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Udham Singh Nagar News: चैती मेले में ढोलक बाजार की धमक हुई मंद
संवाद न्यूज एजेंसी, ऊधम सिंह नगर
Updated Tue, 24 Mar 2026 12:49 AM IST
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काशीपुर। वाद्य यंत्रों में प्रमुख स्थान रखने वाली अमरोहा की प्रसिद्ध ढोलक की थाप, ढोलक बाजार में कच्चा माल और दुकानें महंगी मिलने के चलते चैती मेले में धीमी पड़ गई है। एक वक्त था ढोलक के शौकीनों को मेले का इंतजार रहता था।
उत्तर भारत के प्रसिद्ध चैती मेला में लगभग छह-साल पहले तक मेले के दौरान ढोलक बाजार की ''ठक-ठक-धुम'' से शुरू हो जाती थी। उस वक्त ढोलक बाजार में 15 से 20 दुकानें लगती थीं। वर्ष 2018 में मेले का सरकारीकरण होने और दुकानों का दुकानों का ठेका महंगा होने से ढोलक बाजार बिखर सा गया है। महंगाई मार झेल रहा मेले में अब हर वर्ष ढोलक बाजार की दुकानें कम होती जा रही है। वर्तमान में मात्र छह दुकानें ही अमरोहा से आई हैं।
अमरोहा से पहुंचे दुकानदार उमैद, शाहजाद व नवी हसन ने बताया कि ढोलक का कारोबार पुश्तैनी है। उनके पिता, दादा और परदादा यहां मेले में दुकान लगाते थे। बीते 6-7 वर्ष से काफी लोगों ने मेले में दुकानें महंगी मिलने के कारण आना बंद कर दिया है। उन्होंने बताया कि मेले में दुकान महंगी हो गई और ढोलक बनाने का कच्चा माल भी महंगा होने से अब मेले में आकर औसत नहीं निकल पाता है। उमैद बताते हैं कि एक वक्त था जब छोटी ढोलक मात्र 50-60 रुपये में बिकती थी वह अब 150 से 200 रुपये में बिकती है। वहीं बड़ी ढोलक, नाल, मृदंग व डफली अब 500 से लेकर एक हजार रुपये तक में बिकती है।
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इन स्थानों से आता है कच्चा माल
ढोलक बनाने में प्रयुक्त होने वाला चमड़ा कानपुर, मेरठ और लखनऊ से आता है। वहीं ढोलक, नाल, मृदंग और डफली गोंडा से आती है जो कि आम व पापुलर की लकड़ी से बनती है।
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ढोलक की विदेशों तक में रहती है मांग
अमरोहा की बनी ढोलक की मांग विदेशों तक रहती है। यहां की बनी ढोलक मजबूत होने के साथ ढोलक कलाकारों की पहली पसंद रहती है। ढोलक कारोबारियों ने बताया कि विदेशों में अधिकांश ढोलक, नाल व मृदंग किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में ज्यादा प्रयोग की जाती है। उमैद ने बताया कि अमरोहा में कई थोक कारोबारी हैं जो विदेशों में जाने वाली ढोलक को यहां से भेजते हैं।
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मेले में कम ही सजीं प्रसाद की दुकानें
काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी मंदिर परिसर के बाहर प्रसाद की दुकानें सजने लगी हैं। यहां प्रसाद बेचने वालों ने बताया कि बीते कुछ वर्षों से दुकान-तहबाजारी का ठेका महंगा होने के कारण कई प्रसाद विक्रेताओं ने अब प्रसाद बेचना लगभग बंद कर दिया है। कई दुकानदारों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि 8-9 साल पहले जो दुकान तीन से पांच हजार रुपये में मिल जाती थी, वह दुकान अब 40 से 50 हजार रुपये तक में मिल रही है। उस दौरान यहां पर 40-50 प्रसाद विक्रेता प्रसाद बेचते थे जबकि अब आधे दुकानदार रह गए हैं। बताया बीते वर्ष तो कई प्रसाद विक्रेता नुकसान होने पर बीच में दुकानों को छोड़ कर चले गए थे। उन्होंने बताया कि अब तो हर साल दुकानों का ठेका महंगा होता जा रहा है जिसके कारण दुकानदारों का मेले में दुकान लगाने से मोह भंग हो रहा है।
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मां बाल सुंदरी देवी मंदिर के दानपात्र की सील
पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में 12 दानपात्र किए गए सील
काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी का डोला 25 मार्च की अर्धरात्रि मंदिर में पहुंचेगा। इससे पहले मेला प्रशासन/एसडीएम अभय प्रताप सिंह के निर्देश पर सोमवार को मंदिर परिसर में रखे गए 12 दानपात्रों को पंडा परिवार की मौजूदगी में तहसीलदार पंकज चंदोला की देखरेख में सील कर दिया गया। मेला प्रशासन/एसडीएम ने बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप मंदिर परिसर के सभी दानपात्रों को पुलिस-प्रशासन की देखरेख में सील किया गया है। हाईकोर्ट का आदेश है कि मेला समाप्ति के बाद सभी दानपात्रों को पंडा परिवार की मौजूदगी में खोला जाए। वहां प्रशासन की ओर से पटवारी राहुल चौहान व रोहित शर्मा, संग्रह अमीन भूपेंद्र सिंह, चैती मेला चौकी प्रभारी पंकज कुमार आदि थे।
बरेली से मां बाल सुंदरी देवी दर्शन के लिए पहुंचने लगे श्रद्धालु
काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी को जहां बुक्सा समाज कुलदेवी के रूप में पूजता है। वहीं बरेली और पीलीभीत के श्रद्धालु भी मां बाल सुंदरी की अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं।
चैत्र मास में लगने वाले चैती मेले में हजारों श्रद्धालु मां बाल सुंदरी देवी के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर के मुख्य पंडा विकास अग्निहोत्री ने बताया कि यूपी के बरेली और पीलीभीत से श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष यहां दर्शनों के लिए आते हैं। उन्होंने बताया कि एक वर्ष बरेली से और एक वर्ष पीलीभीत से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इस वर्ष बरेली के श्रद्धालु आएंगे जिनका पहुंचना शुरू हो गया है। यह श्रद्धालु परिवार सहित मेला परिसर में देवी डोला आने तक यहां रुकेंगे और प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-अर्चना करेंगे। उन्होंने बताया कि इस दौरान श्रद्धालु बड़े-बड़े देवी पताका के अलावा झोली लाते हैं जिसमें कौड़ी, सिक्के, खजला व प्रतीकात्मक सोने की मां दुर्गा की मूर्ति प्रसाद स्वरूप लाकर दरबार में चढ़ाते हैं। साथ ही जिनकी नई शादी होती है वह जात लगाते हैं और बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराया जाता है।
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उत्तर भारत के प्रसिद्ध चैती मेला में लगभग छह-साल पहले तक मेले के दौरान ढोलक बाजार की ''ठक-ठक-धुम'' से शुरू हो जाती थी। उस वक्त ढोलक बाजार में 15 से 20 दुकानें लगती थीं। वर्ष 2018 में मेले का सरकारीकरण होने और दुकानों का दुकानों का ठेका महंगा होने से ढोलक बाजार बिखर सा गया है। महंगाई मार झेल रहा मेले में अब हर वर्ष ढोलक बाजार की दुकानें कम होती जा रही है। वर्तमान में मात्र छह दुकानें ही अमरोहा से आई हैं।
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अमरोहा से पहुंचे दुकानदार उमैद, शाहजाद व नवी हसन ने बताया कि ढोलक का कारोबार पुश्तैनी है। उनके पिता, दादा और परदादा यहां मेले में दुकान लगाते थे। बीते 6-7 वर्ष से काफी लोगों ने मेले में दुकानें महंगी मिलने के कारण आना बंद कर दिया है। उन्होंने बताया कि मेले में दुकान महंगी हो गई और ढोलक बनाने का कच्चा माल भी महंगा होने से अब मेले में आकर औसत नहीं निकल पाता है। उमैद बताते हैं कि एक वक्त था जब छोटी ढोलक मात्र 50-60 रुपये में बिकती थी वह अब 150 से 200 रुपये में बिकती है। वहीं बड़ी ढोलक, नाल, मृदंग व डफली अब 500 से लेकर एक हजार रुपये तक में बिकती है।
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इन स्थानों से आता है कच्चा माल
