UK: जलवायु परिवर्तन से खेती को बचाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक जरूरी, केवीके ने तैयार किया प्लान
जलवायु परिवर्तन और एल नीनो के कारण खेती पर लगातार संकट बढ़ रहा है। केवीके ज्योलीकोट के प्रोफेसर डॉ. संजय चौधरी के अनुसार वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर सूखे और अनिश्चित बारिश के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
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जलवायु परिवर्तन और एल नीनो जैसी मौसमी अस्थिरता के कारण कृषि क्षेत्र में लगातार चुनौतियां बढ़ रही हैं। विशेषकर उन क्षेत्रों में जहां वर्षा पर निर्भरता अधिक है और सिंचाई के साधन सीमित हैं। ऐसे में एल नीनो और जलवायु परिवर्तन से खेती को बचाने के लिए वैज्ञानिक तकनीक को अपनाना जरूरी है।
कृषि विज्ञान केंद्र (केवीके) ज्योलीकोट के प्रोफेसर एवं अध्यक्ष डॉ. संजय चौधरी ने बताया कि जल संरक्षण, मौसम आधारित कृषि प्रबंधन और वैज्ञानिक तकनीकों को अपनाकर प्राकृतिक आपदाओं से होने वाले नुकसान को काफी हद तक कम किया जा सकता है। फसल विविधीकरण, मिश्रित खेती, अंतरवर्तीय खेती, समय पर बुवाई, नमी संरक्षण, मल्चिंग, जैविक पदार्थों का प्रयोग और वर्षा जल संचयन जैसी तकनीकों को अपनाकर सूखे और अनिश्चित वर्षा के दुष्प्रभावों को काफी हद तक कम किया जा सकता है।
डॉ. चौधरी ने बताया कि एल नीनो का सीधा असर वर्षा आधारित खेती, बागवानी और प्राकृतिक जल स्रोतों पर पड़ता है। धान, मंडुवा, झंगोरा, दलहन और सब्जियों की फसलें प्रभावित हो सकती हैं जबकि सेब, कीवी सहित समशीतोष्ण फल फसलों की गुणवत्ता और उत्पादन पर भी प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है।
मत्स्य पालन में जल संरक्षण पर जोर
मत्स्य पालक सूखे के दौरान अजोला, कमल और वाटर लिली जैसे पौधों का उपयोग करें। अत्यधिक जल संकट की स्थिति में मछलियों का घनत्व कम रखने और एक्वापोनिक्स जैसी जल संरक्षण तकनीक अपनाएं। पोल्ट्री पालक सूखे से पहले पर्याप्त चारा और स्वच्छ पेयजल का भंडारण, वर्षा जल संचयन और समय पर टीकाकरण कराएं। शीत लहर में छह इंच मोटी लिटर, हीटिंग व्यवस्था और ठंडी हवाओं से बचाव के उपाय अपनाएं।
फसलों और बागवानी में मौसम आधारित प्रबंधन अपनाएं
धान में भूरे फुदके, तना छेदक और ब्लास्ट रोग, सब्जियों में उकठा एवं चूर्णी फफूंद और सेब के बागों में स्कैब और अन्य रोगों के प्रति सतर्क रहना है। खेतों में जल निकासी, समेकित कीट एवं रोग प्रबंधन व फफूंदनाशी एवं कीटनाशकों का प्रयोग आवश्यकता अनुसार करें।