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Nainital News: जंगल बचाने के जुनून ने लिख दी हरियाली की नई इबारत
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हल्द्वानी। घने ओक और पाइन के जंगलों के बीच जब अल्मोड़ा में शीतलाखेत से स्याही देवी की चोटी की ओर कदम बढ़ते हैं तो प्रकृति के कैनवास पर जन संकल्प से लिखी गई हरियाली की इबारत साफ नजर आती है। करीब 7000 हेक्टेयर में फैला यह जंगल इस बात का जीवंत प्रमाण है कि समाज ठान ले तो हरियाली का कोई बाल बांका नहीं कर सकता।
अल्मोड़ा से करीब 35 किमी दूर शीतलाखेत से स्याही देवी मंदिर तक पांच किलोमीटर का रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता है। आधे रास्ते तक कच्ची सड़क और फिर लगभग डेढ़ घंटे की पैदल चढ़ाई। इस सफर की असली खूबसूरती रास्ते में दिखती है जहां हरियाली, जल स्रोत और वन्यजीव इस बात के गवाह हैं कि यहां जंगल सिर्फ बचाए नहीं, बल्कि संजोए गए हैं।
स्याही देवी तक फैला यह क्षेत्र आज वन और जन चेतना का संगम बन चुका है। इस बदलाव के केंद्र में तीन मजबूत पहल हैं- सामूहिक संकल्प, शीतलाखेत ओण मॉडल और वीएल स्याही लौह हल। तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं जिन्होंने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जंगल को नई जिंदगी दी। पिछले कुछ समय में यह पूरा क्षेत्र आज हिमालयी राज्यों के लिए एक मॉडल बनकर उभरा है।
पहल 1 : सामूहिकता से जंगल बचाने का संकल्प
वर्ष 2003 में स्याही देवी क्षेत्र के 30 से अधिक गांवों ने जंगल बचाने के लिए सामूहिक शुरुआत की। स्याही देवी विकास मंच, शीतलाखेत के गठन के साथ जंगल की सुरक्षा को सामाजिक अनुशासन में बदल दिया। सूरी, गङसारी, मटीला, नौला, भाकङ, धामस, रौन, डाल, कफून, सल्ला रौतेला, स्याहीदेवी-शीतलाखेत, खरकिया पडयूला, बरसीला के महिला मंगल दलों ने जंगल बचाओ-जीवन बचाओ अभियान को अपनाया। इस सामूहिक पहरेदारी का असर साफ दिखता है। बांज, काफल, बुरांश जैसे पेड़ों से भरे जंगल सुरक्षित हैं और गर्मियों में भी जल स्रोत जीवित रहते हैं। अतीत में काट दिए गए पेड़ों की जड़ों से नये पौधों का विकास हुआ है जिसे एएनआर पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति से लगभग 1000 हेक्टयर क्षेत्रफल में बिना पौधरोपण के लाखों की संख्या में मिश्रित प्रजाति के पौधों का अच्छा जंगल विकसित हो रहा है।
पहल 2 : ओण जलाने का शीतलाखेत मॉडल
ओण (आड़ा या केड़ा) जलाने की पुरानी परंपरा को समयबद्ध और सुरक्षित बनाकर शीतलाखेत मॉडल अस्तित्व में आया। ग्रामीणों ने तय किया कि 31 मार्च से पहले खेतों की झाड़ियों और खरपतवार को नियंत्रित तरीके से जला दिया जाएगा ताकि अप्रैल-मई में सूखी पिरुल और तेज हवाओं के कारण जंगलों में आग न फैले। इस पहल को मजबूत करने के लिए हर साल 1 अप्रैल को ओण दिवस मनाया जाता है। वन विभाग के शीतलाखेत अनुभाग के कर्मचारी रूप सिंह, रंजीत सिंह, कुबेर चंद्र, हेम चंद्र, कविता मेहता और दीवान सिंह ढेला, फायर वाचर्स श्याम सिंह, गौरव सिंह, खीम सिंह, राजन राम, बिहारी लाल, तनुज कुमार वैद्य लगातार लोगों से मिलते हैं और नए लोगों को जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। जन सहभागिता के अच्छे परिणाम देखते हुए वर्ष 2022 में उत्तराखंड सरकार ने शीतलाखेत मॉडल को पूरे प्रदेश में लागू किये जाने की घोषणा की।
पहल 3 : वीएल स्याही लौह हल : खेती के साथ पर्यावरण की चिंता
