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Ayodhya News: मंदिर निर्माण के हर फैसले में नृपेंद्र मिश्रा की केंद्रीय भूमिका
Fri, 21 Aug 2026 12:35 AM IST
लखनऊ ब्यूरो
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
संवाद न्यूज एजेंसी, अयोध्या
Updated Fri, 21 Aug 2026 12:35 AM IST
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चंपत राय।
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अयोध्या। श्रीराम जन्मभूमि तीर्थ क्षेत्र के पूर्व महासचिव चंपत राय ने मंदिर निर्माण समिति के अध्यक्ष नृपेंद्र मिश्रा की भूमिका और कार्यशैली का विस्तार से उल्लेख किया है। 18 अगस्त को जारी नौ पृष्ठों के दस्तावेज में उन्होंने कहा है कि मंदिर निर्माण से जुड़े सभी निर्णय निर्माण समिति में होते थे और हर निर्णय में नृपेंद्र मिश्रा की प्रमुख भूमिका रहती थी। समिति की बैठक सामान्य तौर पर हर माह होती थी और कुछ समय तक 15 दिन में एक बार भी बैठक हुई।
चंपत राय के अनुसार नृपेंद्र मिश्रा ने मंदिर निर्माण समिति में अपनी सहायता के लिए अपनी रुचि के कुछ लोगों को जोड़ा था। इनमें एक व्यक्ति को पिछले छह वर्षों में एक-दो बार ही अयोध्या बुलाया गया, जबकि दूसरे से सुरक्षा संबंधी सुझाव लिए गए। पूर्व एनबीसीसी चेयरमैन अनूप मित्तल लगातार नृपेंद्र मिश्रा के साथ समिति की बैठकों में शामिल होते रहे। चंपत राय ने बताया कि अनूप मित्तल सिविल इंजीनियर हैं और इंजीनियरिंग मामलों में नृपेंद्र मिश्रा के सलाहकार की भूमिका निभाते थे।
दस्तावेज में चंपत राय ने कहा है कि मंदिर निर्माण समिति में ही निर्माण से जुड़े निर्णय लिए जाते थे। उनके मुताबिक ऐसा एक भी कार्य नहीं हुआ, जिसका निर्णय समिति में न हुआ हो। यदि कोई निर्णय कर भी लिया गया और समिति से उसकी स्वीकृति नहीं हुई तो उसे मान्य नहीं किया गया और कुछ कर दिया गया तो उसे हटाया भी गया। चंपत राय ने लिखा है कि मंदिर निर्माण के सभी निर्णयों के लिए नृपेंद्र मिश्रा ने सदैव स्वयं को प्रमुख रखा।
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एलएंडटी और टाटा के चयन में भी भूमिका
- दस्तावेज के अनुसार मंदिर निर्माण के लिए लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) को चुना गया और समकक्ष स्तर की प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के लिए टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (टीसीई) का चयन किया गया। मंदिर के वास्तुकार के रूप में अहमदाबाद निवासी चंद्रकांत भाई सोमपुरा को 1986 में अशोक सिंहल ने चुना था और उन्हें ही आगे भी रखा गया। वहीं अन्य भवनों के निर्माण के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट फर्म और उसके प्रमुख जय कानिटकर का चयन नृपेंद्र मिश्रा ने किया।
रामकथा संग्रहालय की योजना को भी आगे बढ़ाया
- अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय को लेकर भी नृपेंद्र मिश्रा की भूमिका का उल्लेख किया गया है। चंपत राय के अनुसार नृपेंद्र मिश्रा ने विचार किया कि उत्तर प्रदेश सरकार और ट्रस्ट के अलग-अलग संग्रहालय बनाने के बजाय मौजूदा संग्रहालय को ही विकसित करना अधिक व्यवहारिक होगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार से बातचीत हुई और 30 वर्ष के लिए संग्रहालय भवन ट्रस्ट को लीज पर मिला। इसके बाद संग्रहालय के जीर्णोद्धार और विकास की जिम्मेदारियां तय की गईं।
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चंपत राय के अनुसार नृपेंद्र मिश्रा ने मंदिर निर्माण समिति में अपनी सहायता के लिए अपनी रुचि के कुछ लोगों को जोड़ा था। इनमें एक व्यक्ति को पिछले छह वर्षों में एक-दो बार ही अयोध्या बुलाया गया, जबकि दूसरे से सुरक्षा संबंधी सुझाव लिए गए। पूर्व एनबीसीसी चेयरमैन अनूप मित्तल लगातार नृपेंद्र मिश्रा के साथ समिति की बैठकों में शामिल होते रहे। चंपत राय ने बताया कि अनूप मित्तल सिविल इंजीनियर हैं और इंजीनियरिंग मामलों में नृपेंद्र मिश्रा के सलाहकार की भूमिका निभाते थे।
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दस्तावेज में चंपत राय ने कहा है कि मंदिर निर्माण समिति में ही निर्माण से जुड़े निर्णय लिए जाते थे। उनके मुताबिक ऐसा एक भी कार्य नहीं हुआ, जिसका निर्णय समिति में न हुआ हो। यदि कोई निर्णय कर भी लिया गया और समिति से उसकी स्वीकृति नहीं हुई तो उसे मान्य नहीं किया गया और कुछ कर दिया गया तो उसे हटाया भी गया। चंपत राय ने लिखा है कि मंदिर निर्माण के सभी निर्णयों के लिए नृपेंद्र मिश्रा ने सदैव स्वयं को प्रमुख रखा।
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एलएंडटी और टाटा के चयन में भी भूमिका
- दस्तावेज के अनुसार मंदिर निर्माण के लिए लार्सन एंड टुब्रो (एलएंडटी) को चुना गया और समकक्ष स्तर की प्रोजेक्ट मैनेजमेंट कंसल्टेंसी के लिए टाटा कंसल्टिंग इंजीनियर्स (टीसीई) का चयन किया गया। मंदिर के वास्तुकार के रूप में अहमदाबाद निवासी चंद्रकांत भाई सोमपुरा को 1986 में अशोक सिंहल ने चुना था और उन्हें ही आगे भी रखा गया। वहीं अन्य भवनों के निर्माण के लिए नोएडा की डिजाइन एसोसिएट फर्म और उसके प्रमुख जय कानिटकर का चयन नृपेंद्र मिश्रा ने किया।
रामकथा संग्रहालय की योजना को भी आगे बढ़ाया
- अंतरराष्ट्रीय रामकथा संग्रहालय को लेकर भी नृपेंद्र मिश्रा की भूमिका का उल्लेख किया गया है। चंपत राय के अनुसार नृपेंद्र मिश्रा ने विचार किया कि उत्तर प्रदेश सरकार और ट्रस्ट के अलग-अलग संग्रहालय बनाने के बजाय मौजूदा संग्रहालय को ही विकसित करना अधिक व्यवहारिक होगा। इसके बाद उत्तर प्रदेश सरकार से बातचीत हुई और 30 वर्ष के लिए संग्रहालय भवन ट्रस्ट को लीज पर मिला। इसके बाद संग्रहालय के जीर्णोद्धार और विकास की जिम्मेदारियां तय की गईं।