ढोलक बनाने में प्रयुक्त होने वाला चमड़ा कानपुर, मेरठ और लखनऊ से आता है। वहीं ढोलक, नाल, मृदंग और डफली गोंडा से आती है जो कि आम व पापुलर की लकड़ी से बनती है।
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ढोलक की विदेशों तक में रहती है मांग
अमरोहा की बनी ढोलक की मांग विदेशों तक रहती है। यहां की बनी ढोलक मजबूत होने के साथ ढोलक कलाकारों की पहली पसंद रहती है। ढोलक कारोबारियों ने बताया कि विदेशों में अधिकांश ढोलक, नाल व मृदंग किसी भी सांस्कृतिक आयोजन में ज्यादा प्रयोग की जाती है। उमैद ने बताया कि अमरोहा में कई थोक कारोबारी हैं जो विदेशों में जाने वाली ढोलक को यहां से भेजते हैं।
मेले में कम ही सजीं प्रसाद की दुकानें
काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी मंदिर परिसर के बाहर प्रसाद की दुकानें सजने लगी हैं। यहां प्रसाद बेचने वालों ने बताया कि बीते कुछ वर्षों से दुकान-तहबाजारी का ठेका महंगा होने के कारण कई प्रसाद विक्रेताओं ने अब प्रसाद बेचना लगभग बंद कर दिया है। कई दुकानदारों ने नाम नहीं छापने की शर्त पर बताया कि 8-9 साल पहले जो दुकान तीन से पांच हजार रुपये में मिल जाती थी, वह दुकान अब 40 से 50 हजार रुपये तक में मिल रही है। उस दौरान यहां पर 40-50 प्रसाद विक्रेता प्रसाद बेचते थे जबकि अब आधे दुकानदार रह गए हैं। बताया बीते वर्ष तो कई प्रसाद विक्रेता नुकसान होने पर बीच में दुकानों को छोड़ कर चले गए थे। उन्होंने बताया कि अब तो हर साल दुकानों का ठेका महंगा होता जा रहा है जिसके कारण दुकानदारों का मेले में दुकान लगाने से मोह भंग हो रहा है।
मां बाल सुंदरी देवी मंदिर के दानपात्र की सील
पुलिस प्रशासन की मौजूदगी में 12 दानपात्र किए गए सील
काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी का डोला 25 मार्च की अर्धरात्रि मंदिर में पहुंचेगा। इससे पहले मेला प्रशासन/एसडीएम अभय प्रताप सिंह के निर्देश पर सोमवार को मंदिर परिसर में रखे गए 12 दानपात्रों को पंडा परिवार की मौजूदगी में तहसीलदार पंकज चंदोला की देखरेख में सील कर दिया गया। मेला प्रशासन/एसडीएम ने बताया कि हाईकोर्ट के आदेश के अनुरूप मंदिर परिसर के सभी दानपात्रों को पुलिस-प्रशासन की देखरेख में सील किया गया है। हाईकोर्ट का आदेश है कि मेला समाप्ति के बाद सभी दानपात्रों को पंडा परिवार की मौजूदगी में खोला जाए। वहां प्रशासन की ओर से पटवारी राहुल चौहान व रोहित शर्मा, संग्रह अमीन भूपेंद्र सिंह, चैती मेला चौकी प्रभारी पंकज कुमार आदि थे।
बरेली से मां बाल सुंदरी देवी दर्शन के लिए पहुंचने लगे श्रद्धालु
काशीपुर। मां बाल सुंदरी देवी को जहां बुक्सा समाज कुलदेवी के रूप में पूजता है। वहीं बरेली और पीलीभीत के श्रद्धालु भी मां बाल सुंदरी की अपनी कुलदेवी के रूप में पूजा-अर्चना करते हैं।
चैत्र मास में लगने वाले चैती मेले में हजारों श्रद्धालु मां बाल सुंदरी देवी के दर्शन करने पहुंचते हैं। मंदिर के मुख्य पंडा विकास अग्निहोत्री ने बताया कि यूपी के बरेली और पीलीभीत से श्रद्धालु प्रत्येक वर्ष यहां दर्शनों के लिए आते हैं। उन्होंने बताया कि एक वर्ष बरेली से और एक वर्ष पीलीभीत से श्रद्धालु यहां पहुंचते हैं। इस वर्ष बरेली के श्रद्धालु आएंगे जिनका पहुंचना शुरू हो गया है। यह श्रद्धालु परिवार सहित मेला परिसर में देवी डोला आने तक यहां रुकेंगे और प्रतिदिन सुबह-शाम पूजा-अर्चना करेंगे। उन्होंने बताया कि इस दौरान श्रद्धालु बड़े-बड़े देवी पताका के अलावा झोली लाते हैं जिसमें कौड़ी, सिक्के, खजला व प्रतीकात्मक सोने की मां दुर्गा की मूर्ति प्रसाद स्वरूप लाकर दरबार में चढ़ाते हैं। साथ ही जिनकी नई शादी होती है वह जात लगाते हैं और बच्चों का मुंडन संस्कार भी कराया जाता है।