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Nainital News: नैनीताल में पहली बार दिखेगा विदेशी फल पर्सिमॉन
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नैनीताल। पर्वतीय क्षेत्रों में पारंपरिक खेती के साथ-साथ अब विदेशी फलों के व्यावसायिक उत्पादन की उम्मीद जग गई है। जैव प्रौद्योगिकी संस्थान पटवाडांगर ने जिले में पहली बार जापानी पर्सिमॉन उगाने में सफलता हासिल की है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यह फल भविष्य में स्थानीय किसानों के लिए आय का सशक्त और लाभकारी विकल्प बन सकता है।
संस्थान के प्रभारी डॉ. सुमित पुरोहित के अनुसार, पर्सिमॉन (डायोस्पायरोस काकी) मूल रूप से पूर्वी एशियाई देशों का फल है। इसकी खेती के लिए 1000 मीटर से 1800 मीटर की ऊंचाई वाले सब-ट्रॉपिकल (उप-उष्णकटिबंधीय) क्षेत्र सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। जैव प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक डॉ. संजय कुमार के मार्गदर्शन में संस्थान में इसका परीक्षण पौधा वर्ष 2021 में रोपित किया गया था जिसमें वर्तमान में प्रचुर मात्रा में पुष्पन देखा गया है। कृषि विशेषज्ञों ने इस फल की व्यावसायिक विशेषताओं को रेखांकित करते हुए बताया कि फसल चक्र: इसके फल सितंबर से दिसंबर के बीच पककर तैयार होते हैं जो किसानों को ऑफ-सीजन में लाभ दे सकते हैं। संवाद
विटामिन-ए, सी, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट का स्रोत है फल
टमाटर की तरह दिखने वाला यह आकर्षक नारंगी फल स्वाद में मीठा होता है। इसे ताजा फल के अलावा सूखे रूप में भी बेचा जा सकता है जिससे इसके भंडारण और निर्यात की संभावना बढ़ जाती है। यह फल विटामिन-ए, सी, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट का उत्कृष्ट स्रोत है। हृदय स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग प्रीमियम फ्रूट के रूप में रहती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि नैनीताल और आसपास की पहाड़ियों में इसकी खेती का विस्तार होता है तो यह पारंपरिक बागवानी के साथ-साथ किसानों के लिए एक नया कैश क्रॉप मॉडल साबित होगा। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित होंगे बल्कि पर्वतीय कृषि की अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिलेगी।
संस्थान के प्रभारी डॉ. सुमित पुरोहित के अनुसार, पर्सिमॉन (डायोस्पायरोस काकी) मूल रूप से पूर्वी एशियाई देशों का फल है। इसकी खेती के लिए 1000 मीटर से 1800 मीटर की ऊंचाई वाले सब-ट्रॉपिकल (उप-उष्णकटिबंधीय) क्षेत्र सबसे उपयुक्त माने जाते हैं। जैव प्रौद्योगिकी परिषद के निदेशक डॉ. संजय कुमार के मार्गदर्शन में संस्थान में इसका परीक्षण पौधा वर्ष 2021 में रोपित किया गया था जिसमें वर्तमान में प्रचुर मात्रा में पुष्पन देखा गया है। कृषि विशेषज्ञों ने इस फल की व्यावसायिक विशेषताओं को रेखांकित करते हुए बताया कि फसल चक्र: इसके फल सितंबर से दिसंबर के बीच पककर तैयार होते हैं जो किसानों को ऑफ-सीजन में लाभ दे सकते हैं। संवाद
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विटामिन-ए, सी, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट का स्रोत है फल
टमाटर की तरह दिखने वाला यह आकर्षक नारंगी फल स्वाद में मीठा होता है। इसे ताजा फल के अलावा सूखे रूप में भी बेचा जा सकता है जिससे इसके भंडारण और निर्यात की संभावना बढ़ जाती है। यह फल विटामिन-ए, सी, फाइबर और एंटीऑक्सीडेंट का उत्कृष्ट स्रोत है। हृदय स्वास्थ्य और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने वाले गुणों के कारण बाजार में इसकी मांग प्रीमियम फ्रूट के रूप में रहती है। वैज्ञानिकों का मानना है कि यदि नैनीताल और आसपास की पहाड़ियों में इसकी खेती का विस्तार होता है तो यह पारंपरिक बागवानी के साथ-साथ किसानों के लिए एक नया कैश क्रॉप मॉडल साबित होगा। इससे न केवल स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजित होंगे बल्कि पर्वतीय कृषि की अर्थव्यवस्था को भी नई मजबूती मिलेगी।