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West Bengal Election 2026: How will Mamata breach this BJP stronghold?
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West Bengal Election 2026: भाजपा के इस गढ़ में कैसे सेंध लगाएंगी ममता?
अमर उजाला डिजिटल डॉट कॉम Published by: Adarsh Jha Updated Sun, 29 Mar 2026 09:46 PM IST
पश्चिम बंगाल की सियासत में इस वक्त सबसे बड़ी चर्चा अगर किसी की है, तो वह है ‘अधिकारी परिवार’। पूर्व मेदिनीपुर की जमीन पर इस परिवार का दबदबा कोई नया नहीं है, लेकिन इस बार का चुनाव इसलिए खास हो गया है क्योंकि सियासी वफादारी काफी वक्त पहले ही बदल बदल गई थी। और पूरा समीकरण उलट गया था। इस बदले हुए समीकरण ने TMC को भी अपनी रणनीति पर फिर विचार करने पर मजबूर कर दिया था।
दरअसल, कभी All India Trinamool Congress का मजबूत स्तंभ रहा यह परिवार अब Bharatiya Janata Party के साथ खड़ा है, और इसकी अगुवाई कर रहे हैं नेता प्रतिपक्ष Suvendu Adhikari। ऐसे में तमलुक, कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण की सीटें सिर्फ चुनावी मैदान नहीं, बल्कि प्रतिष्ठा की जंग बन चुकी हैं। क्योंकि इन सीटों पर अधिकारी परिवार का दबदबा रहा है जो कभी TMC के लिए बेहद सुरक्षित मानी जाती थी।
अब ऐसे में सवाल उठता है क्या अधिकारी परिवार का जादू इस बार भी चलेगा? क्या Mamata Banerjee की टीएमसी इस गढ़ को भेद पाएगी? या फिर मेदिनीपुर से ही बदलेगी बंगाल की सियासत की दिशा?
इन्हीं सवालों के जवाब तलाशती है हमारी ये खास वीडियो। तो आइए समझते हैं पूरा समीकरण।
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस बार का विधानसभा चुनाव कई मायनों में बेहद दिलचस्प हो गया है, लेकिन सबसे ज्यादा चर्चा जिस नाम की है, वह है ‘अधिकारी परिवार’। पूर्व मेदिनीपुर जिले की तमलुक, कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण सीटें इस चुनाव में सियासी जंग का केंद्र बन चुकी हैं, जहां मुकाबला सिर्फ पार्टियों के बीच नहीं बल्कि प्रभाव, वफादारी और जमीनी पकड़ का भी है।
इस पूरे सियासी समीकरण के केंद्र में हैं पूर्व केंद्रीय मंत्री Shishir Adhikari और उनका परिवार, जिसने दशकों से इस इलाके की राजनीति को दिशा दी है। कभी कांग्रेस और वामपंथ विरोधी राजनीति से उभरकर यह परिवार All India Trinamool Congress का मजबूत स्तंभ बना, लेकिन अब पूरी तरह Bharatiya Janata Party के साथ खड़ा है।
परिवार के सबसे प्रमुख चेहरे Suvendu Adhikari हैं, जो वर्तमान में पश्चिम बंगाल विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष हैं। उनके साथ उनके भाई Dibyendu Adhikari और Soumendu Adhikari भी राजनीति में सक्रिय हैं। इस परिवार का प्रभाव इतना व्यापक है कि पूर्व मेदिनीपुर के कई इलाकों में वोटिंग पैटर्न भी इनके रुख से प्रभावित होता रहा है।
अब समझते हैं नंदीग्राम आंदोलन कैसे बना अधिकारी परिवार का मजबूत आधार
ये बात है वर्ष 2007 की जब अधिकारी परिवार की जड़ें राजनीति में मजबूत हुई। अधिकारी परिवार की राजनीतिक पकड़ को मजबूती 2007 के Nandigram Movement के दौरान मिली। उस समय सुवेंदु अधिकारी ने किसानों की जमीन अधिग्रहण के खिलाफ जो आंदोलन खड़ा किया, उसने वामपंथी सरकार की नींव हिला दी और Mamata Banerjee को सत्ता तक पहुंचाने में अहम भूमिका निभाई। इसके बाद यह परिवार इलाके में एक मजबूत राजनीतिक शक्ति बनकर उभरा।
अब बात कर लेते हैं उन दो सीटों के बारे में जो अधिकारी परिवार की सबसे मजबूत सीट मानी जाती है। वो हैं तमलुक और कांथी।
तमलुक: इसे कांटे की टक्कर वाली सीट कहा जाता है
तमलुक विधानसभा सीट इस बार सबसे ज्यादा संवेदनशील मानी जा रही है। 2021 के चुनाव में यहां मुकाबला बेहद करीबी रहा था, जहां टीएमसी उम्मीदवार ने भाजपा को महज कुछ सौ वोटों से हराया था। यही वजह है कि इस बार सभी दलों ने यहां पूरी ताकत झोंक दी है। उम्मीदवारों के चयन से लेकर बूथ मैनेजमेंट तक हर स्तर पर रणनीति तैयार की गई है।
कांथी: जो की अधिकारी परिवार का गढ़ है
कांथी उत्तर और कांथी दक्षिण को अधिकारी परिवार का असली पावर सेंटर माना जाता है। 2021 में भाजपा ने यहां शानदार प्रदर्शन किया था और इस बार भी पार्टी को अपने उम्मीदवारों से काफी उम्मीदें हैं। खास बात यह है कि इन सीटों पर चुनाव सिर्फ उम्मीदवारों का नहीं बल्कि परिवार के प्रभाव और संगठनात्मक ताकत का भी है।
एक वक्त आया सुवेंदु अधिकारी के एक फैसले से TMC को बड़ा झटका लगा, और इसे सबसे अहम मोड़ भी माना गया। बात है दल-बदल की जिसने पूरा समीकरण ही बदल दिया। जब सुवेंदु अधिकारी ने टीएमसी छोड़कर भाजपा का दामन थामा, तो यह सिर्फ एक नेता का बदलाव नहीं था, बल्कि एक पूरे राजनीतिक ढांचे का स्थानांतरण था। इससे भाजपा को पूर्व मेदिनीपुर में मजबूत कैडर और संगठन मिल गया। वहीं, टीएमसी अब इस इलाके में अपनी पकड़ दोबारा मजबूत करने की कोशिश कर रही है।
अब सवाल उठता है कीअसली चुनौती क्या है?
टीएमसी जहां सरकारी योजनाओं और विकास कार्यों के सहारे जनता को साधने में जुटी है, वहीं भाजपा अधिकारी परिवार की जमीनी पकड़ और संगठनात्मक नेटवर्क के दम पर बढ़त बनाए रखना चाहती है। दूसरी ओर वाम दल और कांग्रेस अगर वोट काटने में सफल होते हैं, तो कई सीटों पर परिणाम पूरी तरह बदल सकते हैं।
राज्य की 294 सीटों पर मतदान 23 और 29 अप्रैल को होगा, जबकि 4 मई को नतीजे घोषित किए जाएंगे। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या अधिकारी परिवार का दबदबा कायम रहेगा या इस बार बंगाल की सियासत में नया समीकरण देखने को मिलेगा।
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