{"_id":"6a59a090a710657185039b2b","slug":"48-attacks-in-15-days-over-40-pakistani-soldiers-claimed-killed-in-baloch-attacks-pak-army-remains-silent-2026-07-17","type":"story","status":"publish","title_hn":"15 दिन 48 हमले: बलूचिस्तान में 40 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने का दावा; पाक सेना ने साधी चुप्पी","category":{"title":"World","title_hn":"दुनिया","slug":"world"}}
15 दिन 48 हमले: बलूचिस्तान में 40 से ज्यादा पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने का दावा; पाक सेना ने साधी चुप्पी
Fri, 17 Jul 2026 08:56 AM IST
प्रशांत तिवारी
एएनआई, वर्ल्ड डेस्क
एएनआई, वर्ल्ड डेस्क
Published by: प्रशांत तिवारी
Updated Fri, 17 Jul 2026 08:56 AM IST
सार
बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) ने दावा किया है कि उसने 1 से 14 जुलाई के बीच बलूचिस्तान में 48 समन्वित हमले किए, जिनमें 40 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षा कर्मियों के मारे जाने और कई अन्य के घायल होने का दावा किया गया है। संगठन के अनुसार, इन हमलों में सैन्य काफिलों, चौकियों, पुलों और रसद मार्गों को निशाना बनाया गया। हालांकि, पाकिस्तान सरकार या सेना ने इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं की है।
विज्ञापन
पाक आर्मी
- फोटो : एएनआई/अमर उजाला ग्राफिक्स
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
विस्तार
बलूच लिबरेशन आर्मी ने दावा किया है कि उसने 1 जुलाई से 14 जुलाई के बीच बलूचिस्तान के विभिन्न हिस्सों में 48 हमले किए। संगठन के मुताबिक इन समन्वित अभियानों में 40 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षा कर्मी मारे गए और कई अन्य घायल हुए। BLA का कहना है कि उसके निशाने पर सैन्य काफिले, सुरक्षा चौकियां, पुल और सेना की रसद आपूर्ति से जुड़े मार्ग रहे।
विज्ञापन
किन इलाकों में किए गए हमलों का दावा किया गया?
BLA के प्रवक्ता जीयंद बलूच की ओर से जारी बयान में कहा गया कि संगठन के लड़ाकों ने 1 जुलाई से 14 जुलाई के बीच मस्तुंग, नुश्की, केच, सूराब, खुजदार, जियारत, खारान और कलात जिलों में हथियारबंद हमले और आईईडी (इम्प्रोवाइज्ड एक्सप्लोसिव डिवाइस) विस्फोट किए।
विज्ञापन
1 जुलाई को क्या हुआ था?
BLA के अनुसार, 1 जुलाई को मस्तुंग के दश्त इलाके में सेना की रसद सामग्री ले जा रहे एक वाहन को निशाना बनाया गया, जिसमें दो पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने का दावा किया गया। संगठन ने यह भी कहा कि उसने नुश्की और पंजगुर में मालवाहक वाहनों पर हमले किए, जिन्हें उसने अपने कथित "आर्थिक नाकेबंदी अभियान" का हिस्सा बताया।
विज्ञापन
3 जुलाई को किन ठिकानों को निशाना बनाया गया?
संगठन का दावा है कि 3 जुलाई को नुश्की और मस्तुंग में आईईडी हमलों में कम से कम दो सुरक्षा कर्मी मारे गए और सैन्य ढांचे को नुकसान पहुंचा, जिसमें एक पुल भी शामिल था। BLA ने यह भी दावा किया कि उसने हरनाई, जियारत और दलबंदीन के राजमार्गों पर अस्थायी नाकेबंदी की, पूछताछ के लिए दो लोगों को हिरासत में लिया तथा कई पुलों और व्यावसायिक वाहनों को क्षतिग्रस्त कर दिया।
आगे के दिनों में किन हमलों का दावा किया गया?
BLA ने दावा किया कि इसके बाद केच, नुश्की और खुजदार में पाकिस्तानी सुरक्षा बलों को निशाना बनाया गया। संगठन के मुताबिक सैन्य शिविरों पर ग्रेनेड हमले किए गए, गश्ती दलों पर हमला किया गया और अहमद वाल में एक पुलिस थाने पर कुछ समय के लिए कब्जा करने के बाद उसे आग के हवाले कर दिया गया।
सबसे भीषण संघर्ष कब और कहां हुआ?
BLA के अनुसार, सबसे भीषण लड़ाई 7 जुलाई को हरनाई के पास खलीफात इलाके में हुई, जहां कई पाकिस्तानी सैनिकों के मारे जाने का दावा किया गया। संगठन ने यह भी कहा कि 14 जुलाई को क्वेटा-कराची हाईवे पर एक महत्वपूर्ण पुल को विस्फोट से उड़ा दिया गया।
क्या BLA ने अपने लड़ाकों के मारे जाने की भी पुष्टि की?
