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Bageshwar News: भनार की चौखटों पर सन्नाटा, सुविधाओं की तलाश में खाली हो गए घर-आंगन
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बागेश्वर। कपकोट तहसील की दूसरी सबसे बड़ी ग्राम पंचायत भनार गांव की जवानी तेजी से पलायन कर रही है। पिछले एक दशक में गांव की 1500 से अधिक की आबादी नगरों और बड़े शहरों का रुख कर चुकी है। मिट्टी-पत्थर और सीमेंट के बने घरों को आबाद रखने की जिम्मेदारी बुजुर्ग कंधे उठा रहे हैं।
भनार गांव खड़लेख से कन्याल गांव तक करीब 10 किमी के दायरे में फैला है। 26 छोटे-बड़े तोक से मिलकर बने गांव में 450 परिवार निवास करते हैं। एक दशक पहले तक गांव में करीब 600 परिवार रहते थे। इनमें से 150 परिवार पलायन कर गए हैं। दस साल पहले तक गांव की आबादी 3500 से अधिक थी जो घटकर 2000 रह गई है।
अधिकांश घरों से युवाओं ने पलायन किया है। बुजुर्ग गांव को वीरान होने से बचाने की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। 50 से अधिक घर केवल बुजुर्गों के सहारे आबाद हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार की तलाश में गांव से पलायन हो रहा है। संवाद
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तीन से पांच विद्यार्थियों के सहारे चल रहे स्कूल
भनार ग्राम पंचायत में पांच प्राथमिक, एक जूनियर हाईस्कूल और एक हाईस्कूल है। कभी विद्यार्थियों से गुलजार रहने वाले इन स्कूलों में अब महज गिनती के विद्यार्थी पढ़ते हैं। 2016 में हाईस्कूल की छात्रसंख्या 64 थी। वर्तमान में यह आधी से कम होकर 30 रह गई है। जूनियर हाईस्कूल में एक दशक पहले 30 से 35 विद्यार्थी पढ़ते थे। अब पांच-छह बच्चे पढ़ रहे हैं। प्राथमिक विद्यालय सुमालगांव और नैकाना की छात्रसंख्या तीन-तीन, जुबरा की चार, पांखू और खड़लेख में पांच-पांच विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।
एएनएम केंद्र के सहारे स्वास्थ्य, कई तोक सड़क सुविधा से वंचित
भनार गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की जिम्मेदारी एएनएम केंद्र पर है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराने के लिए लोगों को करीब 15 किमी दूर शामा जाना पड़ता है। पैथोलॉजी, एक्सरे या अल्ट्रासाउंड जांच और बेहतर इलाज के लिए कपकोट या जिला अस्पताल जाने का ही विकल्प है। भनार टिकटा, लिंगुड़ियां, दाधार, काफलधार, देबुलगेरा, तल्ला डाना तोक अब तक सड़क से नहीं जुड़े हैं। इन तोकों में रहने वालों को सड़क तक आने के लिए दो से तीन किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। सड़क नहीं होने से लोगों को बाजार से रोजमर्रा का सामान पहुंंचाने में भी परेशानी होती है।
इनसेट बड़ा राजस्व गांव होने से नहीं हो पाता समुचित विकास
पूर्व ग्राम प्रधान भूपाल राम ने बताया कि बड़ी ग्राम पंचायत होने के बाद भनार केवल एक ही बड़ा राजस्व गांव है। कई छोटी ग्राम पंचायतों में तीन से चार राजस्व गांव होते हैं। उन गांवों को वार्ड के अनुसार विकास के लिए बजट मिलता है। भनार ग्राम पंचायत को मिलने वाला बजट उनकी तुलना में कम होने से गांव में उम्मीद के अनुसार विकास कार्य नहीं हो पाते हैं।
कोट
-आजकल लोग सुख सुविधाओं के साथ जीना चाहते हैं। युवा नौकरी की तलाश में और महिलाएं बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों की ओर चले गईं। बुजुर्ग गांव से लगाव होने के कारण यहीं रह गए। - कमला देवी, ग्रामीण
-बच्चों की पढ़ाई, नौकरी के लिए लोग गांव छोड़कर बाहर को जा रहे हैं। गांव में सरकारी स्कूल तो हैं, लेकिन प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का चलन बढ़ गया है। कुछ जवानों को छोड़कर बाकी घरों में बूढ़े-बुजुर्ग ही बचे हैं। - कमई देवी, ग्रामीण
- आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों ने सुविधाओं की तलाश में शहरों का रुख किया। कुछ लोगों ने शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाओं की कमी के कारण गांव छोड़ा। जिला मुख्यालय या समीप के शहरों में रहने वाले बीच-बीच में गांव आते रहते हैं। कुछ लोग साल में एक बार देवी- देवताओं की पूजा करने आते हैं। - कुंदन सिंह कोरंगा, पूर्व ग्राम प्रधान
