Uk: सामान ले जाने के लिए घोड़े खच्चर व मरीजों के लिए डोली बनी सहारा, पांच किमी पैदल चलकर स्कूल जा रहे बच्चें
बागेश्वर जिले के कपकोट में विकास के दावे और धरातल की हकीकत के बीच का अंतर समझने के लिए सुमगढ़ गांव से सटीक उदाहरण नहीं मिल सकता है।
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बागेश्वर जिले के कपकोट में विकास के दावे और धरातल की हकीकत के बीच का अंतर समझने के लिए सुमगढ़ गांव से सटीक उदाहरण नहीं मिल सकता है। करीब 1200 की आबादी वाला गांव प्रदेश बनने के 25 साल बाद भी मोटर मार्ग की सुविधा से वंचित है। लोगों को सड़क तक आने के लिए न्यूनतम एक और अधिकतम चार किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। जरूरी सामान घोड़े और खच्चरों से गांव तक पहुंचते हैं। मरीजों, गर्भवतियों, घायल और बुजुर्गों को डोली की मदद से सड़क तक लाना पड़ता है।
सुमगढ़ गांव करीब पांच किमी के दायरे में फैला है। छोरी धार, भैंछाना, चकरहानिया, सौकाम, भेकुटियां, घांगव, खार, लमकोट, ठुलकटव और सुमगढ़ तोक में 322 परिवार और करीब 1200 की आबादी निवास करती है। गांव में 750 मतदाता पंजीकृत हैं। प्रकृति ने गांव की जमीन को खूब उपजाऊ बनाया है। ग्रामीण खेती और बागवानी पर मुख्यत: निर्भर हैं। माल्टा, नींबू और संतरा यहां बहुतायत में होता है। प्रत्येक परिवार के पास तीन से चार सिटरस फलों के पेड़ हैं। गांव में जूनियर हाईस्कूल है लेकिन बच्चों को आगे की पढ़ाई के लिए पांच किमी दूर सौंग जाना पड़ता है। पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी भी लंबे समय तक यहां रहे थे। उनकी दीदी का घर भी यहीं है।
15 परिवार कर चुके पूर्ण पलायन
क्षेत्र पंचायत सदस्य मंगल सिंह रावत बताते हैं कि गांव के लिए मोटर मार्ग बनने की उम्मीद लिए 15 परिवारों ने पूरी तरह से पलायन कर लिया है। अधिकतर घरों के युवा महानगरों में रोजगार करते हैं। शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क सुविधाओं के लिए लोग गांव छोड़ रहे हैं। रोजगार की तलाश में कई परिवार प्रवासी बन चुके हैं जो केवल पूजा-पाठ या जनेऊ-शादी आदि कार्यक्रमों में शरीक होने गांव पहुंचते हैं।
आपदा का दंश झेल चुका है गांव
18 अगस्त 2010 को सुमगढ़ में सरस्वती शिशु मंदिर के भूस्खलन की चपेट में आने से 18 बच्चों की मौत हो गई थी। हर साल भाजपा, कांग्रेस के नेता, प्रशासनिक अधिकारी बच्चों को श्रद्धांजलि देने गांव जाते हैं। बावजूद इसके सड़क निर्माण के लिए ठोस पहल नहीं हो सकी है।
कोश्यारी और कोरंगा छोड़ चुके थे गांव
बुजुर्ग ग्रामीणों के अनुसार सुमगढ़ में सबसे पहले कोश्यारी लोग बसे थे। बाद में वह गांव छोड़कर चले गए। फिर इस गांव को दुलम के कोरंगा वंशजों ने आबाद किया। वह भी यहां के होकर नहीं रहे। वर्तमान में गांव में कई जातियाें के लोग निवास करते हैं। ग्रामीणों के अनुसार पूर्व सीएम और पूर्व राज्यपाल भगत सिंह कोश्यारी भी लंबे समय तक यहां रहे थे। उनकी दीदी का घर भी यहीं है।
सड़क नहीं होने से कई बार मरीजों को डोली से सड़क तक पहुंचाने में काफी देर हो जाती है। गांव में खाद्य, भवन निर्माण, समेत सभी जरूरी सामग्री घोड़े-खच्चर से पहुंचती है। सब्जी, फल के काश्तकारों को बाजार तक ले जाने में परेशानी होती है। -गोविंद सिंह रावत, युवा सामाजिक कार्यकर्ता
गांव में सड़क आएगी इस उम्मीद में आंखें तरस गईं हैं। मुख्यमंत्री, विधायक सब आश्वासन देते हैं लेकिन सड़क अब तक नहीं बन सकी है। पेंशन लेने जाने के लिए चार दिन पहले से चिंता सताने लगती है। डोली में झटके खाते हुए सड़क तक जाना पड़ता है। सड़क बन जाती तो आवाजाही सुगम हो जाती। -मान सिंह कोरंगा, ग्रामीण
सड़क नहीं होने से महिलाओं और बुजुर्गों को सबसे अधिक परेशानी का सामना करना पड़ता है। हर चुनाव में आश्वासन मिलता है कि इस बार गांव में सड़क आ जाएगी लेकिन जीतने के बाद कोई सुध नहीं लेता। गांव धीरे-धीरे खाली होता जा रहा है। -पुष्पा देवी, ग्रामीण
सुमगढ़ के लिए सड़क स्वीकृत है। इसे गांव तक पहुंचाना प्रमुख लक्ष्य है। विभाग, प्रशासन और जनप्रतिनिधियों से इस बारे में लगातार बात की जा रही है। -भूपेंद्र सिंह कोरंगा, ग्राम प्रधान
सुमगढ़ गांव के लिए पीएमजीएसवाई फेज चार में सड़क का निर्माण प्रस्तावित है। डीपीआर गठन हो चुका है। जल्द ही डीपीआार शासन को भेजी जाएगी। -अंबरीश रावत, ईई पीएमजीएसवाई कपकोट

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