High Court: दोहरे हत्याकांड मामले में सभी आरोपी साक्ष्य के अभाव में बरी, आजीवन कारावास की सजा रद्द
उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने ऊधमसिंह नगर के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड में साक्ष्यों के अभाव में सभी आरोपियों को बरी करते हुए निचली अदालत की उम्रकैद की सजा रद्द कर दी।
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उत्तराखंड उच्च न्यायालय ने ऊधमसिंह नगर जिले के बहुचर्चित दोहरे हत्याकांड मामले में साक्ष्य के आभाव में सभी आरोपियों को बरी कर दिया है। कोर्ट ने निचली अदालत की ओर से सुनाई गई आजीवन कारावास की सजा को रद्द कर दिया है।न्यायमूर्ति रवींद्र मैठाणी एवं न्यायमूर्ति सिद्धार्थ साह की खंडपीठ के समक्ष मामले की सुनवाई हुई। मामले के अनुसार काशीपुर के कुंडा थाना क्षेत्र में हरनाम सिंह उर्फ हनी और कुलवंत सिंह उर्फ गोले की 2014 में गला घोंटकर हत्या कर दी गई थी। बाद में दोनों के शव जंगल से बरामद हुए थे। पुलिस ने कश्मीर सिंह, प्रकाश सिंह, चंडी सिंह, जसवंत सिंह सहित अन्य आरोपियों के खिलाफ हत्या और आपराधिक साजिश का मुकदमा दर्ज किया था। निचली अदालत ने मई 2025 में सभी आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्र कैद की सजा सुनाई थी। इस आदेश को अपीलकर्ताओं ने हाईकोर्ट में चुनौती दी थी।
अपीलकर्ताओं की ओर से कहा गया कि उन्हें इस मामले में झूठा फंसाया गया है जबकि उनका इस मामले में कोई संबंध नहीं है और यह मामला पूरी तरह परिस्थितिजन्य साक्ष्यों पर आधारित है। बयानों में विरोधाभाष है सबूतों की कड़ी अधूरी है। पुलिस के पास कोई प्रत्यक्षदर्शी गवाह नहीं था और केवल पुराने विवाद या कथित धमकियों के आधार पर किसी को हत्या का दोषी नहीं ठहराया जा सकता। प्रकाश सिंह के अधिवक्ता ने कोर्ट को बताया कि उसका नाम एफआईआर में दर्ज नहीं था।
कोर्ट ने पाया कि पुलिस की ओर से बरामद की गई रस्सियां, जिन्हें हत्या में इस्तेमाल किया गया बताया गया था, उन्हें फॉरेंसिक जांच के लिए नहीं भेजा गया। ऐसे में यह साबित नहीं हो सका कि उन वस्तुओं का मृतकों या आरोपियों से कोई जैविक संबंध था। कोर्ट ने प्रकाश सिंह, चंडी सिंह, लाल सिंह, बलविंदर सिंह, जसवंत सिंह (जस्सा), लखवीर सिंह, जसवंत सिंह (नंदी), भगत सिंह, प्रकाश सिंह (पासी) और दारा सिंह को आरोपों से मुक्त कर निचली अदालत के आदेश को रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा यदि ये किसी अन्य मामले में वांछित नहीं हैं तो इन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाए। कोर्ट ने अपने निर्णय में स्पष्ट किया कि न्याय प्रणाली में केवल संदेह के आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता, बल्कि दोष सिद्ध करने के लिए ठोस और पुख्ता साक्ष्य आवश्यक होते हैं।