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अमेरिका: संघीय कोर्ट ने डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को दिया बड़ा झटका, चुनाव संबंधी आदेश पर लगाई स्थायी रोक
वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, वाशिंगटन डीसी।
Published by: निर्मल कांत
Updated Wed, 24 Jun 2026 11:33 PM IST
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सार
अमेरिका की संघीय अदालत ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के चुनाव संबंधी कार्यकारी आदेश के बड़े हिस्से पर स्थायी रोक लगाते हुए उसे लागू करने से रोक दिया है। इस आदेश में मतदाता पंजीकरण के लिए नागरिकता प्रमाण अनिवार्य करने और डाक मतपत्रों पर सख्त नियम जैसे प्रावधान शामिल थे। पढ़िए रिपोर्ट-
डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन को झटका
- फोटो : अमर उजाला ग्राफिक/एएनआई
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विस्तार
अमेरिका की एक संघीय न्यायाधीश ने बुधवार को राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन को बड़ा झटका दिया। अदालत ने उनके चुनाव संबंधी पहले कार्यकारी आदेश के अधिकांश हिस्सों को लागू करने पर स्थायी रोक लगा दी। ट्रंप के इस आदेश में मतदान के लिए पंजीकरण कराने वाले लोगों से नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण मांगने का प्रस्ताव था। अदालत के फैसले के बाद फिलहाल यह नियम लागू नहीं किया जा सकेगा।
बोस्टन की अमेरिकी जिला अदालत की जज डेनिस कैस्पर ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले भी उन्होंने पिछले साल ट्रंप प्रशासन की चुनाव व्यवस्था में बदलाव लाने की कई कोशिशों पर अस्थायी रोक लगाई थी। अब उस रोक को स्थायी बना दिया गया है। ट्रंप प्रशासन का कहना था कि इस मामले में दायर मुकदमा समय से पहले किया गया है, तब नियम लागू नहीं हुए थे। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
न्यायाधीश ने कहा कि अमेरिकी संविधान चुनावों को नियंत्रित करने का अधिकार राज्यों और कांग्रेस (संसद) को देता है। राष्ट्रपति को चुनावों पर कोई विशेष अधिकार नहीं दिया गया है। ट्रंप के आदेश में यह भी प्रस्ताव था कि चुनाव दिवस के बाद पहुंचने वाले डाक मतपत्रों को न गिना जाए, भले ही उन पर चुनाव दिवस तक की डाक मुहर लगी हो। इसके अलावा, आदेश का पालन न करने वाले राज्यों की कुछ संघीय फंडिंग रोकने का भी प्रावधान था।
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न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने फैसले पर क्या कहा?
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अदालत ने ट्रंप के चुनावों पर नियंत्रण के असांविधानिक प्रयास को रोक दिया है। जेम्स ने कहा कि मतदान का अधिकार हासिल करने के लिए कई पीढ़ियों ने संघर्ष किया है। इसलिए इस अधिकार की रक्षा करना जरूरी है। व्हाइट हाउस और न्याय विभाग से इस फैसले पर प्रतिक्रिया मांगी गई। लेकिन तत्काल कोई जवाब नहीं मिला।
यह फैसला ट्रंप के खिलाफ आए कई अदालती फैसलों की कड़ी में एक और बड़ा झटका है। उनके चुनाव संबंधी कार्यकारी आदेशों को पहले भी अदालतों में चुनौती मिल चुकी है। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के कुछ ही समय बाद ट्रंप ने चुनावों को लेकर एक और कार्यकारी आदेश जारी किया था। उस आदेश को भी कई कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस नए आदेश के तहत राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं की एक सूची बनाने और डाक मतपत्रों के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियां लगाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, इस आदेश को भी अदालतों में चुनौती दी गई है। इसके खिलाफ कई कानूनी मामले चल रहे हैं।
ये भी पढ़ें: लावरोव बोले- यूक्रेन शांति समझौते पर अलास्का में बनी थी सहमति, अब US के जवाब का इंतजार
