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Ayodhya News: श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मना भगवान ऋषभदेव का जन्मोत्सव
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Thu, 12 Mar 2026 10:39 PM IST
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जैन मंदिर रायगंज में भगवान की प्रतिमा का अभिषेक करते रवींद्रकीर्ति स्वामी व अन्य।
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अयोध्या। रामनगरी में इन दिनों आस्था का वातावरण विशेष रूप से आलोकित है। एक ओर जहां चैत्र शुक्ल नवमी पर मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान राम के जन्मोत्सव की तैयारियां प्रारंभ हो चुकी हैं, वहीं उससे पूर्व जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर भगवान ऋषभदेव के जन्मकल्याणक का पावन उत्सव बृहस्पतिवार को श्रद्धा, भक्ति और उल्लास के साथ मनाया गया।
रायगंज स्थित जैन मंदिर में चैत्र कृष्ण नवमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की आस्था मानो शिखर को स्पर्श करती दिखाई दी।मंदिर के पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी के निर्देशन में सर्वप्रथम स्वर्ण पांडुकशिला पर 108 कलशों से भगवान का जन्माभिषेक किया गया। इस पावन अवसर पर आचार्य भद्रबाहुसागर, गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता और आर्यिका चंदनामती के सानिध्य में विविध धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। श्रद्धालुओं ने भगवान के मस्तक पर महाशांतिधारा कर विश्व शांति और मानव कल्याण की कामना की।
भक्ति का भाव उस समय और भी सजीव हो उठा जब अध्यात्म और अर्पिता जैन ने इंद्र-इंद्राणी की भूमिका में भगवान का अभिषेक किया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो युगों पूर्व घटित दिव्य जन्मोत्सव का दृश्य वर्तमान में साकार हो उठा हो। जन्मोत्सव की शुरुआत प्रातः भव्य रथयात्रा से हुई, जो हनुमानगढ़ी, रामपथ मुख्य मार्ग, तुलसी उद्यान और स्वर्गद्वार से होती हुई भगवान के जन्मस्थल टोंक तक पहुंची। वहां श्रद्धालुओं ने 1008 कमलों से सहस्रनाम मंत्रों के साथ भगवान की आराधना कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। दोपहर में रायगंज स्थित 31 फीट ऊंची खड्गासन मुद्रा में विराजमान भगवान ऋषभदेव की भव्य प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक किया गया। देश के विभिन्न प्रांतों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने जल, नारियल रस, संतरा रस, मौसमी रस और अनार रस जैसे पवित्र द्रव्यों से भगवान का अभिषेक कर अपनी श्रद्धा अर्पित की।
इनसेट
आदि संस्कृति निर्माता थे भगवान ऋषभदेव
रायगंज जैन मंदिर के पीठाधीश स्वामी रवींद्रकीर्ति ने इस अवसर पर कहा कि भगवान ऋषभदेव केवल जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ही नहीं, बल्कि विश्व संस्कृति के आदि पुरुष और भारतीय सभ्यता के आदि संस्कृति निर्माता भी हैं। उन्होंने मानव समाज को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प जैसे जीवन मूल्यों का मार्ग दिखाया, जिन पर आज भी मानव सभ्यता का आधार टिका है। उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती केवल एक उत्सवभर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।
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रायगंज स्थित जैन मंदिर में चैत्र कृष्ण नवमी के अवसर पर श्रद्धालुओं की आस्था मानो शिखर को स्पर्श करती दिखाई दी।मंदिर के पीठाधीश रवींद्रकीर्ति स्वामी के निर्देशन में सर्वप्रथम स्वर्ण पांडुकशिला पर 108 कलशों से भगवान का जन्माभिषेक किया गया। इस पावन अवसर पर आचार्य भद्रबाहुसागर, गणिनी प्रमुख ज्ञानमती माता और आर्यिका चंदनामती के सानिध्य में विविध धार्मिक अनुष्ठान संपन्न हुए। श्रद्धालुओं ने भगवान के मस्तक पर महाशांतिधारा कर विश्व शांति और मानव कल्याण की कामना की।
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भक्ति का भाव उस समय और भी सजीव हो उठा जब अध्यात्म और अर्पिता जैन ने इंद्र-इंद्राणी की भूमिका में भगवान का अभिषेक किया। ऐसा प्रतीत हुआ मानो युगों पूर्व घटित दिव्य जन्मोत्सव का दृश्य वर्तमान में साकार हो उठा हो। जन्मोत्सव की शुरुआत प्रातः भव्य रथयात्रा से हुई, जो हनुमानगढ़ी, रामपथ मुख्य मार्ग, तुलसी उद्यान और स्वर्गद्वार से होती हुई भगवान के जन्मस्थल टोंक तक पहुंची। वहां श्रद्धालुओं ने 1008 कमलों से सहस्रनाम मंत्रों के साथ भगवान की आराधना कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। दोपहर में रायगंज स्थित 31 फीट ऊंची खड्गासन मुद्रा में विराजमान भगवान ऋषभदेव की भव्य प्रतिमा का पंचामृत अभिषेक किया गया। देश के विभिन्न प्रांतों से पहुंचे श्रद्धालुओं ने जल, नारियल रस, संतरा रस, मौसमी रस और अनार रस जैसे पवित्र द्रव्यों से भगवान का अभिषेक कर अपनी श्रद्धा अर्पित की।
इनसेट
आदि संस्कृति निर्माता थे भगवान ऋषभदेव
रायगंज जैन मंदिर के पीठाधीश स्वामी रवींद्रकीर्ति ने इस अवसर पर कहा कि भगवान ऋषभदेव केवल जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ही नहीं, बल्कि विश्व संस्कृति के आदि पुरुष और भारतीय सभ्यता के आदि संस्कृति निर्माता भी हैं। उन्होंने मानव समाज को असि, मसि, कृषि, विद्या, वाणिज्य और शिल्प जैसे जीवन मूल्यों का मार्ग दिखाया, जिन पर आज भी मानव सभ्यता का आधार टिका है। उन्होंने कहा कि भगवान ऋषभदेव की जन्मजयंती केवल एक उत्सवभर नहीं, बल्कि भारतीय संस्कृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।