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Naravane Controversy: Political turmoil over former Army Chief's book, opposition prepares new plan?
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Naravane Controversy: पूर्व सेना प्रमुख की किताब पर सियासी घमासान, विपक्ष ने तैयार किया नया प्लान ?
वीडियो डेस्क, अमर उजाला डॉट कॉम Published by: भास्कर तिवारी Updated Thu, 05 Feb 2026 06:30 AM IST
पूर्व सेना प्रमुख की हाल ही में प्रकाशित किताब को लेकर देश की राजनीति में तीखा सियासी घमासान शुरू हो गया है। किताब में किए गए कुछ खुलासों और टिप्पणियों ने न केवल राजनीतिक दलों को आमने-सामने ला खड़ा किया है, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य-नागरिक संबंध और सत्ता में बैठे लोगों की भूमिका जैसे संवेदनशील मुद्दों पर भी नई बहस छेड़ दी है। किताब के अंश सामने आते ही विपक्षी दलों ने सरकार पर गंभीर सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं। विपक्ष का आरोप है कि पुस्तक में जिन घटनाओं और फैसलों का उल्लेख किया गया है, वे उस दौर की नीतियों और नेतृत्व की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करते हैं, जिन्हें अब तक सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं किया गया था। उनका कहना है कि अगर ये दावे सही हैं तो सरकार को संसद में जवाब देना चाहिए और पूरे मामले की निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।
दूसरी ओर, सत्तारूढ़ दल ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि किताब को राजनीतिक एजेंडे के तहत पेश किया जा रहा है और पूर्व सेना प्रमुख के निजी विचारों को सरकारी नीति के रूप में दिखाना गलत है। सरकार समर्थक नेताओं का कहना है कि सेना जैसे अनुशासित संस्थान को राजनीति से दूर रखना चाहिए और सेवानिवृत्ति के बाद इस तरह की किताबें लिखना कई बार भ्रम और अनावश्यक विवाद को जन्म देता है। उन्होंने यह भी तर्क दिया कि राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े मामलों पर सार्वजनिक मंच पर टिप्पणी करते समय विशेष सावधानी बरती जानी चाहिए, ताकि देश के हितों को कोई नुकसान न पहुंचे।
इस पूरे विवाद में सैन्य विशेषज्ञ और पूर्व अधिकारी भी दो खेमों में बंटे नजर आ रहे हैं। कुछ का मानना है कि एक पूर्व सेना प्रमुख को अपने अनुभव और दृष्टिकोण साझा करने का पूरा अधिकार है, क्योंकि इससे नीति निर्माण और लोकतांत्रिक पारदर्शिता मजबूत होती है। वहीं, अन्य विशेषज्ञों का कहना है कि संवेदनशील सूचनाओं का सार्वजनिक होना सुरक्षा के लिहाज से जोखिम भरा हो सकता है और इससे सिविल-मिलिट्री संतुलन पर असर पड़ सकता है। सोशल मीडिया पर भी किताब के पक्ष और विपक्ष में तीखी बहस चल रही है, जहां लोग इसे सच सामने लाने की कोशिश बता रहे हैं तो कुछ इसे सनसनी फैलाने वाला कदम करार दे रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, यह विवाद केवल एक किताब तक सीमित नहीं है, बल्कि यह सत्ता, संस्थाओं और जवाबदेही के व्यापक सवालों को छूता है। आने वाले दिनों में संसद, मीडिया और राजनीतिक मंचों पर इस मुद्दे पर चर्चा और तेज होने की संभावना है। फिलहाल, पूर्व सेना प्रमुख की किताब ने देश की राजनीति में ऐसा तूफान खड़ा कर दिया है, जिसने नीतियों से लेकर नैतिकता तक कई अहम सवालों को फिर से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
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