Germany-Poland Deal: क्या बदलेगा यूरोप का शक्ति संतुलन? रूस के खतरे के बीच जर्मनी-पोलैंड की नई रक्षा साझेदारी
रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था तेजी से बदल रही है। इसी बीच जर्मनी और पोलैंड नया रक्षा समझौता करने जा रहे हैं। इस समझौते में बाल्टिक क्षेत्र की सुरक्षा, सैन्य आवाजाही, साइबर रक्षा और नई तकनीकों पर सहयोग शामिल होगा। अमेरिका की यूरोप में भूमिका को लेकर बढ़ती अनिश्चितता के बीच दोनों देश अपनी सैन्य साझेदारी मजबूत करना चाहते हैं। आइए, विस्तार से पूरे मामले को जानते हैं...
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यूरोप में बदलते शक्ति संतुलन और रूस से बढ़ते सुरक्षा खतरों के बीच जर्मनी और पोलैंड एक नए रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर करने जा रहे हैं। यह समझौता ऐसे समय में हो रहा है जब अमेरिका की यूरोप में सैन्य मौजूदगी को लेकर अनिश्चितता बनी हुई है और यूरोपीय देशों पर अपनी सुरक्षा व्यवस्था मजबूत करने का दबाव बढ़ रहा है। कभी इतिहास और युद्ध की कड़वी यादों से प्रभावित रहे जर्मनी और पोलैंड अब महाद्वीप की सुरक्षा को लेकर एक-दूसरे के और करीब आते दिखाई दे रहे हैं।
यूरोप की सुरक्षा के लिए यह समझौता कितना महत्वपूर्ण है?
जर्मनी और पोलैंड के बीच होने वाला यह रक्षा समझौता बाल्टिक सागर क्षेत्र की सुरक्षा, सैन्य आवाजाही, रक्षा ढांचे, साइबर सुरक्षा और नई सैन्य तकनीकों में सहयोग को मजबूत करेगा। रूस के 2022 में यूक्रेन पर बड़े हमले के बाद यूरोप की सुरक्षा चिंताएं बढ़ गई थीं। इसी के बाद दोनों देशों के संबंध अधिक व्यावहारिक हुए। पोलैंड चाहता है कि यूरोप के बड़े देश महाद्वीप के पूर्वी हिस्से की सुरक्षा में बड़ी भूमिका निभाएं। वहीं जर्मनी भी अपनी सेना बुंडेसवेहर को मजबूत बनाने में जुटा है। जर्मन चांसलर फ्रेडरिक मर्ज ने दिसंबर में पोलैंड के प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क से मुलाकात के बाद कहा था कि हम जर्मनों को बराबरी के साझेदार के रूप में एक मजबूत पोलैंड की जरूरत है। यह हमारे बुनियादी हित में है।
बाल्टिक क्षेत्र की सुरक्षा में जर्मनी और पोलैंड की क्या भूमिका होगी?
वारसॉ स्थित सेंटर फॉर ईस्टर्न स्टडीज की उपनिदेशक जस्टीना गोटकोव्स्का के अनुसार नाटो की रक्षा योजनाओं में जर्मनी की भूमिका बेहद अहम है। उन्होंने कहा कि जर्मनी काफी हद तक बाल्टिक देशों की रक्षा के लिए जिम्मेदार है और पोलैंड के सहयोग के बिना यह संभव नहीं होगा। नाटो के रणनीतिकार लंबे समय से मानते रहे हैं कि भविष्य में यदि रूस किसी नाटो सदस्य पर हमला करता है तो बाल्टिक देश सबसे संवेदनशील क्षेत्र हो सकते हैं। ऐसे में जर्मनी, पोलैंड और मध्य तथा पूर्वी यूरोप के अन्य देशों के बीच तालमेल बढ़ाना नाटो की प्राथमिकताओं में शामिल हो गया है। यूक्रेन के लिए सैन्य और मानवीय सहायता पहुंचाने में भी पोलैंड एक प्रमुख लॉजिस्टिक केंद्र बन चुका है।
क्या इतिहास की कड़वी यादें अब भी दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर रही हैं?
हालांकि रक्षा सहयोग बढ़ रहा है, लेकिन दोनों देशों के बीच इतिहास से जुड़े विवाद पूरी तरह खत्म नहीं हुए हैं। पोलैंड में पूर्व की राष्ट्रवादी सरकार ने द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान जर्मन कब्जे के लिए 1.3 ट्रिलियन डॉलर के मुआवजे की मांग की थी, जिसे बर्लिन ने खारिज कर दिया था। पोलैंड के विदेश मंत्री राडोस्लाव सिकोर्स्की ने जून में पोलिश रेडियो ट्रोज्का से कहा था कि यदि जर्मनी के साथ फ्रांस और ब्रिटेन जैसी व्यापक राजनीतिक रक्षा संधि की कोशिश की जाती तो यहां बड़ा राजनीतिक विवाद खड़ा हो जाता। उन्होंने यह भी संकेत दिया कि राष्ट्रपति कारोल नवरोत्स्की ऐसी संधि का समर्थन नहीं करेंगे। वहीं डोनाल्ड टस्क भी चाहते हैं कि जर्मनी युद्ध पीड़ितों को मुआवजा देने की प्रक्रिया तेज करे। ऐसे में रक्षा सहयोग बढ़ने के बावजूद राजनीतिक और ऐतिहासिक मुद्दे अब भी संवेदनशील बने हुए हैं।
क्या पोलैंड को यूरोप में उसकी नई ताकत के मुताबिक सम्मान मिल रहा है?
यूरोप की सुरक्षा व्यवस्था में पोलैंड की भूमिका लगातार बढ़ी है, लेकिन वारसॉ का मानना है कि उसे अभी भी पश्चिमी यूरोपीय देशों के बराबर महत्व नहीं मिलता। हाल ही में लंदन में जर्मनी, फ्रांस और ब्रिटेन ने यूक्रेन के राष्ट्रपति वोलोदिमिर जेलेंस्की के साथ बैठक की, जिसमें पोलैंड शामिल नहीं था। इसके बाद प्रधानमंत्री डोनाल्ड टस्क ने कहा कि हमारी भागीदारी के बिना किए गए किसी भी इंतजाम को हम स्वीकार नहीं करेंगे और न ही उसे अपने लिए बाध्यकारी मानेंगे। जर्मनी के पूर्व राजदूत और जर्मन काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस के उपाध्यक्ष रोल्फ निकेल ने कहा कि आज पोलैंड की भूमिका और महत्व यूरोप तथा नाटो में बढ़ गया है। इसलिए पोलैंड को अधिक गंभीरता से लिया जाना चाहिए और पहले की तुलना में अधिक सम्मान दिया जाना चाहिए। जस्टीना गोटकोव्स्का ने भी कहा कि पिछले कुछ वर्षों में यूरोप में शक्ति संतुलन बदल गया है। जर्मनी की अर्थव्यवस्था ठहरी हुई है, जबकि पोलैंड की अर्थव्यवस्था और सैन्य क्षमता दोनों मजबूत हुई हैं। यही बदलाव जर्मनी और पोलैंड के नए रक्षा समझौते की सबसे बड़ी पृष्ठभूमि माना जा रहा है।