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West Asia Conflict: होर्मुज एक महीने से बंद, 1970 के दशक से भी बड़े ऊर्जा संकट के मुहाने पर पहुंची दुनिया

अमर उजाला नेटवर्क, लंदन Published by: Devesh Tripathi Updated Wed, 01 Apr 2026 05:20 AM IST
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सार

आईईए के प्रमुख फातिह बिरोल ने इस स्थिति को इतिहास का सबसे बड़ा वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा खतरा बताया है। उनके अनुसार यह संकट न केवल 1970 के दशक के तेल झटकों से बड़ा है, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद आए गैस संकट से भी अधिक गंभीर है।

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सांकेतिक तस्वीर - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार

ईरान में जारी युद्ध के बीच वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति धुरी होर्मुज स्ट्रेट के एक माह से रुकने से दुनिया संभावित बड़े ऊर्जा संकट पर आ गई है। शिपिंग विशेषज्ञ लार्स जेन्सेन व अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) के प्रमुख फातिह बिरोल ने चेताया कि मौजूदा हालात 1970 के दशक के तेल संकट से भी बड़े आर्थिक जोखिम में बदल सकते हैं। हालांकि कुछ विशेषज्ञ मानते हैं कि आज की वैश्विक अर्थव्यवस्था कुछ लचीली है।
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बीबीसी की रिपोर्ट के अनुसार 1970 के दशक का तेल संकट आज की स्थिति से मूल रूप से अलग था, क्योंकि वह सोची-समझी राजनीतिक रणनीति का नतीजा था। क्रिस्टोल एनर्जी की सीईओ डॉ. कैरल नाखले ने कहा, अक्तूबर 1973 में अरब तेल उत्पादक देशों ने योम किप्पुर युद्ध के दौरान इस्राइल समर्थक अमेरिका और सहयोगी देशों के विरुद्ध तेल निर्यात पर प्रतिबंध लगा दिया था।
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ऊर्जा सुरक्षा पर ऐतिहासिक दबाव
आईईए के प्रमुख फातिह बिरोल ने इस स्थिति को इतिहास का सबसे बड़ा वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा खतरा बताया है। उनके अनुसार यह संकट न केवल 1970 के दशक के तेल झटकों से बड़ा है, बल्कि रूस-यूक्रेन युद्ध के बाद आए गैस संकट से भी अधिक गंभीर है। कुल मिलाकर दुनिया एक ऐसे मोड़ पर खड़ी है जहां एक ओर 1970 के दशक जैसी अराजकता की आशंका है तो दूसरी ओर आधुनिक आर्थिक संरचना और ऊर्जा प्रबंधन तंत्र इसे झेलने की क्षमता भी रखते हैं। आने वाले महीनों में यह स्पष्ट होगा कि यह संकट इतिहास का सबसे बड़ा ऊर्जा झटका साबित होता है या नहीं।

तेल-गैस आपूर्ति पर सीधा असर
पिछले एक महीने से होर्मुज जलडमरूमध्य, जो वैश्विक तेल आपूर्ति का प्रमुख मार्ग है, प्रभावी रूप से बंद है। इस मार्ग से सामान्यतः दुनिया के लगभग 20% तेल का निर्यात होता है, जिससे तेल, गैस और अन्य आवश्यक वस्तुओं की आपूर्ति बाधित हो गई है।

शिपिंग विशेषज्ञ और वेस्पुच्ची मैरीटाइम के प्रमुख लार्स जेन्सेन के अनुसार, एक माह पूर्व खाड़ी से निकला तेल अभी दुनिया की रिफाइनरियों तक पहुंच ही रहा है, लेकिन यह आपूर्ति जल्द ही रुकने वाली है। यदि स्ट्रेट तुरंत खुल भी जाए तब भी अगले 6 से 12 महीनों तक ऊर्जा की कीमतों में भारी उछाल बना रहेगा और आपूर्ति संकट गहराएगा।

डॉ. कैरल नाखले का मानना है कि मौजूदा स्थिति गंभीर जरूर है, लेकिन 1970 के दशक जितनी भयावह नहीं है। उनके अनुसार आज का वैश्विक तेल बाजार अधिक विविधतापूर्ण है, तेल पर निर्भरता कम हुई है और आपातकालीन भंडार तथा प्रतिक्रिया तंत्र पहले से कहीं बेहतर हैं, जिससे झटकों को सहने की क्षमता बढ़ी है। डॉ. टियार्नान हीनी भी मानते हैं कि आज देशों के पास बेहतर आर्थिक समझ और रणनीतिक तेल भंडार मौजूद हैं, जो संकट के प्रभाव को कुछ हद तक कम कर सकते हैं।

हालात जल्द न सुधरे तो गहरी आर्थिक मंदी का खतरा
हेरेरो के अनुसार यदि स्थिति जल्द नहीं सुधरी तो तेल और गैस की कीमतों में तेज उछाल, व्यापक महंगाई और गहरी आर्थिक मंदी का खतरा बढ़ सकता है, खासकर एशिया के उन देशों के लिए जो आयात पर निर्भर हैं। हालांकि, वे यह भी मानती हैं कि आज के बेहतर भंडार और ऊर्जा दक्षता कुछ राहत जरूर देते हैं, लेकिन आपूर्ति में इतनी बड़ी कमी के कारण संकट अधिक जटिल और दीर्घकालिक हो सकता है।

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