पिछले साल वाशिंगटन डीसी की एक संघीय अदालत ने भी ट्रंप प्रशासन को झटका दिया था। अदालत ने सरकार को संघीय मतदाता पंजीकरण फॉर्म में नागरिकता प्रमाण की अनिवार्यता जोड़ने से रोक दिया था। बाद में उसी न्यायाधीश ने एक और आदेश जारी किया। इसके तहत रक्षा मंत्रालय को सैन्य कर्मियों से मतदान के लिए पंजीकरण कराते समय या मतपत्र मांगते समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण मांगने से रोक दिया गया।
ट्रंप अब इस तरह की व्यवस्था को कानून के जरिये लागू कराने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए रिपब्लिकन सांसदों ने सेव अमेरिका एक्ट नाम का विधेयक पेश किया है। यह विधेयक प्रतिनिधि सभा से पारित हो चुका है। लेकिन सीनेट में अटका हुआ है। इसी वजह से ट्रंप उस फिलीबस्टर नियम को खत्म करने की मांग कर रहे हैं, जो इस विधेयक को आगे बढ़ने से रोक रहा है।
बोस्टन की अमेरिकी जिला अदालत की जज डेनिस कैस्पर ने यह फैसला सुनाया। इससे पहले भी उन्होंने पिछले साल ट्रंप प्रशासन की चुनाव व्यवस्था में बदलाव लाने की कई कोशिशों पर अस्थायी रोक लगाई थी। अब उस रोक को स्थायी बना दिया गया है। ट्रंप प्रशासन का कहना था कि इस मामले में दायर मुकदमा समय से पहले किया गया है, तब नियम लागू नहीं हुए थे। लेकिन अदालत ने इस दलील को स्वीकार नहीं किया।
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न्यायाधीश ने कहा कि अमेरिकी संविधान चुनावों को नियंत्रित करने का अधिकार राज्यों और कांग्रेस (संसद) को देता है। राष्ट्रपति को चुनावों पर कोई विशेष अधिकार नहीं दिया गया है। ट्रंप के आदेश में यह भी प्रस्ताव था कि चुनाव दिवस के बाद पहुंचने वाले डाक मतपत्रों को न गिना जाए, भले ही उन पर चुनाव दिवस तक की डाक मुहर लगी हो। इसके अलावा, आदेश का पालन न करने वाले राज्यों की कुछ संघीय फंडिंग रोकने का भी प्रावधान था।
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल ने फैसले पर क्या कहा?
न्यूयॉर्क की अटॉर्नी जनरल लेटिशिया जेम्स ने फैसले का स्वागत किया। उन्होंने कहा कि अदालत ने ट्रंप के चुनावों पर नियंत्रण के असांविधानिक प्रयास को रोक दिया है। जेम्स ने कहा कि मतदान का अधिकार हासिल करने के लिए कई पीढ़ियों ने संघर्ष किया है। इसलिए इस अधिकार की रक्षा करना जरूरी है। व्हाइट हाउस और न्याय विभाग से इस फैसले पर प्रतिक्रिया मांगी गई। लेकिन तत्काल कोई जवाब नहीं मिला।
यह फैसला ट्रंप के खिलाफ आए कई अदालती फैसलों की कड़ी में एक और बड़ा झटका है। उनके चुनाव संबंधी कार्यकारी आदेशों को पहले भी अदालतों में चुनौती मिल चुकी है। अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत के कुछ ही समय बाद ट्रंप ने चुनावों को लेकर एक और कार्यकारी आदेश जारी किया था। उस आदेश को भी कई कानूनी चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है। इस नए आदेश के तहत राष्ट्रीय स्तर पर मतदाताओं की एक सूची बनाने और डाक मतपत्रों के इस्तेमाल पर कुछ पाबंदियां लगाने की कोशिश की गई थी। हालांकि, इस आदेश को भी अदालतों में चुनौती दी गई है। इसके खिलाफ कई कानूनी मामले चल रहे हैं।
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पिछले साल वाशिंगटन डीसी की एक संघीय अदालत ने भी ट्रंप प्रशासन को झटका दिया था। अदालत ने सरकार को संघीय मतदाता पंजीकरण फॉर्म में नागरिकता प्रमाण की अनिवार्यता जोड़ने से रोक दिया था। बाद में उसी न्यायाधीश ने एक और आदेश जारी किया। इसके तहत रक्षा मंत्रालय को सैन्य कर्मियों से मतदान के लिए पंजीकरण कराते समय या मतपत्र मांगते समय नागरिकता का दस्तावेजी प्रमाण मांगने से रोक दिया गया।
ट्रंप अब इस तरह की व्यवस्था को कानून के जरिये लागू कराने की कोशिश कर रहे हैं। इसके लिए रिपब्लिकन सांसदों ने सेव अमेरिका एक्ट नाम का विधेयक पेश किया है। यह विधेयक प्रतिनिधि सभा से पारित हो चुका है। लेकिन सीनेट में अटका हुआ है। इसी वजह से ट्रंप उस फिलीबस्टर नियम को खत्म करने की मांग कर रहे हैं, जो इस विधेयक को आगे बढ़ने से रोक रहा है।