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UP: दिगंबर अखाड़ा से तीन पीढ़ियों का रिश्ता निभा रहे योगी, परमहंस रामचंद्रदास की पुण्यतिथि पर दिखी गुरु परंपरा

Fri, 14 Aug 2026 06:49 PM IST
Bhupendra Singh अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या
अमर उजाला नेटवर्क, अयोध्या Published by: Bhupendra Singh Updated Fri, 14 Aug 2026 06:49 PM IST
सार

सीएम योगी दिगंबर अखाड़ा से तीन पीढ़ियों का रिश्ता निभा रहे हैं। परमहंस रामचंद्र दास की पुण्यतिथि पर गुरु परंपरा और राम मंदिर आंदोलन की स्मृतियों को नमन किया। आगे पढ़ें पूरी खबर...

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Cm Yogi upholding three-generation bond with Digambar Akhada
दिगंबर अखाड़ा में सीएम योगी। - फोटो : संवाद न्यूज एजेंसी।

विस्तार

मुख्यमंत्री एवं गोरक्ष पीठाधीश्वर योगी आदित्यनाथ का अयोध्या के दिगंबर अखाड़े से रिश्ता केवल औपचारिक या धार्मिक नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों से चली आ रही गुरु परंपरा, वैचारिक निकटता और आत्मीय संबंधों का प्रतीक है। शुक्रवार को ब्रह्मलीन महंत रामचंद्र दास परमहंस की पुण्य तिथि पर दिगंबर अखाड़े पहुंचकर योगी आदित्यनाथ ने इस विरासत को एक बार फिर जीवंत कर दिया।

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गोरक्षपीठ और दिगंबर अखाड़े का संबंध राम जन्मभूमि आंदोलन के संघर्ष काल से जुड़ा रहा है। इसकी नींव गोरक्षपीठ के पूर्व पीठाधीश्वर महंत दिग्विजयनाथ ने रखी, जिन्होंने अयोध्या के संत समाज के साथ मिलकर राम जन्मभूमि आंदोलन को वैचारिक आधार दिया। उनके उत्तराधिकारी महंत अवैद्यनाथ और दिगंबर अखाड़े के महंत रामचंद्र दास परमहंस इस आंदोलन के दो प्रमुख स्तंभ बने। आंदोलन के दौरान जब भी महंत अवेद्यनाथ अयोध्या आते, उनका ठिकाना दिगंबर अखाड़ा ही होता था। दोनों संतों के बीच केवल आंदोलन का नहीं, बल्कि गहरी आत्मीयता का संबंध था।
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उसी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ आज भी हर वर्ष परमहंस रामचंद्र दास की पुण्यतिथि पर दिगंबर अखाड़ा पहुंचते हैं। मुख्यमंत्री बनने के बाद भी उन्होंने इस परंपरा को नहीं टूटने दिया। यही कारण है कि उनका यह दौरा केवल श्रद्धांजलि कार्यक्रम नहीं, बल्कि तीन पीढ़ियों से चले आ रहे आध्यात्मिक और वैचारिक रिश्ते की निरंतरता के रूप में देखा जाता है।

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व्यक्तिगत संबंधों को भावुक होकर सीएम ने किया याद

कार्यक्रम में अपने संबोधन के दौरान मुख्यमंत्री ने परमहंस रामचंद्र दास महाराज के साथ अपने व्यक्तिगत संबंधों को भी भावुक होकर याद किया। उन्होंने बताया कि जब वे लखनऊ जाते थे तो उन्हें उनके पूज्य गुरुदेव महंत अवेद्यनाथ विशेष रूप से निर्देश देते थे कि अयोध्या होकर जाना और परमहंस महाराज का आशीर्वाद लेकर ही आगे बढ़ना। परमहंस जी जब गोरखपुर आते थे, तो गोरक्षपीठ के दरवाजे उनके लिए हमेशा खुले रहते थे। यह केवल गुरुजनों का सम्मान नहीं, बल्कि एक ऐसे पारिवारिक रिश्ते का प्रमाण था, जो वर्षों की श्रद्धा, विश्वास और अपनत्व से बना था।

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