जंगलों पर दबाव कम करने के लिए खेती के पारंपरिक लकड़ी के हल का विकल्प भी यहीं तैयार हुआ। पहाड़ों में हल बनाने के लिए बांज और भीमल जैसे चाैड़ी पत्ती वाले मजबूत पेड़ों की कटाई होती थी। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के सहयोग से वीएल स्याही लौह हल विकसित किया गया जिसने पेड़ों के कटान पर प्रभावी रोक लगाई। स्याही देवी विकास मंच के आरडी जोशी, दुर्गेश पंत, गणेश पाठक, हरीश बिष्ट, रमेश भंडारी, नरेंद्र सिंह, ललित बिष्ट, पूरन नेगी, प्रताप सिंह, रवि परिहार लगातार लोगों को जागरूक कर रहे हैं। अब अल्मोड़ा जनपद के अलावा पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, टिहरी, देहरादून, पौड़ी, नैनीताल जिलों के लगभग 11,000 से अधिक किसान वीएल स्याही हल का इस्तेमाल कर रहे हैं।
विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मीकांत ने बताया कि परंपरागत रूप से एक हल बनाने के लिए औसतन दो से ढाई पेड़ बर्बाद होते हैं। अल्मोड़ा से अस्तित्व में आए वीएल स्याही लौह हल से उत्तराखंड के अलावा पूर्वोत्तर भारत और मध्य प्रदेश तक के किसान लाभान्वित हो रहे हैं। यह खेती में डेढ़ गुना ज्यादा सक्षम है और इसके इस्तेमाल से पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिल रही है।
जंगल संरक्षण की असल शुरुआत 2003 से हुई। सभी गांव एक मंच पर आए और वन रक्षा का संकल्प लिया। लगातार बैठकों और जागरूकता से यह अभियान मजबूत हुआ। ज्यादातर वनाग्नि की घटनाएं ओण जलाने के दौरान होती थीं। इसे समयबद्ध और सुरक्षित बनाया गया। -गजेन्द्र पाठक, संयोजक, स्याही देवी विकास मंच
जंगल सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवन का आधार हैं। वनाग्नि से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान को नए तरीके से अपनाया गया। आज 30 से अधिक गांव इस मॉडल से जुड़कर योगदान दे रहे हैं।
-कैलाश नाथ गोस्वामी, सरपंच, स्याहीदेवी
अधिकतर प्रयास आग लगने के बाद होते हैं, लेकिन ओण जलाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना आग लगने से पहले का प्रभावी समाधान है। हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए जल स्रोत और जैवविविधता बचानी है तो वनाग्नि को रोकने के लिए निरोधात्मक उपाय बेहद जरूरी हैं। -गिरीश चन्द्र शर्मा, पर्यावरण कार्यकर्ता
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अल्मोड़ा से करीब 35 किमी दूर शीतलाखेत से स्याही देवी मंदिर तक पांच किलोमीटर का रास्ता घने जंगलों से होकर गुजरता है। आधे रास्ते तक कच्ची सड़क और फिर लगभग डेढ़ घंटे की पैदल चढ़ाई। इस सफर की असली खूबसूरती रास्ते में दिखती है जहां हरियाली, जल स्रोत और वन्यजीव इस बात के गवाह हैं कि यहां जंगल सिर्फ बचाए नहीं, बल्कि संजोए गए हैं।
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स्याही देवी तक फैला यह क्षेत्र आज वन और जन चेतना का संगम बन चुका है। इस बदलाव के केंद्र में तीन मजबूत पहल हैं- सामूहिक संकल्प, शीतलाखेत ओण मॉडल और वीएल स्याही लौह हल। तीनों एक-दूसरे के पूरक हैं जिन्होंने परोक्ष-अपरोक्ष रूप से जंगल को नई जिंदगी दी। पिछले कुछ समय में यह पूरा क्षेत्र आज हिमालयी राज्यों के लिए एक मॉडल बनकर उभरा है।
पहल 1 : सामूहिकता से जंगल बचाने का संकल्प
वर्ष 2003 में स्याही देवी क्षेत्र के 30 से अधिक गांवों ने जंगल बचाने के लिए सामूहिक शुरुआत की। स्याही देवी विकास मंच, शीतलाखेत के गठन के साथ जंगल की सुरक्षा को सामाजिक अनुशासन में बदल दिया। सूरी, गङसारी, मटीला, नौला, भाकङ, धामस, रौन, डाल, कफून, सल्ला रौतेला, स्याहीदेवी-शीतलाखेत, खरकिया पडयूला, बरसीला के महिला मंगल दलों ने जंगल बचाओ-जीवन बचाओ अभियान को अपनाया। इस सामूहिक पहरेदारी का असर साफ दिखता है। बांज, काफल, बुरांश जैसे पेड़ों से भरे जंगल सुरक्षित हैं और गर्मियों में भी जल स्रोत जीवित रहते हैं। अतीत में काट दिए गए पेड़ों की जड़ों से नये पौधों का विकास हुआ है जिसे एएनआर पद्धति कहा जाता है। इस पद्धति से लगभग 1000 हेक्टयर क्षेत्रफल में बिना पौधरोपण के लाखों की संख्या में मिश्रित प्रजाति के पौधों का अच्छा जंगल विकसित हो रहा है।
