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Tech Companies: ईरान-अमेरिका विवाद की चपेट में Apple-Google, जानें टेक कंपनियों पर क्यों मंडरा रहा खतरा?

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Suyash Pandey Updated Wed, 01 Apr 2026 04:33 PM IST
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सार

Iran Tech Companies Warning: ईरान और अमेरिका के बीच चल रहा विवाद अब एक नया और खतरनाक मोड़ ले चुका है। ईरान ने एपल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट जैसी 18 दिग्गज अमेरिकी टेक कंपनियों को 'आतंकी' घोषित कर दिया है। ईरान का दावा है कि इन कंपनियों की आधुनिक तकनीक और डेटा का इस्तेमाल अमेरिकी सेना कर रही है। इस लेख में जानेंगे कि आखिर टेक कंपनियों को इस युद्ध में क्यों घसीटा जा रहा है?

Iran Labels Apple, Google, Microsoft as ‘Terror Entities’ Amid Rising US-Israel Tensions
ईरान ने एपल, गूगल, माइक्रोसॉफ्ट आतंकी करार किया - फोटो : एआई
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विस्तार

ईरान, अमेरिका और इस्राइल के बीच चल रहा विवाद अब सिर्फ सीधे मिलिट्री हमलों तक सीमित नहीं रह गया है। ईरान ने अपने एक ताजा बयान में एपल जैसी कई बड़ी अमेरिकी टेक कंपनियों का नाम इस विवाद में घसीट लिया है। यह स्थिति की गंभीरता को पूरी तरह से बदल देता है। अब यह सिर्फ मिसाइलों और जवाबी कार्रवाई का मामला नहीं है, बल्कि उन कंपनियों को भी इस युद्ध में खींचा जा रहा है जिनका सीधे तौर पर किसी लड़ाई से कोई लेना-देना नहीं है।

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खास बातें 

ईरान ने एपल, गूगल और माइक्रोसॉफ्ट समेत 18 बड़ी टेक कंपनियों को आतंकी करार देते हुए एक बड़ा कदम उठाया है। इसके साथ ही, इन कंपनियों में काम करने वाले कर्मचारियों को तुरंत अपने दफ्तर खाली करने की सख्त चेतावनी भी दी गई है। ईरान का यह आक्रामक रुख मुख्य रूप से आधुनिक युद्ध और मिलिट्री ऑपरेशंस में इन प्राइवेट टेक कंपनियों की एडवांस तकनीक के इस्तेमाल को निशाना बनाने के मकसद से सामने आया है।

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ईरान ने क्या कहा है?

ईरान की सेना 'इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स' (IRGC) ने हाल ही में एपल, माइक्रोसॉफ्ट, गूगल, टेस्ला और बोइंग जैसी दुनिया की 18 दिग्गज अमेरिकी कंपनियों को आतंकी घोषित कर एक नई बहस छेड़ दी है। ईरान का दावा है कि ये टेक और एविएशन कंपनियां सीधे तौर पर अमेरिकी खुफिया एजेंसियों और मिलिट्री ऑपरेशंस के सिस्टम को सपोर्ट कर रही हैं। इससे अब ये भी हमले के संभावित निशाने पर आ गई हैं। इसी खतरे को देखते हुए, ईरान ने न सिर्फ इन कंपनियों के कर्मचारियों को दफ्तर छोड़ने की चेतावनी दी है, बल्कि आस-पास रहने वाले आम नागरिकों को भी सुरक्षा के लिहाज से इन इमारतों से दूर रहने की सलाह दी है।

चल रहे युद्ध से इसका क्या संबंध है?

मौजूदा हालात ईरान और अमेरिका-इस्राइल गुट के बीच शुरू हुए हमलों का ही एक हिस्सा हैं। मिलिट्री और सेनाओं के बीच का संघर्ष तो अपनी जगह जारी है, लेकिन अब इस विवाद का दायरा बढ़ गया है। अब सिर्फ मिलिट्री बेस पर हमले करने के बजाय, ईरान टेक्नोलॉजी और डेटा सिस्टम को भी इस पूरे विवाद की एक अहम कड़ी मान रहा है। यही वजह है कि टेक कंपनियों का नाम अब खुलकर सामने आ रहा है।

टेक कंपनियों को क्यों घसीटा जा रहा है?

आज के दौर में आधुनिक तकनीक ने युद्ध के पारंपरिक तरीकों को पूरी तरह बदल दिया है, यही वजह है कि अब टेक कंपनियां भी इस विवाद के केंद्र में आ गई हैं। दरअसल, वर्तमान समय के ज्यादातर डिफेंस और निगरानी सिस्टम पूरी तरह से डेटा, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और हाई-टेक कम्युनिकेशन नेटवर्क पर निर्भर करते हैं। खास बात यह है कि इनमें से कई एडवांस सिस्टम सरकारी एजेंसियों के बजाय प्राइवेट टेक कंपनियों द्वारा विकसित या सपोर्ट किए जाते हैं। ऐसे में, भले ही कोई कंपनी सीधे तौर पर हथियार न बना रही हो, लेकिन उसके सॉफ्टवेयर या तकनीक का इस्तेमाल कहीं न कहीं सैन्य अभियानों को मजबूती देने के लिए किया जाता है। ईरान का हालिया बयान इसी सोच को दर्शाता है, जहां अब 'नागरिक सेवाओं' और 'डिफेंस सिस्टम' के बीच की धुंधली रेखा लगभग खत्म हो चुकी है।

आगे इसके क्या नतीजे हो सकते हैं?

ईरान की इस चेतावनी ने मिडिल-ईस्ट और उसके आस-पास के क्षेत्रों में काम कर रही अंतरराष्ट्रीय कंपनियों के बीच डर और अनिश्चितता का माहौल पैदा कर दिया है। हालांकि, फिलहाल यह स्पष्ट नहीं है कि ईरान की ये धमकियां जमीनी स्तर पर कितनी गंभीर साबित होंगी, लेकिन वैश्विक कंपनियों को हाई-अलर्ट पर लाने के लिए यह कदम काफी है। यह पूरा विवाद इस बात का एक बड़ा संकेत है कि भविष्य के युद्ध अब सिर्फ सरहदों या पारंपरिक हथियारों तक सीमित नहीं रहेंगे। अब डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और उसे चलाने वाली टेक कंपनियां भी वैश्विक संघर्षों का सीधा हिस्सा बन रही हैं, जिससे युद्ध का पूरा चेहरा ही बदलता नजर आ रहा है।

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