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Bageshwar News: हालातों के आगे सरेंडर करने जा रहे थे देंवेंद्र, कोच हरी ने दिखाई राह
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बागेश्वर। भारत के पूर्व कप्तान रोहित शर्मा को पहली ही गेंद पर आउट करने के बाद चर्चा में आए देवेंद्र बोरा के लिए रणजी ट्राॅफी तक का सफर आसान नहीं था। कोच हरी कर्म्याल का साथ नहीं मिला होता तो शायद वह भी परिवार चलाने के लिए महानगरों में नौकरी कर रहे होते। कठिन हालात के बाद जब सफलता मिली तो श्रेय भी उन्होंने कोच को ही दिया है।
छतीना गांव के बलवंत सिंह और नीमा देवी के पुत्र देवेंद्र को क्रिकेट खेलने का शौक बचपन से ही था। खेल का मैदान उन्हें खूब भाता था लेकिन परिवार माली हालत उसे क्रिकेट किट मुहैया कराने के लायक नहीं थी। पिता खेतीबाड़ी और मेहनत-मजदूरी कर परिवार का भरण-पोषण करते थे। देवेंद्र का खेल के प्रति जुनून क्रिकेट एकेडमी चलाने वाले हरी कर्म्याल ने पहचाना और उन्हें अपनी कोचिंग से तराशना शुरू किया। संवाद न्यूज एजेंसी से फोन पर हुई बातचीत में देवेंद्र ने बताया कि 2013-14 से उन्हें कोच कर्म्याल से सीखने का मौका मिला। दो साल तक खेलने के बाद क्रिकेट में भविष्य नहीं दिखने पर उन्होंने 2016 में क्रिकेट से दूरी बनाने की सोच ली थी लेकिन कोच ने ऐसा करने से रोक दिया। देवेंद्र बताते हैं कि माता-पिता का पूरा सपोर्ट था लेकिन आर्थिक हालात अच्छे नहीं थे। कोच कर्म्याल ने उन्हें निशुल्क कोचिंग दी और बाकी खर्च भी उठाए। आगे चलकर बागेश्वर क्रिकेट एसोसिएशन के पदाधिकारियों और कोच का अच्छा साथ मिला। देवेंद्र बताते हैं अब वह अपने माता-पिता के सपने को साकार करते हुए मंडलसेरा में घर बनवा रहे हैं।
पिता बोले: बेटे ने अपने बलबूते हासिल की है सफलता, माता-पत्नी को नाज
देवेंद्र की माता नीमा देवी बताती हैं कि उनके बेटे ने कभी भी किसी तरह के शौक नहीं पाले। उसका पूरा ध्यान खेल पर ही रहता था। दोस्तों की मदद से उसने खेल का खर्च उठाया। पिता बलवंत सिंह बताते हैं कि वह अपने बेटे को कभी ढंग के कपड़े तक नहीं दिला सके थे। उसने अपने बलबूते सफलता हासिल की है। पत्नी हेमा बोरा को कहती हैं कि अभी तो शुरूआत है। देवेंद्र ने जितनी मेहनत की है, उसका प्रतिफल आना बाकी है।
कोट
देवेंद्र के भीतर प्रतिभा के साथ-साथ क्रिकेट को लेकर काफी जुनून था। जब वह खेल छोड़ने की बात कर रहे थे, मैंने उन्हें कुछ साल और खेलने को बोला था। 2019 में उत्तराखंड में एसोसिएशन का गठन हुआ तो उसके लिए आगे की राह खुल गई। देवेंद्र जिस सफलता के हकदार थे, वह उन्हें मिल रही है। उम्मीद है देश की टीम में भी वह जगह बनाएंगे।
हरी कर्म्याल, देवेंद्र के कोच
कोट
बागेश्वर से होनहार क्रिकेटर प्रदेश को गौरवान्वित कर रहे हैं। उत्तराखंड की टीम में पदार्पण के बाद से ही देवेंद्र शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। जिले के होनहार खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने में उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन का भी बड़ा योगदान रहा है। उम्मीद है देवेंद्र की सफलता अन्य युवाओं को प्रेरित करेगी। -सुरेश सोनियाल, पूर्व सह सचिव, उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन
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पिता बोले: बेटे ने अपने बलबूते हासिल की है सफलता, माता-पत्नी को नाज
देवेंद्र की माता नीमा देवी बताती हैं कि उनके बेटे ने कभी भी किसी तरह के शौक नहीं पाले। उसका पूरा ध्यान खेल पर ही रहता था। दोस्तों की मदद से उसने खेल का खर्च उठाया। पिता बलवंत सिंह बताते हैं कि वह अपने बेटे को कभी ढंग के कपड़े तक नहीं दिला सके थे। उसने अपने बलबूते सफलता हासिल की है। पत्नी हेमा बोरा को कहती हैं कि अभी तो शुरूआत है। देवेंद्र ने जितनी मेहनत की है, उसका प्रतिफल आना बाकी है।
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देवेंद्र के भीतर प्रतिभा के साथ-साथ क्रिकेट को लेकर काफी जुनून था। जब वह खेल छोड़ने की बात कर रहे थे, मैंने उन्हें कुछ साल और खेलने को बोला था। 2019 में उत्तराखंड में एसोसिएशन का गठन हुआ तो उसके लिए आगे की राह खुल गई। देवेंद्र जिस सफलता के हकदार थे, वह उन्हें मिल रही है। उम्मीद है देश की टीम में भी वह जगह बनाएंगे।
हरी कर्म्याल, देवेंद्र के कोच
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बागेश्वर से होनहार क्रिकेटर प्रदेश को गौरवान्वित कर रहे हैं। उत्तराखंड की टीम में पदार्पण के बाद से ही देवेंद्र शानदार प्रदर्शन कर रहे हैं। जिले के होनहार खिलाड़ियों को आगे बढ़ाने में उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन का भी बड़ा योगदान रहा है। उम्मीद है देवेंद्र की सफलता अन्य युवाओं को प्रेरित करेगी। -सुरेश सोनियाल, पूर्व सह सचिव, उत्तराखंड क्रिकेट एसोसिएशन

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