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SC Notice: आरोपियों की फोटो और बर्बरता के वीडियो पर सुप्रीम कोर्ट खफा; केंद्र, राज्यों और Meta-X से मांगा जवाब
Tue, 18 Aug 2026 03:25 PM IST
नीतीश कुमार
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली
Published by: नीतीश कुमार
Updated Tue, 18 Aug 2026 03:25 PM IST
सार
सुप्रीम कोर्ट ने सोशल मीडिया पर पुलिस द्वारा आरोपियों की पहचान उजागर करने और उनके साथ अमानवीय व्यवहार दिखाने वाले पोस्ट पर सख्त रुख अपनाया है। अदालत ने इस मामले में केंद्र, सभी राज्यों और सोशल मीडिया कंपनियों को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है।
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कोर्ट ने सरकार और सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स को भेजा नोटिस
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने मंगलवार को एक अहम मामले में सुनवाई करते हुए केंद्र सरकार, सभी राज्यों, केंद्र शासित प्रदेशों के साथ-साथ सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म Meta और X को नोटिस जारी किया है। यह कदम एक जनहित याचिका (पीआईएल) पर उठाया गया है, जिसमें पुलिस संगठनों द्वारा आरोपियों की पहचान ऑनलाइन उजागर करने और उन्हें अमानवीय तरीके से पेश करने वाले पोस्ट पर तुरंत रोक लगाने की मांग की गई है।
पीठ ने सुनी याचिकाकर्ता की दलीलें
अमानवीय और अपमानजनक चित्रण पर आपत्ति
जनहित याचिका में पुलिस द्वारा अपनाए जाने वाले उन अमानवीय तौर-तरीकों का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है, जिन्हें सोशल मीडिया पर अक्सर महिमामंडित किया जाता है। याचिका के अनुसार, कई बार आरोपियों को हथकड़ी लगाए, रस्सियों से बांधे, डंडों से पीटे जाने, घुटनों के बल बिठाने या सीढ़ियों से घसीटने जैसी तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन साझा किए जाते हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस तरह के कृत्य सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं और अपराध साबित होने से पहले ही किसी भी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं।
सोशल मीडिया कंपनियों और राज्यों के लिए दिशानिर्देश की मांग
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पीठ ने सुनी याचिकाकर्ता की दलीलें
- चीफ जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना की पीठ ने इस संवेदनशील मामले पर सुनवाई की। अदालत ने पीआईएल याचिकाकर्ता हेमेंद्र पटेल की ओर से पेश हुए वरिष्ठ अधिवक्ता गोपाल शंकरनारायणन की दलीलों पर गौर किया। इस याचिका को एडवोकेट-ऑन-रिकॉर्ड श्रुतंजय भारद्वाज के माध्यम से दायर किया गया है।
- याचिका में मुख्य रूप से यह मांग की गई है कि राज्य सरकारों को निर्देश दिया जाए कि वे अपने पुलिस विभागों के आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल से उन सभी पोस्ट्स को तुरंत हटाएं, जिनमें आरोपियों के चेहरे दिखाए गए हैं या उनके साथ बर्बरता का प्रदर्शन किया गया है।
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अमानवीय और अपमानजनक चित्रण पर आपत्ति
जनहित याचिका में पुलिस द्वारा अपनाए जाने वाले उन अमानवीय तौर-तरीकों का भी प्रमुखता से जिक्र किया गया है, जिन्हें सोशल मीडिया पर अक्सर महिमामंडित किया जाता है। याचिका के अनुसार, कई बार आरोपियों को हथकड़ी लगाए, रस्सियों से बांधे, डंडों से पीटे जाने, घुटनों के बल बिठाने या सीढ़ियों से घसीटने जैसी तस्वीरें और वीडियो ऑनलाइन साझा किए जाते हैं। याचिकाकर्ता का तर्क है कि इस तरह के कृत्य सीधे तौर पर मानवाधिकारों का उल्लंघन हैं और अपराध साबित होने से पहले ही किसी भी व्यक्ति की गरिमा को ठेस पहुंचाते हैं।
सोशल मीडिया कंपनियों और राज्यों के लिए दिशानिर्देश की मांग
- इस याचिका में राज्यों को पुलिस संगठनों के लिए सोशल मीडिया के उपयोग को नियंत्रित करने वाले स्पष्ट दिशानिर्देश बनाने का निर्देश देने की मांग की गई है ताकि भविष्य में ऐसी सामग्री के प्रकाशन को रोका जा सके। केवल पुलिस ही नहीं, बल्कि फेसबुक और इंस्टाग्राम का मालिकाना हक रखने वाली कंपनी मेटा और एक्स कॉर्प को भी जवाबदेह ठहराने की अपील की गई है।
- याचिका में केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स और सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय सहित इन प्रमुख सोशल मीडिया कंपनियों से कहा गया है कि वे ऐसी नीतियां और यूजर गाइडलाइंस बनाएं जिससे किसी भी आरोपी की पहचान और उनके साथ होने वाले अमानवीय व्यवहार से जुड़ी सामग्री प्लेटफॉर्म पर पोस्ट न हो सके। इसके अलावा, अदालत से यह भी अपील की गई है कि अगर ऐसा कोई कंटेंट पहले से पोस्ट किया गया है, तो यूजर्स की रिपोर्ट पर उसे तुरंत हटाने के लिए एक औपचारिक, पारदर्शी और सुव्यवस्थित तंत्र स्थापित किया जाए।