पहल 2 : ओण जलाने का शीतलाखेत मॉडल
ओण (आड़ा या केड़ा) जलाने की पुरानी परंपरा को समयबद्ध और सुरक्षित बनाकर शीतलाखेत मॉडल अस्तित्व में आया। ग्रामीणों ने तय किया कि 31 मार्च से पहले खेतों की झाड़ियों और खरपतवार को नियंत्रित तरीके से जला दिया जाएगा ताकि अप्रैल-मई में सूखी पिरुल और तेज हवाओं के कारण जंगलों में आग न फैले। इस पहल को मजबूत करने के लिए हर साल 1 अप्रैल को ओण दिवस मनाया जाता है। वन विभाग के शीतलाखेत अनुभाग के कर्मचारी रूप सिंह, रंजीत सिंह, कुबेर चंद्र, हेम चंद्र, कविता मेहता और दीवान सिंह ढेला, फायर वाचर्स श्याम सिंह, गौरव सिंह, खीम सिंह, राजन राम, बिहारी लाल, तनुज कुमार वैद्य लगातार लोगों से मिलते हैं और नए लोगों को जुड़ने के लिए प्रेरित करते हैं। जन सहभागिता के अच्छे परिणाम देखते हुए वर्ष 2022 में उत्तराखंड सरकार ने शीतलाखेत मॉडल को पूरे प्रदेश में लागू किये जाने की घोषणा की।
पहल 3 : वीएल स्याही लौह हल : खेती के साथ पर्यावरण की चिंता
जंगलों पर दबाव कम करने के लिए खेती के पारंपरिक लकड़ी के हल का विकल्प भी यहीं तैयार हुआ। पहाड़ों में हल बनाने के लिए बांज और भीमल जैसे चाैड़ी पत्ती वाले मजबूत पेड़ों की कटाई होती थी। विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान, अल्मोड़ा के सहयोग से वीएल स्याही लौह हल विकसित किया गया जिसने पेड़ों के कटान पर प्रभावी रोक लगाई। स्याही देवी विकास मंच के आरडी जोशी, दुर्गेश पंत, गणेश पाठक, हरीश बिष्ट, रमेश भंडारी, नरेंद्र सिंह, ललित बिष्ट, पूरन नेगी, प्रताप सिंह, रवि परिहार लगातार लोगों को जागरूक कर रहे हैं। अब अल्मोड़ा जनपद के अलावा पिथौरागढ़, बागेश्वर, चमोली, टिहरी, देहरादून, पौड़ी, नैनीताल जिलों के लगभग 11,000 से अधिक किसान वीएल स्याही हल का इस्तेमाल कर रहे हैं।
विवेकानंद पर्वतीय कृषि अनुसंधान संस्थान के निदेशक डॉ. लक्ष्मीकांत ने बताया कि परंपरागत रूप से एक हल बनाने के लिए औसतन दो से ढाई पेड़ बर्बाद होते हैं। अल्मोड़ा से अस्तित्व में आए वीएल स्याही लौह हल से उत्तराखंड के अलावा पूर्वोत्तर भारत और मध्य प्रदेश तक के किसान लाभान्वित हो रहे हैं। यह खेती में डेढ़ गुना ज्यादा सक्षम है और इसके इस्तेमाल से पर्यावरण संरक्षण को भी मजबूती मिल रही है।
जंगल संरक्षण की असल शुरुआत 2003 से हुई। सभी गांव एक मंच पर आए और वन रक्षा का संकल्प लिया। लगातार बैठकों और जागरूकता से यह अभियान मजबूत हुआ। ज्यादातर वनाग्नि की घटनाएं ओण जलाने के दौरान होती थीं। इसे समयबद्ध और सुरक्षित बनाया गया। -गजेन्द्र पाठक, संयोजक, स्याही देवी विकास मंच
जंगल सिर्फ संसाधन नहीं, बल्कि संस्कृति और जीवन का आधार हैं। वनाग्नि से निपटने के लिए पारंपरिक ज्ञान को नए तरीके से अपनाया गया। आज 30 से अधिक गांव इस मॉडल से जुड़कर योगदान दे रहे हैं।
-कैलाश नाथ गोस्वामी, सरपंच, स्याहीदेवी
अधिकतर प्रयास आग लगने के बाद होते हैं, लेकिन ओण जलाने की प्रक्रिया को व्यवस्थित करना आग लगने से पहले का प्रभावी समाधान है। हमें आने वाली पीढ़ियों के लिए जल स्रोत और जैवविविधता बचानी है तो वनाग्नि को रोकने के लिए निरोधात्मक उपाय बेहद जरूरी हैं। -गिरीश चन्द्र शर्मा, पर्यावरण कार्यकर्ता