल होने वाले स्टंप्स सिर्फ लकड़ी के डंडे नहीं रह गए हैं, बल्कि वे पूरी तरह से हाई-टेक गैजेट्स में तब्दील हो चुके हैं। इन आधुनिक स्टंप्स और गिल्लियों के भीतर खास तरह के LED और माइक्रोचिप सेंसर्स लगे होते हैं, जो बेहद संवेदनशील होते हैं।

जैसे ही गेंद या खिलाड़ी का हाथ स्टंप्स को जरा सा भी छूता है, ये सेंसर्स उसे तुरंत डिटेक्ट कर लेते हैं और गिल्लियां पलक झपकते ही तेजी से चमकने लगती हैं। यह सिग्नल बिना किसी देरी के सीधे थर्ड अंपायर और ब्रॉडकास्ट टीम के पास पहुंचता है। इस तकनीक का सबसे बड़ा फायदा रन-आउट और बोल्ड के उन करीबी मामलों में मिलता है, जहां सेंटीमीटर का फासला भी हार-जीत तय कर सकता है। इसकी सटीकता की वजह से अब गलत फैसलों की गुंजाइश लगभग खत्म हो गई है।

5. एआई-पावर्ड DRS (एआई-एन्हांस्ड डीआरएस)

स्टेडियम में जब हजारों लोग चिल्ला रहे हों तो बल्ले का बारीक किनारा सुनना नामुमकिन है। यहीं काम आता है आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई)। यह तकनीक स्टेडियम के शोर-शराबे को फिल्टर कर देती है और सिर्फ बल्ले और गेंद के टकराने की आवाज को पकड़ती है, जिससे कैच-आउट के फैसले बेहद आसान हो जाते हैं।

6. हॉट स्पॉट: गर्मी से पता चलता है गेंद का सच

मैदान पर जब तकनीक की बात आती है तो हॉट स्पॉट अपनी सटीकता के मामले में सबसे अलग नजर आता है। यह एक बेहद दिलचस्प तकनीक है जो पूरी तरह से इन्फ्रारेड कैमरों पर आधारित है। असल में, यह तकनीक गेंद के टकराने वाली जगह की 'गर्मी' को भांप लेती है।

जब गेंद तेजी से बल्ले या पैड के किसी हिस्से से टकराती है तो उस घर्षण की वजह से उस खास जगह पर हल्की सी गर्मी पैदा होती है। हॉट स्पॉट के संवेदनशील कैमरे तुरंत इस हीट सिग्नेचर को पकड़ लेते हैं और टीवी स्क्रीन पर उस जगह को एक चमकदार सफेद निशान के रूप में दिखा देते हैं। इससे अंपायर को यह समझने में रत्ती भर भी संदेह नहीं रहता कि गेंद बल्ले को छूकर निकली है या सीधा पैड पर लगी है। मुश्किल और विवादित फैसलों को सुलझाने में यह तकनीक एक 'एक्स-रे' की तरह काम करती है।

7. 3D पिच व्यू (3D पिच व्यू)

यह तकनीक पूरे 20 ओवर में गेंद के बर्ताव (जैसे स्पिन या स्विंग) का एनालिसिस करती है। इससे न सिर्फ अंपायरों को मदद मिलती है, बल्कि टीमें भी यह समझ पाती हैं कि पिच कैसा खेल रही है।

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