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Udham Singh Nagar News: मानसून आते ही आशियाना उजड़ने की आशंका..डराने लगता है बैगुल का वेग

Fri, 10 Jul 2026 01:08 AM IST
हल्द्वानी ब्यूरो संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर Updated Fri, 10 Jul 2026 01:08 AM IST
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Fear of homes being destroyed with the onset of the monsoon... the fury of the Bagul becomes terrifying.
सितारगंज। मानसून आते ही लोगों की नजरें बैगुल नदी के जलस्तर पर टिक जाती हैं। तेज बारिश होने पर लोगों के माथे पर चिंता की लकीरें खिंच जाती हैं। बरसाती रात में नींद उचट जाती है। मन नदी के वेग से आशियाना उजड़ जाने की आशंका से घिर जाता है। यह दर्द बैगुल किनारे बसे शक्तिफार्म के अरविंद नगर और झाड़ी के ग्रामीणों का है। जिन्हें हर साल बाढ़ का दंश झेलना पड़ता है।
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दोनों गांवों में रहने वाले करीब 400 परिवारों के लिए मानसून हर साल लौटकर आने वाली त्रासदी बन गया है। नदी का जलस्तर बढ़ने से तटबंध टूटने लगते हैं। बाढ़ का पानी गांवों में घुसकर घर, गोशाला, खेत-खलिहान को डुबो देता है। कई बार लोगों को आधी रात में छोटे बच्चों, बुजुर्गों, बीमारों को लेकर राहत शिविर की दौड़ लगानी पड़ती है। मानूसन में घरों को छोड़कर सुरक्षित स्थान पर जाना ग्रामीणों की नियति बन गई है। संवाद
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इनसेट
क्या तटबंध रोक पाएंगे बाढ़ को
सितारगंज। हर साल आने वाली बाढ़ से बचाव के लिए बैगुल नदी के अपस्ट्रीम और डाउनस्ट्रीम में दोनों ओर से तटबंध बनाए गए हैं। इससे ग्रामीणों में जलभराव से बचाव की उम्मीद जागी है। हालांकि प्रशासन ने सतर्कता बरतते हुए बाढ़ चौकी स्थापित कर प्रहरी तैनात किए हैं। राहत एवं बचाव दलों को भी अलर्ट मोड पर रखा गया है।
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इनसेट
क्या कहते हैं ग्रामीण
बारिश शुरू होते ही सबसे पहले नदी देखने जाते हैं। रात में तेज बारिश हो जाए तो पूरा परिवार जागता रहता है। डर रहता है कि कब पानी घर में घुस जाए और बच्चों को लेकर भागना पड़े।
- गणेश मल्लिक, ग्रामीण
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हर साल सबसे पहले जरूरी कागजात और इलेक्ट्रॉनिक सामान छत या छज्जों पर रख देते हैं। पिछले साल पूरा घर पानी में डूब गया था। बच्चों की किताबें और घर का सामान खराब हो गया था।
- सपन बाला, ग्रामीण
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बाढ़ आने पर सबसे ज्यादा चिंता मवेशियों की होती है। कई बार उन्हें सुरक्षित जगह ले जाने का समय भी नहीं मिलता। जानवर बिखर जाते हैं और महीनों तक नुकसान की भरपाई नहीं हो पाती।

- राजू ढाली, ग्रामीण
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प्रशासन राहत शिविर बना देता है, लेकिन अपना घर छोड़ने का दर्द कोई नहीं समझ सकता। हर साल यही उम्मीद करते हैं कि इस बार नदी गांव तक न पहुंचे और बच्चों को फिर से राहत शिविर में रात न बितानी पड़े।
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