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Almora News: लखौरिया मिर्च की महक खोई, खंडहरों में बदलते जा रहे घर
संवाद न्यूज एजेंसी, अल्मोड़ा
Updated Tue, 31 Mar 2026 11:58 PM IST
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स्याल्दे (अल्मोड़ा)। कभी लखौरिया मिर्च, गहत और भट के उत्पादन से पहचानी जाने वाली नैल ग्राम सभा आज उजाड़ होती जा रही है। सड़क और बुनियादी सुविधाओं के अभाव में यहां के ज्यादातर गांव धीरे-धीरे खाली हो रहे हैं। बड़े-बड़े पुश्तैनी मकान अब खंडहर में तब्दील हो रहे हैं और बाखलियों में सन्नाटा पसरा है।
स्याल्दे विकास खंड के लगभग सभी हिस्सों में पलायन बढ़ताा जा रहा है। नैल ग्राम सभा क्षेत्र की सबसे बड़ी ग्राम सभाओं में शामिल है। इसके अंतर्गत ग्वालड़ी, तिमलढय्या, बगजिबौला, सैला, गगनौला, शीसरौला, जैराज, ठाड़ीधार और नैल जैसे नौ तोक आते हैं। एक दशक पहले इन गांवों में करीब 250 परिवार रहते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग 150 रह गई है। यानी करीब 100 परिवार पलायन कर चुके हैं।
कई तोकों के पूरी तरह खाली होने की ओर बढ़ रहे हैं। घरों के दरवाजों पर जड़े ताले अपने मालिकों के अगली पीढ़ी के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। गांव में रह रहे लोगों ने बताया कि जो ग्रामीण रोजगार और बेहतर शिक्षा के लिए शहरों की ओर गए वे लौटकर अपने पैतृक घरों को देखने तक नहीं आए। उनका कहना है कि सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं तो आने वाले वर्षों में नैल ग्राम सभा के गांव पूरी तरह खाली हो सकते हैं।
बंजर होने लगे उपजाऊ खेत
नैल ग्राम सभा का क्षेत्रफल लगभग 300 हेक्टेयर है। इसमें से करीब 150 हेक्टेयर भूमि उपजाऊ है। यहां महुआ, गहत, उड़द, चौलाई, हल्दी, भट और विशेष रूप से लखौरिया मिर्च की परंपरागत खेती होती रही है। यही फसलें ग्रामीणों की आय का प्रमुख साधन रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में पलायन के चलते खेती प्रभावित हुई है और धीरे-धीरे खेत बंजर होने लगे हैं। जो किसान खेती कर भी रहे हैं उनकी फसल जंगली सुअर और बंदर बर्बाद कर देते हैं। जंगली जानवरों पर प्रभावी नियंत्रण न होने से किसान खेती करना छोड़ रहे हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
नैल ग्राम सभा के कई तोक आज भी मुख्य सड़क से नहीं जुड़े हैं। दुर्गम पैदल रास्तों से ही यहां पहुंचा जा सकता है। बीमार और दिव्यांग लोगों को कई किलोमीटर तक डोली के सहारे सड़क तक लाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव ने पलायन को और तेज किया है।
खाली होते स्कूल दे रहे गवाही
पलायन का असर शिक्षा पर भी साफ दिखाई दे रहा है। इंटर कॉलेज में जहां पहले करीब 150 छात्र पढ़ते थे, अब संख्या घटकर 65 रह गई है। प्राथमिक विद्यालय में भी पहले 80 बच्चे थे, जो अब घटकर केवल 15 रह गए हैं। खाली होते स्कूल गांवों की बदलती तस्वीर बयान कर रहे हैं।
एक दशक में पलायन की स्थिति
तोक का नाम : पहले परिवार : पलायन कर चुके
तिमलढय्या : 25 : 21
जैराज : 21 : 6
ठाड़ीधार : 21 : 6
मल्ली बाखली : 36 : 8
नैल गांव : 135 : 50
सेला : 15 : 6
पहले गांव में हर आंगन में चहल-पहल रहती थी। पुरुष नौकरी के लिए बाहर जाते थे लेकिन परिवार गांव में ही रहते थे। पिछले दस वर्षों में हालात बदल गए। नौकरीपेशा लोग परिवार समेत बाहर बस गए और अब गांव में वही परिवार बचे हैं जो बेरोजगार हैं या खेती के सहारे जीवन चला रहे हैं। -बालम सिंह
पलायन ने गांव की तस्वीर बदल दी है। पहले लोग खेती-किसानी और छोटे व्यवसाय करते थे। लखौरिया मिर्च की खेती से अच्छी आमदनी होती थी लेकिन अब जंगली जानवर और बंदर फसलें चौपट कर देते हैं। इससे लोगों का खेती से मोहभंग हुआ और परिवार के भरण-पोषण के लिए शहरों की ओर रुख करना पड़ा। -सुनील घुगत्याल
अब गांव पहले जैसे नहीं रहे। जहां कभी बच्चों की किलकारियां और बुजुर्गों के ठहाके सुनाई देते थे वहां सन्नाटा पसरा है। खाली पड़ी बाखलियां पलायन की कहानी कह रही हैं। अगर यहां रोजगार के साधन होते तो गांव आज भी खुशहाल होते। -आनंद सिंह
