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फरीदाबाद: दशहरे पर यहां नहीं जलेगा रावण का पुतला, होती है महात्मा रावण की पूजा; देखें वीडियो
मंगलवार को दशहरे के अवसर पर जहां शहर में जगह-जगह रावण, कुंभकर्ण और मेघनाद के पुतलों का दहन किया जाएगा, वहीं एनआईटी-5 स्थित सृष्टिकर्ता भगवान वाल्मीकि अनंत मंदिर में रावण की पूजा-अर्चना कर उन्हें श्रद्धांजलि दी जाएगी। मंदिर से जुड़े लोग रावण को राक्षस नहीं, बल्कि महात्मा और रक्षक मानते हैं। उनका मानना है कि रावण के व्यक्तित्व का गलत चित्रण किया गया है। यही वजह है कि वे रावण के पुतलों का दहन करने की परंपरा को भी उचित नहीं मानते।
एनआईटी में बीके-केसी रोड के पास स्थित आदि वाल्मीकि मंदिर में रावण की मूर्ति स्थापित है। यहां आने वाले श्रद्धालु प्रतिदिन मूर्ति के सामने नतमस्तक होते हैं। मंदिर में रावण के अलावा एकलव्य, महर्षि वाल्मीकि, संत रविदास और कबीरदास की मूर्तियां भी स्थापित हैं। मंदिर से जुड़े लोगों के अनुसार, यह मंदिर देश की आजादी से भी पुराना है और यहां लंबे समय से रावण की पूजा की जाती रही है। सोमवार देर शाम भी मंदिर में रावण की पूजा-अर्चना की गई। इस दौरान मंदिर कमेटी के प्रधान राजेंद्र चंडाल, महासचिव विनोद चौहान, नीरू केकसी समेत काफी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे। इनमें महिलाएं भी शामिल थीं।
मंगलवार को दशहरे पर मंदिर में रावण को श्रद्धांजलि दी जाएगी और वाल्मीकि रामायण का पाठ होगा। आयोजन में बड़ी संख्या में श्रद्धालुओं के शामिल होने की उम्मीद है। रावण को महात्मा मानने वाले करीब 100 से 150 परिवार फरीदाबाद में रहते हैं। विभाजन के समय तत्कालीन पाकिस्तान से आए इन परिवारों में से अधिकांश गांधी कॉलोनी, एनआईटी-4 की आदर्श कॉलोनी, भगत सिंह कॉलोनी और एसी नगर में रहते हैं।
रावण के कुनबे के नाम पर रखते हैं बच्चों के नाम
मंदिर कमेटी के प्रधान राजेंद्र चंडाल बताते हैं कि आदि धर्म समाज के प्रमुख दर्शन रत्न रावण लुधियाना में रहते हैं और उनका यहां भी आना-जाना लगा रहता है। समाज के कुछ लोग अपने सरनेम में दानव और आदिवासी शब्द का इस्तेमाल करते हैं। उन्होंने बताया कि उनके भतीजे का नाम मेघनाथ है। समाज के लोग रावण को राक्षस नहीं, बल्कि रक्षक मानते हैं। उनका कहना है कि रक्षक शब्द को ही बदलकर राक्षस के रूप में प्रस्तुत किया गया। इसी मान्यता के तहत समाज के लोग रावण के परिवार और उनके कुनबे से जुड़े नामों को भी महत्व देते है
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