BLA ने स्वीकार किया कि इन अभियानों के दौरान उसके पांच लड़ाके भी मारे गए। संगठन ने उनकी पहचान रहीमुल्लाह उर्फ जफर, खैर मोहम्मद उर्फ हमाल, संगत काका उर्फ रशीद, मसूद उर्फ सामी और शाह नजर उर्फ बादल के रूप में बताई। बयान के अंत में BLA ने कहा कि वह पाकिस्तानी राज्य के खिलाफ अपना सशस्त्र अभियान आगे भी जारी रखेगा।
बलूचिस्तान पाक सेना के लिए चुनौती क्यों?
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा, लेकिन सबसे कम आबादी वाला प्रांत है। यहां का विशाल और दुर्गम भूभाग सेना के लिए सैनिकों और सैन्य संसाधनों की आवाजाही को बेहद कठिन बना देता है। इसी वजह से सेना को मुख्य रूप से कुछ चुनिंदा राष्ट्रीय राजमार्गों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। यही सीमित सड़क नेटवर्क सैनिकों की आवाजाही को काफी हद तक अनुमानित बना देता है। विद्रोही संगठन कई दिनों तक इन मार्गों पर नजर रखकर सैनिकों की गतिविधियों का अध्ययन करते हैं और फिर ऐसे स्थान चुनते हैं जहां घात लगाकर हमला करना आसान हो। ऊंचे इलाकों और संकरे रास्तों पर पहले से मोर्चाबंदी कर वे संघर्ष की पूरी परिस्थितियों को अपने पक्ष में कर लेते हैं।
सैन्य काफिले इतने आसान निशाने कैसे बन जाते हैं?
रिपोर्ट में दावा किया गया है कि पाकिस्तानी सेना कई बार सक्रिय संघर्ष वाले इलाकों में सैनिकों को विशेष बख्तरबंद माइन-रेजिस्टेंट एम्बुश प्रोटेक्टेड (MRAP) वाहनों के बजाय सामान्य यात्री बसों से ले जाती है। यदि ऐसा होता है, तो ऐसे वाहन बारूदी सुरंगों (IED) और भारी गोलीबारी के सामने बेहद असुरक्षित साबित होते हैं। इन बसों में मजबूत सुरक्षा कवच नहीं होने के कारण हमला शुरू होते ही भारी जनहानि का खतरा बढ़ जाता है। शुरुआती मिनटों में ही बड़ी संख्या में सैनिक हताहत हो सकते हैं और जीवित बचे जवान भी लंबे समय तक असुरक्षित स्थिति में फंस जाते हैं।
क्या स्थानीय खुफिया तंत्र की कमजोरी भी बड़ी वजह है?
विश्लेषण के अनुसार, बलूचिस्तान में पाकिस्तानी सेना के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक स्थानीय स्तर पर विश्वसनीय मानव खुफिया का अभाव है। वर्षों से चले आ रहे सैन्य अभियानों और राजनीतिक असंतोष के कारण स्थानीय बलूच आबादी के एक हिस्से में केंद्र सरकार के प्रति गहरा अविश्वास बताया जाता है। ऐसी स्थिति में सुरक्षा एजेंसियों के लिए स्थानीय मुखबिरों का नेटवर्क तैयार करना कठिन हो जाता है, जबकि विद्रोही संगठनों को स्थानीय स्तर पर प्रत्यक्ष या परोक्ष सूचना सहयोग मिलने के दावे किए जाते हैं। इससे विद्रोहियों को सैनिकों की आवाजाही, गश्त और सैन्य प्रतिक्रिया की जानकारी पहले से मिल जाती है, जबकि सुरक्षा बल संभावित खतरे का समय रहते सटीक आकलन नहीं कर पाते।
ये भी पढ़ें: ईरान पर अमेरिका का प्रहार: पुल, एयरपोर्ट और रेलवे स्टेशन मलबे में तब्दील, ट्रंप की चेतावनी के बाद मची तबाही
आखिर बलूचिस्तान का संघर्ष लगातार क्यों गहराता जा रहा है?
इस लंबे संघर्ष की जड़ में बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों पर नियंत्रण का विवाद भी बताया जाता है। यह प्रांत प्राकृतिक गैस, तांबा और सोने जैसे बहुमूल्य खनिजों से समृद्ध है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन संसाधनों का आर्थिक लाभ मुख्य रूप से केंद्र सरकार को मिलता है, जबकि संसाधन संपन्न इलाकों में रहने वाले लोगों को स्वच्छ पेयजल, विश्वसनीय बिजली और बुनियादी स्वास्थ्य सेवाएं जैसी सुविधाएं भी पर्याप्त रूप से उपलब्ध नहीं हैं। आर्थिक असमानता और लंबे समय से चली आ रही नाराजगी को विश्लेषक इस विद्रोह के लगातार मजबूत होने की प्रमुख वजहों में गिनते हैं।