पहले गांव में खूब चहल-पहल होती थी। अब न तो स्कूलों में बच्चे रह गए हैं न ही गांव में लोग। गांव में प्रसिद्ध मंदिरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों पर प्रवासी गांव लौटते हैं। इसी दौरान गांव में पहले जैसी रौनक दिखती है। - महेंद्र सिंह कोरंगा, ग्रामीण
भनार गांव खड़लेख से कन्याल गांव तक करीब 10 किमी के दायरे में फैला है। 26 छोटे-बड़े तोक से मिलकर बने गांव में 450 परिवार निवास करते हैं। एक दशक पहले तक गांव में करीब 600 परिवार रहते थे। इनमें से 150 परिवार पलायन कर गए हैं। दस साल पहले तक गांव की आबादी 3500 से अधिक थी जो घटकर 2000 रह गई है।
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अधिकांश घरों से युवाओं ने पलायन किया है। बुजुर्ग गांव को वीरान होने से बचाने की जिम्मेदारी उठा रहे हैं। 50 से अधिक घर केवल बुजुर्गों के सहारे आबाद हैं। ग्रामीणों का कहना है कि बेहतर शिक्षा, स्वास्थ्य, सड़क, रोजगार की तलाश में गांव से पलायन हो रहा है। संवाद
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भनार ग्राम पंचायत में पांच प्राथमिक, एक जूनियर हाईस्कूल और एक हाईस्कूल है। कभी विद्यार्थियों से गुलजार रहने वाले इन स्कूलों में अब महज गिनती के विद्यार्थी पढ़ते हैं। 2016 में हाईस्कूल की छात्रसंख्या 64 थी। वर्तमान में यह आधी से कम होकर 30 रह गई है। जूनियर हाईस्कूल में एक दशक पहले 30 से 35 विद्यार्थी पढ़ते थे। अब पांच-छह बच्चे पढ़ रहे हैं। प्राथमिक विद्यालय सुमालगांव और नैकाना की छात्रसंख्या तीन-तीन, जुबरा की चार, पांखू और खड़लेख में पांच-पांच विद्यार्थी अध्ययनरत हैं।
एएनएम केंद्र के सहारे स्वास्थ्य, कई तोक सड़क सुविधा से वंचित
भनार गांव में स्वास्थ्य सुविधाओं की जिम्मेदारी एएनएम केंद्र पर है। प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र में जांच कराने के लिए लोगों को करीब 15 किमी दूर शामा जाना पड़ता है। पैथोलॉजी, एक्सरे या अल्ट्रासाउंड जांच और बेहतर इलाज के लिए कपकोट या जिला अस्पताल जाने का ही विकल्प है। भनार टिकटा, लिंगुड़ियां, दाधार, काफलधार, देबुलगेरा, तल्ला डाना तोक अब तक सड़क से नहीं जुड़े हैं। इन तोकों में रहने वालों को सड़क तक आने के लिए दो से तीन किमी की दूरी पैदल तय करनी पड़ती है। सड़क नहीं होने से लोगों को बाजार से रोजमर्रा का सामान पहुंंचाने में भी परेशानी होती है।
इनसेट बड़ा राजस्व गांव होने से नहीं हो पाता समुचित विकास
पूर्व ग्राम प्रधान भूपाल राम ने बताया कि बड़ी ग्राम पंचायत होने के बाद भनार केवल एक ही बड़ा राजस्व गांव है। कई छोटी ग्राम पंचायतों में तीन से चार राजस्व गांव होते हैं। उन गांवों को वार्ड के अनुसार विकास के लिए बजट मिलता है। भनार ग्राम पंचायत को मिलने वाला बजट उनकी तुलना में कम होने से गांव में उम्मीद के अनुसार विकास कार्य नहीं हो पाते हैं।
कोट
-आजकल लोग सुख सुविधाओं के साथ जीना चाहते हैं। युवा नौकरी की तलाश में और महिलाएं बच्चों को पढ़ाने के लिए शहरों की ओर चले गईं। बुजुर्ग गांव से लगाव होने के कारण यहीं रह गए। - कमला देवी, ग्रामीण
-बच्चों की पढ़ाई, नौकरी के लिए लोग गांव छोड़कर बाहर को जा रहे हैं। गांव में सरकारी स्कूल तो हैं, लेकिन प्राइवेट स्कूल में पढ़ाने का चलन बढ़ गया है। कुछ जवानों को छोड़कर बाकी घरों में बूढ़े-बुजुर्ग ही बचे हैं। - कमई देवी, ग्रामीण
- आर्थिक रूप से समृद्ध लोगों ने सुविधाओं की तलाश में शहरों का रुख किया। कुछ लोगों ने शिक्षा, स्वास्थ्य की सुविधाओं की कमी के कारण गांव छोड़ा। जिला मुख्यालय या समीप के शहरों में रहने वाले बीच-बीच में गांव आते रहते हैं। कुछ लोग साल में एक बार देवी- देवताओं की पूजा करने आते हैं। - कुंदन सिंह कोरंगा, पूर्व ग्राम प्रधान
पहले गांव में खूब चहल-पहल होती थी। अब न तो स्कूलों में बच्चे रह गए हैं न ही गांव में लोग। गांव में प्रसिद्ध मंदिरों में होने वाले धार्मिक आयोजनों पर प्रवासी गांव लौटते हैं। इसी दौरान गांव में पहले जैसी रौनक दिखती है। - महेंद्र सिंह कोरंगा, ग्रामीण