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Bageshwar News: खाकी को भाया मैदानी आराम, रसूख के दम पर मैदानों में अटैच हैं 22 दरोगा और जवान
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बागेश्वर। उत्तराखंड के दुर्गम और पहाड़ी इलाकों में सुरक्षा का जिम्मा संभालने वाले महकमे में एक बेहद ही चौंकाने वाला शॉर्टकट चल रहा है। इसे खाकी का पहाड़ फोबिया कहें या रसूख की चमक, जिले की सुरक्षा के लिए स्वीकृत पदों पर तैनात दरोगा और जवान पहाड़ चढ़ने से कतरा रहे हैं। पुलिस कार्यालय के सूत्रों से हुआ बड़ा खुलासा बताता है कि जिले के कोटे से बाकायदा हर महीने मोटी सैलरी डकार रहे दरोगाओं समेत 22 पुलिसकर्मी लंबे समय से मैदानी और सुगम क्षेत्रों में अपनी पसंद की पोस्टिंग पर अटैचमेंट की मलाई काट रहे हैं।
वीआईपी अटैचमेंट के खेल का खामियाजा जिले की आम जनता और यहां कम संख्या में मुस्तैद जवानों को भुगतना पड़ रहा है। मानसून ने दस्तक दे दी है, नदी-नाले उफान पर हैं और पूरा जिला आपदा के मुहाने पर खड़ा है लेकिन थानों और चौकियों में जवानों का भारी टोटा है।
वर्तमान में जिले से 40 से अधिक चुस्त-दुरुस्त जवान चारधाम यात्रा ड्यूटी के लिए बाहर भेजे गए हैं। इसके उलट, मैदान से एक भी सिपाही पहाड़ के इस जिले में संबद्ध नहीं किया गया है जिससे स्थानीय स्तर पर रूटीन पुलिसिंग और वीआईपी मूवमेंट संभालना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। संवाद
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केस- 1
जिले में तैनात एक दरोगा की संबद्धता की दो साल की अवधि कब की समाप्त हो चुकी है लेकिन साहब की फाइलें ऐसी घूमीं कि वे वर्तमान में जिले से हर महीने नियमित वेतन तो पा रहे हैं पर उनकी सेवाएं मैदान के सबसे रसूखदार एसटीएफ विंग में ली जा रही हैं।
केस- 2
साल 2025 में नैनीताल से जिले के लिए ट्रांसफर की गईं एक महिला दरोगा ने आज तक पुलिस लाइन या किसी थाने में अपनी आमद दर्ज नहीं कराई है। उन्होंने अपनी ऊंची सेटिंग के बूते खुद को वापस नैनीताल जिले में ही संबद्ध करवा लिया।
केस- 3
वर्ष 2024 में बागेश्वर से नैनीताल हाईकोर्ट की सुरक्षा ड्यूटी के नाम पर भेजे गए एक दरोगा भी इस फेहरिस्त में पीछे नहीं हैं। उन्होंने भी अपनी मूल तैनाती स्थल की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लौटने के बजाय खुद को वहीं अटैच कर रखा है।
कोट
पहाड़ों में स्टाफ की कमी को देखते हुए कुमाऊं परिक्षेत्र के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को सख्त और लिखित आदेश जारी कर दिए गए हैं। अपनी मूल तैनाती से इतर मैदानी या अन्य सुगम जगहों पर संबद्ध चल रहे ऐसे सभी दरोगाओं और जवानों को तत्काल प्रभाव से रिलीज कर उनके मूल पदों में भेजा जाए। - निवेदिता कुकरेती, आईजी, कुमाऊं रेंज
वीआईपी अटैचमेंट के खेल का खामियाजा जिले की आम जनता और यहां कम संख्या में मुस्तैद जवानों को भुगतना पड़ रहा है। मानसून ने दस्तक दे दी है, नदी-नाले उफान पर हैं और पूरा जिला आपदा के मुहाने पर खड़ा है लेकिन थानों और चौकियों में जवानों का भारी टोटा है।
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वर्तमान में जिले से 40 से अधिक चुस्त-दुरुस्त जवान चारधाम यात्रा ड्यूटी के लिए बाहर भेजे गए हैं। इसके उलट, मैदान से एक भी सिपाही पहाड़ के इस जिले में संबद्ध नहीं किया गया है जिससे स्थानीय स्तर पर रूटीन पुलिसिंग और वीआईपी मूवमेंट संभालना टेढ़ी खीर साबित हो रहा है। संवाद
केस- 1
जिले में तैनात एक दरोगा की संबद्धता की दो साल की अवधि कब की समाप्त हो चुकी है लेकिन साहब की फाइलें ऐसी घूमीं कि वे वर्तमान में जिले से हर महीने नियमित वेतन तो पा रहे हैं पर उनकी सेवाएं मैदान के सबसे रसूखदार एसटीएफ विंग में ली जा रही हैं।
केस- 2
साल 2025 में नैनीताल से जिले के लिए ट्रांसफर की गईं एक महिला दरोगा ने आज तक पुलिस लाइन या किसी थाने में अपनी आमद दर्ज नहीं कराई है। उन्होंने अपनी ऊंची सेटिंग के बूते खुद को वापस नैनीताल जिले में ही संबद्ध करवा लिया।
केस- 3
वर्ष 2024 में बागेश्वर से नैनीताल हाईकोर्ट की सुरक्षा ड्यूटी के नाम पर भेजे गए एक दरोगा भी इस फेहरिस्त में पीछे नहीं हैं। उन्होंने भी अपनी मूल तैनाती स्थल की कठिन भौगोलिक परिस्थितियों में लौटने के बजाय खुद को वहीं अटैच कर रखा है।
कोट
पहाड़ों में स्टाफ की कमी को देखते हुए कुमाऊं परिक्षेत्र के सभी जिला पुलिस अधीक्षकों को सख्त और लिखित आदेश जारी कर दिए गए हैं। अपनी मूल तैनाती से इतर मैदानी या अन्य सुगम जगहों पर संबद्ध चल रहे ऐसे सभी दरोगाओं और जवानों को तत्काल प्रभाव से रिलीज कर उनके मूल पदों में भेजा जाए। - निवेदिता कुकरेती, आईजी, कुमाऊं रेंज