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Indus Water Dispute: सिंधु जल विवाद में पाकिस्तान को झटका; केस भी लड़ रहा और भारत का बिल भी भर रहा पड़ोसी

Fri, 17 Jul 2026 02:39 PM IST
प्रशांत तिवारी वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला Published by: प्रशांत तिवारी Updated Fri, 17 Jul 2026 02:39 PM IST
सार

सिंधु जल संधि विवाद में भारत के मध्यस्थता से अलग होने के बाद पाकिस्तान पर आर्थिक बोझ बढ़ गया है। रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद अब अपना ही नहीं बल्कि भारत के हिस्से का मध्यस्थता खर्च भी उठा रहा है। विवाद किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं से जुड़ा है, जबकि भारत अब भी PCA की वैधता और उसके अधिकार क्षेत्र को स्वीकार नहीं करता।

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Double blow to Pakistan in Indus water dispute Pak fighting case and also paying India's bill
Chenab River Bridge - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

विस्तार

पाकिस्तान ने सिंधु जल संधि विवाद को अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तक ले जाकर भारत पर दबाव बनाने की कोशिश की थी, लेकिन अब यह दांव उसी पर भारी पड़ता दिख रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की एक रिपोर्ट के मुताबिक, भारत द्वारा मध्यस्थता की कार्यवाही से खुद को अलग करने और संधि को फिलहाल स्थगित रखने के फैसले के बाद पाकिस्तान न केवल अपना, बल्कि भारत के हिस्से का मध्यस्थता खर्च भी वहन कर रहा है। इकोनॉमिक टाइम्स की रिपोर्ट के अनुसार, इस्लामाबाद अब तक 6 लाख डॉलर (600,000 डॉलर) से अधिक खर्च कर चुका है और जैसे-जैसे मामला आगे बढ़ेगा, यह राशि और बढ़ने की संभावना है।

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पूरा खर्च पाकिस्तान पर क्यों आया?
सिंधु जल संधि के तहत भारत और पाकिस्तान को मध्यस्थता की कार्यवाही का खर्च बराबर-बराबर उठाना होता है। लेकिन अप्रैल 2025 के पहलगाम आतंकी हमले के बाद भारत ने इस प्रक्रिया में अपनी भागीदारी निलंबित कर दी। नई दिल्ली ने स्पष्ट कहा कि जब तक पाकिस्तान सीमा पार आतंकवाद के खिलाफ विश्वसनीय और अपरिवर्तनीय कार्रवाई नहीं करता, तब तक सिंधु जल संधि को स्थगित रखा जाएगा। भारत के इस फैसले के बावजूद पाकिस्तान ने मध्यस्थता की कार्यवाही जारी रखी और रिपोर्ट के मुताबिक अब वह दोनों देशों के हिस्से का खर्च भी स्वयं उठा रहा है।
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आखिर विवाद की जड़ क्या है?
यह पूरा विवाद भारत की किशनगंगा और रतले जलविद्युत परियोजनाओं को लेकर है, जो सिंधु जल संधि के तहत आने वाली पश्चिमी नदियों पर बनाई जा रही हैं। पाकिस्तान का आरोप है कि ये परियोजनाएं संधि के प्रावधानों का उल्लंघन करती हैं। इसी आधार पर उसने मामले को परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन (PCA) में पहुंचाया। दूसरी ओर भारत का कहना है कि इस तरह के तकनीकी विवादों का समाधान न्यूट्रल एक्सपर्ट (तटस्थ विशेषज्ञ) के जरिए होना चाहिए, न कि मध्यस्थता न्यायाधिकरण के माध्यम से। भारत का यह भी तर्क है कि संधि के तहत दोनों विवाद निपटान प्रक्रियाएं एक साथ नहीं चल सकतीं।
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भारत ने PCA की वैधता पर क्या कहा है?
भारत ने परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन के अधिकार क्षेत्र को पूरी तरह खारिज कर दिया है। नई दिल्ली का कहना है कि यह न्यायाधिकरण "अवैध तरीके से गठित" किया गया है, इसलिए इसके द्वारा दिए जाने वाले किसी भी फैसले को भारत 'शून्य और अमान्य' मानता है।


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भारत की अनुपस्थिति के बावजूद सुनवाई कैसे जारी है?
अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता के नियमों के अनुसार, यदि किसी पक्ष की अनुपस्थिति के बावजूद न्यायाधिकरण यह मान ले कि उसके पास मामले की सुनवाई का अधिकार क्षेत्र है, तो कार्यवाही जारी रह सकती है। परमानेंट कोर्ट ऑफ आर्बिट्रेशन ने पाकिस्तान की आपत्तियों पर सुनवाई करने का अधिकार अपने पास होने की बात कही है और भारत की आपत्तियों को स्वीकार नहीं किया। वहीं, भारत अब भी इस पूरी प्रक्रिया से दूरी बनाए हुए है और कार्यवाही में शामिल नहीं हो रहा है।
 

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