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Social Media: अमेरिकी अदालत ने मेटा और यूट्यूब को माना लत लगाने का दोषी, लगा कड़ा जुर्माना, जानिए मामला

टेक डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली Published by: Suyash Pandey Updated Thu, 26 Mar 2026 12:57 PM IST
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सार

Meta Lawsuit Addiction: अमेरिका की एक अदालत ने एक एतिहासिक फैसले में मेटा और यूट्यूब को बच्चों को 'सोशल मीडिया की लत' लगाने और उनके मानसिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया है। एक 20 वर्षीय युवती के मामले में कोर्ट ने इन दिग्गज टेक कंपनियों पर लगभग 50 करोड़ रुपये ($6 मिलियन) का भारी जुर्माना लगाया है। 

US Jury Finds Meta and YouTube Liable for Addictive Design Harming Teen User
मेटा और यूट्यूब पर लगा कड़ा जुर्माना (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : एआई
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विस्तार

क्या सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स जानबूझकर बच्चों को अपनी लत लगा रहे हैं? अमेरिका की एक अदालत का यही मानना है। एक एतिहासिक फैसले में, लॉस एंजेलिस की एक जूरी ने मेटा और गूगल के यूट्यूब को एक युवा यूजर को नुकसान पहुंचाने का दोषी पाया है। अदालत ने माना कि इन कंपनियों के प्लेटफॉर्म्स का डिजाइन ऐसा है जो लत लगाता है। और मानना है कि प्लेटफार्म्स ने बच्चों और किशोरों को खतरों के प्रति चेतावनी देने में लापरवाही बरती है।

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क्या है पूरा मामला?

ये पूरा मामला 20 साल की एक युवती केली जी एम के जरिए दायर किए गए केस से शुरू हुआ, जिन्होंने सोशल मीडिया के घातक प्रभावों को अदालत के सामने रखा। केली की इन प्लेटफॉर्म्स के साथ जुड़ाव की कहानी उनके बचपन से ही शुरू हो गई थी। उन्होंने मात्र 6 साल की उम्र में यूट्यूब देखना शुरू किया और 9 साल की छोटी सी उम्र में अपना इंस्टाग्राम अकाउंट बना लिया था। समय बीतने के साथ सोशल मीडिया के इस्तेमाल की यह आदत एक गंभीर लत में बदल गई, जिसने उनके मानसिक स्वास्थ्य को बुरी तरह प्रभावित किया। केली को घबराहट, डिप्रेशन और बॉडी डिस्मॉर्फिया (अपने शरीर की बनावट को लेकर चिंता) जैसी गंभीर समस्याओं से जूझना पड़ा। अपनी स्थिति बयां करते हुए केली ने कोर्ट में कहा कि वह हर वक्त इन एप्स पर रहना चाहती थीं और उन्हें हमेशा यह डर सताता था कि अगर वह ऑनलाइन नहीं रहीं तो उनकी जिंदगी से कुछ बहुत जरूरी छूट जाएगा।

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अदालत का फैसला और जुर्माना

जूरी ने कंपनियों को दोषी मानते हुए केली को कुल 6 मिलियन डॉलर (करीब 50 करोड़ रुपये) का हर्जाना देने का आदेश दिया है। इसमें 3 मिलियन डॉलर नुकसान की भरपाई के लिए और 3 मिलियन डॉलर दंडात्मक हर्जाने के तौर पर शामिल हैं।

किसने क्या कहा?

अदालत में मामले की सुनवाई के दौरान दोनों पक्षों के बीच तीखी बहस देखने को मिली। पीड़िता के वकील मार्क लैनियर ने कंपनियों पर गंभीर आरोप लगाते हुए दलील दी कि मेटा और यूट्यूब ने जानबूझकर अपने प्लेटफॉर्म्स को इस तरह डिजाइन किया है कि बच्चे उनके आदी हो जाएं और उनसे चिपके रहें। उन्होंने कड़े शब्दों में कहा, "वे सब जानते थे। इसके बावजूद उन्होंने जानबूझकर बच्चों को अपना निशाना बनाया।"


वहीं दूसरी ओर, मेटा के सीईओ मार्क जकरबर्ग ने इन सभी दावों को सिरे से खारिज कर दिया। उन्होंने अपनी सफाई में कहा कि कंपनी का मुख्य उद्देश्य यूजर्स को उपयोगी सेवाएं देना है, न कि उनका ज्यादा से ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर खर्च करवाना। कंपनियों के बचाव पक्ष ने यह तर्क भी दिया कि पीड़िता की मानसिक समस्याओं के लिए अकेले सोशल मीडिया को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता। इसके पीछे निजी परिस्थितियां और बुलिंग जैसे अन्य बाहरी वजहों भी हो सकते हैं।

मेटा और यूट्यूब की प्रतिक्रिया 

अदालत के इस फैसले के बाद, टेक जगत की इन दोनों दिग्गज कंपनियों ने स्पष्ट कर दिया है कि वे इस फैसले को स्वीकार नहीं करेंगी और इसके खिलाफ ऊपरी अदालत में अपील करेंगी। मेटा के प्रवक्ता ने किशोरों के मानसिक स्वास्थ्य पर अपनी राय रखते हुए कहा कि यह एक बेहद जटिल और संवेदनशील मुद्दा है, जिसे किसी एक अकेले एप से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। वहीं, यूट्यूब ने अपना बचाव करते हुए कहा कि इस पूरे मामले में उनके प्लेटफॉर्म की भूमिका को गलत तरीके से पेश किया गया है। कंपनी के प्रवक्ता के अनुसार, यूट्यूब असल में एक 'वीडियो स्ट्रीमिंग प्लेटफॉर्म' है, जिसे जिम्मेदारी के साथ बनाया गया है, न कि यह कोई पारंपरिक सोशल मीडिया साइट है।

टेक इंडस्ट्री के लिए इसके क्या मायने हैं?

अदालत का ये फैसला सोशल मीडिया कंपनियों के लिए एक बहुत बड़ा झटका माना जा रहा है और इसे आने वाले समय के लिए एक 'टेस्ट केस' के रूप में देखा जा रहा है। इसका असर दूरगामी हो सकता है, क्योंकि वर्तमान में अकेले कैलिफोर्निया की अदालतों में मेटा, यूट्यूब, स्नैपचैट और टिकटॉक जैसी दिग्गज कंपनियों के खिलाफ ऐसे 3 हजार से ज्यादा मामले लंबित हैं। हाल ही में न्यू मैक्सिको में भी बाल सुरक्षा से जुड़े एक मामले में मेटा पर 375 मिलियन डॉलर का भारी-भरकम जुर्माना लगाया गया था। इन कानूनी लड़ाइयों के बीच अब दुनियाभर की सरकारें भी एक्शन में नजर आ रही हैं और सोशल मीडिया पर उम्र की पाबंदी, कड़े पैरेंटल कंट्रोल और प्लेटफॉर्म्स के 'एडिक्टिव फीचर्स' को सीमित करने के लिए सख्त नियम बनाने पर गंभीरता से विचार कर रही हैं।

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