एक दशक में सब कुछ बदल गया। जिन साथियों के साथ बचपन बीता वे शहरों में बस चुके हैं। गांव में अब वही परिवार हैं जो खेती से गुजर-बसर कर रहे हैं। अब तो खेती भी मुश्किल हो गई है। बारिश अनिश्चित है और बची-खुची फसल जंगली सुअर और बंदर नष्ट कर देते हैं। -अमर सिंह
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स्याल्दे विकास खंड के लगभग सभी हिस्सों में पलायन बढ़ताा जा रहा है। नैल ग्राम सभा क्षेत्र की सबसे बड़ी ग्राम सभाओं में शामिल है। इसके अंतर्गत ग्वालड़ी, तिमलढय्या, बगजिबौला, सैला, गगनौला, शीसरौला, जैराज, ठाड़ीधार और नैल जैसे नौ तोक आते हैं। एक दशक पहले इन गांवों में करीब 250 परिवार रहते थे, लेकिन अब यह संख्या घटकर लगभग 150 रह गई है। यानी करीब 100 परिवार पलायन कर चुके हैं।
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कई तोकों के पूरी तरह खाली होने की ओर बढ़ रहे हैं। घरों के दरवाजों पर जड़े ताले अपने मालिकों के अगली पीढ़ी के लौटने का इंतजार कर रहे हैं। गांव में रह रहे लोगों ने बताया कि जो ग्रामीण रोजगार और बेहतर शिक्षा के लिए शहरों की ओर गए वे लौटकर अपने पैतृक घरों को देखने तक नहीं आए। उनका कहना है कि सड़क, शिक्षा, स्वास्थ्य और कृषि सुरक्षा से जुड़ी सुविधाएं उपलब्ध नहीं कराई गईं तो आने वाले वर्षों में नैल ग्राम सभा के गांव पूरी तरह खाली हो सकते हैं।
बंजर होने लगे उपजाऊ खेत
नैल ग्राम सभा का क्षेत्रफल लगभग 300 हेक्टेयर है। इसमें से करीब 150 हेक्टेयर भूमि उपजाऊ है। यहां महुआ, गहत, उड़द, चौलाई, हल्दी, भट और विशेष रूप से लखौरिया मिर्च की परंपरागत खेती होती रही है। यही फसलें ग्रामीणों की आय का प्रमुख साधन रही हैं। पिछले कुछ वर्षों में पलायन के चलते खेती प्रभावित हुई है और धीरे-धीरे खेत बंजर होने लगे हैं। जो किसान खेती कर भी रहे हैं उनकी फसल जंगली सुअर और बंदर बर्बाद कर देते हैं। जंगली जानवरों पर प्रभावी नियंत्रण न होने से किसान खेती करना छोड़ रहे हैं।
स्वास्थ्य सुविधाओं का अभाव
नैल ग्राम सभा के कई तोक आज भी मुख्य सड़क से नहीं जुड़े हैं। दुर्गम पैदल रास्तों से ही यहां पहुंचा जा सकता है। बीमार और दिव्यांग लोगों को कई किलोमीटर तक डोली के सहारे सड़क तक लाना पड़ता है। ग्रामीणों का कहना है कि सड़क और स्वास्थ्य सुविधाओं के अभाव ने पलायन को और तेज किया है।
खाली होते स्कूल दे रहे गवाही
पलायन का असर शिक्षा पर भी साफ दिखाई दे रहा है। इंटर कॉलेज में जहां पहले करीब 150 छात्र पढ़ते थे, अब संख्या घटकर 65 रह गई है। प्राथमिक विद्यालय में भी पहले 80 बच्चे थे, जो अब घटकर केवल 15 रह गए हैं। खाली होते स्कूल गांवों की बदलती तस्वीर बयान कर रहे हैं।
एक दशक में पलायन की स्थिति
तोक का नाम : पहले परिवार : पलायन कर चुके
तिमलढय्या : 25 : 21
जैराज : 21 : 6
ठाड़ीधार : 21 : 6
मल्ली बाखली : 36 : 8
नैल गांव : 135 : 50
सेला : 15 : 6
पहले गांव में हर आंगन में चहल-पहल रहती थी। पुरुष नौकरी के लिए बाहर जाते थे लेकिन परिवार गांव में ही रहते थे। पिछले दस वर्षों में हालात बदल गए। नौकरीपेशा लोग परिवार समेत बाहर बस गए और अब गांव में वही परिवार बचे हैं जो बेरोजगार हैं या खेती के सहारे जीवन चला रहे हैं। -बालम सिंह
पलायन ने गांव की तस्वीर बदल दी है। पहले लोग खेती-किसानी और छोटे व्यवसाय करते थे। लखौरिया मिर्च की खेती से अच्छी आमदनी होती थी लेकिन अब जंगली जानवर और बंदर फसलें चौपट कर देते हैं। इससे लोगों का खेती से मोहभंग हुआ और परिवार के भरण-पोषण के लिए शहरों की ओर रुख करना पड़ा। -सुनील घुगत्याल
अब गांव पहले जैसे नहीं रहे। जहां कभी बच्चों की किलकारियां और बुजुर्गों के ठहाके सुनाई देते थे वहां सन्नाटा पसरा है। खाली पड़ी बाखलियां पलायन की कहानी कह रही हैं। अगर यहां रोजगार के साधन होते तो गांव आज भी खुशहाल होते। -आनंद सिंह
एक दशक में सब कुछ बदल गया। जिन साथियों के साथ बचपन बीता वे शहरों में बस चुके हैं। गांव में अब वही परिवार हैं जो खेती से गुजर-बसर कर रहे हैं। अब तो खेती भी मुश्किल हो गई है। बारिश अनिश्चित है और बची-खुची फसल जंगली सुअर और बंदर नष्ट कर देते हैं। -अमर सिंह