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Pithoragarh News: कुमाऊं में गुफाओं की नहीं बुझ रही प्यास, सूख रहे हैं नौले-धारे
संवाद न्यूज एजेंसी, पिथौरागढ़
Updated Sat, 21 Mar 2026 10:51 PM IST
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गंगोलीहाट में गुफा में शोध के लिए पहुंची जवाहर लाल नेहरू वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र बंगलुरू की भ
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थल। पहाड़ों में मौजूद प्राकृतिक गुफाएं जल भंडारण का महत्वपूर्ण स्रोत हैं। ये प्राकृतिक नौले और धारों को जीवित रहने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। मौजूदा दौर में पिथौरागढ़ और बागेश्वर जिले के साथ ही कुमाऊं की अन्य गुफाओं में नमी कम होने से ये सूख रहे हैं। जमीन की जल संग्रहण क्षमता कम होने से इन गुफाओं में नमी कम होने लगी हैं इससे चूने की प्राकृतिक संरचनाओं का बनना भी बंद हो गया है। यह खुलासा हुआ है जवाहर लाल नेहरू वैज्ञानिक अनुसंधान केंद्र बेंगलुरु के शोध में। यहां के वैज्ञानिकों ने कुमाऊं की गुफाओं में नहीं कम होने पर चिंता जताई है।
केंद्र की वरिष्ठ भू वैज्ञानिक डॉ. जयश्री सनवाल भट्ट ने अपनी टीम के साथ पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र और बागेश्वर में मौजूद गुफाओं में शोध किया। उन्होंने बताया कि कुमाऊं के लघु हिमालयी क्षेत्र की कई पहाड़ियां चूने के पत्थर से बनी हैं। यह पत्थर सामान्य चट्टानों की तरह ठोस नहीं होता। बारिश का पानी घुलने से चूने की पहाड़ियों में सुरंग, दरारें और गुफाओं का निर्माण होता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में कार्स्ट सिस्टम कहा जाता है। ये गुफाएं पहाड़ों के भीतर प्राकृतिक जल भंडारण का काम करती हैं।
इन गुफाओं में चूना क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया तो चिंताजनक बात सामने आई है। उन्होंने बताया कि ये गुफाएं जो नमी से चमकती थी और पानी क़ी बूंदों के जरिए इनमें चूने की प्राकृतिक संरचनाएं बनती थी वो अब नहीं बन रही हैं। इसका प्रमुख कारण जमीन की जल संग्रहण क्षमता के कम होने से गुफाओं का सूखना है। कम दिनों मे अधिक तीव्र वर्षा, लंबे शुष्क काल और पानी का तेजी बह जाना गुफाओं को प्यासा रख रहा है। यदि गुफाएं सूखीं तो प्यास बुझाने वाले नौले-धारे भी मौन हो जाएंगे। संवाद
गुफाओं के गहरे हिस्से में मिला प्लास्टिक
डॉ. जयश्री सनवाल भट्ट ने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान कई गुफाओं के गहरे हिस्से में प्लास्टिक के साथ ही कचरा, बाढ़ का मलबा भी मिला है। नालियों मे फेंका गया कचरा सीधे इन प्राकृतिक जल भंडारों तक पहुंचकर पानी को दूषित कर रहा है। गुफाओं के अंदर सूर्य की रोशनी के बगैर अंधेरे में कई जीव-जंतुओं का संसार बसता है। गुफाओं के भीतर प्लास्टिक पहुंचने से यह इन जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर भी बुरा प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने बताया कि गुफाओं और जल पुनर्भरण क्षेत्रों के संरक्षण से ही नौले-धारे जीवित रह सकते हैं। भू वैज्ञानिक इन गुफाओं और संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन कर मानचित्र तैयार कर रहें हैं ताकि इनके संरक्षण के लिए उचित कदम उठाए जा सकें।
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केंद्र की वरिष्ठ भू वैज्ञानिक डॉ. जयश्री सनवाल भट्ट ने अपनी टीम के साथ पिथौरागढ़ के गंगोलीहाट क्षेत्र और बागेश्वर में मौजूद गुफाओं में शोध किया। उन्होंने बताया कि कुमाऊं के लघु हिमालयी क्षेत्र की कई पहाड़ियां चूने के पत्थर से बनी हैं। यह पत्थर सामान्य चट्टानों की तरह ठोस नहीं होता। बारिश का पानी घुलने से चूने की पहाड़ियों में सुरंग, दरारें और गुफाओं का निर्माण होता है। इसे वैज्ञानिक भाषा में कार्स्ट सिस्टम कहा जाता है। ये गुफाएं पहाड़ों के भीतर प्राकृतिक जल भंडारण का काम करती हैं।
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इन गुफाओं में चूना क्षेत्र का सर्वेक्षण किया गया तो चिंताजनक बात सामने आई है। उन्होंने बताया कि ये गुफाएं जो नमी से चमकती थी और पानी क़ी बूंदों के जरिए इनमें चूने की प्राकृतिक संरचनाएं बनती थी वो अब नहीं बन रही हैं। इसका प्रमुख कारण जमीन की जल संग्रहण क्षमता के कम होने से गुफाओं का सूखना है। कम दिनों मे अधिक तीव्र वर्षा, लंबे शुष्क काल और पानी का तेजी बह जाना गुफाओं को प्यासा रख रहा है। यदि गुफाएं सूखीं तो प्यास बुझाने वाले नौले-धारे भी मौन हो जाएंगे। संवाद
गुफाओं के गहरे हिस्से में मिला प्लास्टिक
डॉ. जयश्री सनवाल भट्ट ने बताया कि सर्वेक्षण के दौरान कई गुफाओं के गहरे हिस्से में प्लास्टिक के साथ ही कचरा, बाढ़ का मलबा भी मिला है। नालियों मे फेंका गया कचरा सीधे इन प्राकृतिक जल भंडारों तक पहुंचकर पानी को दूषित कर रहा है। गुफाओं के अंदर सूर्य की रोशनी के बगैर अंधेरे में कई जीव-जंतुओं का संसार बसता है। गुफाओं के भीतर प्लास्टिक पहुंचने से यह इन जीव-जंतुओं के अस्तित्व पर भी बुरा प्रभाव डाल रहा है। उन्होंने बताया कि गुफाओं और जल पुनर्भरण क्षेत्रों के संरक्षण से ही नौले-धारे जीवित रह सकते हैं। भू वैज्ञानिक इन गुफाओं और संवेदनशील क्षेत्रों का अध्ययन कर मानचित्र तैयार कर रहें हैं ताकि इनके संरक्षण के लिए उचित कदम उठाए जा सकें।