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आतंक का पनाहगाह पाकिस्तान ऐसे बना US-ईरान समझौते का जरिया: ट्रंप को दिए लालच, अर्थव्यवस्था सौंपने को भी तैयार

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Thu, 09 Apr 2026 01:24 PM IST
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सार

अमेरिका और ईरान की जंग रुकवाने में पाकिस्तान की भूमिका मध्यस्थ से ज्यादा एक संदेशवाहक की रही है। अमेरिकी रिपोर्ट्स में भी यह सामने आया है कि राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने ईरान के साथ संघर्ष को कुछ समय तक रोकने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल किया। अब इस्लामाबाद में ही 10 अप्रैल से अमेरिका-ईरान के बीच शांति वार्ता होगी, जिसमें युद्ध विराम को आगे बढ़ाने या संघर्ष को पूरी तरह रुकवाने पर चर्चा होनी है। 

How Pakistan Led to US Iran Ceasefire with Crypto Deals with Donald Trump Family Rare Earth Nobel Peace Prize
अमेरिका-ईरान के बीच युद्ध विराम में ऐसे आगे आया पाकिस्तान। - फोटो : अमर उजाला/AI
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विस्तार

ईरान और अमेरिका के बीच बीते एक महीने से ज्यादा समय से जारी युद्ध कुछ दिन के लिए टल गया है। दोनों देशों के बीच हुए इस युद्ध विराम में पाकिस्तान, तुर्किये और मिस्र ने भी भूमिका निभाई है। अब आगे के समझौते के लिए ईरान और अमेरिका इस्लामाबाद में मिलेंगे। 
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भले ही पाकिस्तान ने इस संघर्ष को रुकवाने के लिए लगातार ट्रंप प्रशासन और ईरानी शासन के बीच संदेशों का आदान-प्रदान किया, लेकिन यह युद्ध विराम भी सिर्फ अस्थायी ही है और दो हफ्तों के लिए तय किया गया है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की तरफ से पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ और उसके फील्ड मार्शल आसिम मुनीर के जिक्र के बाद कई तरह की चिंताएं जताई जा रही हैं।
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विश्लेषकों की तरफ से यह चिंता जताई गई है कि आखिर कैसे लंबे समय तक अपनी आतंकी गतिविधियों और आतंकवादियों के सुरक्षित पनाहगाह बने रहने की वजह से अलग-थलग हुआ पाकिस्तान अब अंतरराष्ट्रीय मंच पर दो देशों के बीच युद्ध विराम के लिए बातचीत का जरिया बन रहा है? वह भी तब जब इस युद्ध के बीच खुद पाकिस्तान ने अफगानिस्तान में तालिबान पर हमलों के नाम पर वहां आम लोगों को निशाना बनाया है। आखिर डोनाल्ड ट्रंप के दूसरी बार शासन में आने के बाद से ऐसा क्या-क्या हुआ है, जो पाकिस्तान के लिए फायदेमंद बन गया? आइये जानते हैं...

ट्रंप के फिर शासन में आने के बाद कैसे बढ़े अमेरिका-पाकिस्तान के रिश्ते?

बीते करीब डेढ़ दशक से पाकिस्तान की बढ़ती आतंकी गतिविधियों और उसके आतंकियों के पनाहगाह बनने की वजह से यह देश लगातार वैश्विक परिदृश्य में अलग-थलग पड़ा था। खासकर अमेरिका में राष्ट्रपति बराक ओबामा के कार्यकाल से लेकर डोनाल्ड ट्रंप के पहले कार्यकाल और फिर जो बाइडन के नेतृत्व वाली सरकार में भी पाकिस्तान हाशिए पर ही रहा। हालांकि, ट्रंप के दूसरे कार्यकाल में अमेरिका और पाकिस्तान के संबंधों में एक बड़ा और आश्चर्यजनक बदलाव देखने को मिला है। बताया जाता है कि रिश्तों में आई इस अप्रत्याशित गर्माहट के पीछे पाकिस्तान की कूटनीति, भारी लॉबिंग और ट्रंप के साथ किए गए व्यापारिक सौदों का बड़ा हाथ रहा है।

1. वॉशिंगटन में भारी लॉबिंग और ट्रंप के करीबियों की नियुक्ति
डोनाल्ड ट्रंप के अमेरिका की सत्ता में आने के बाद से पाकिस्तान ने अमेरिकी नीतियों को अपने पक्ष में करने के लिए करोड़ों डॉलर खर्च किए हैं। अप्रैल-मई 2025 के बीच वॉशिंगटन में लॉबिंग पर पाकिस्तान ने भारत के मुकाबले तीन गुना अधिक पैसा खर्च किया। पाकिस्तान ने अपनी लॉबिंग के लिए ट्रंप के पूर्व बॉडीगार्ड कीथ शिलर और ट्रंप ऑर्गनाइजेशन के पूर्व अधिकारी जॉर्ज सोरियल जैसी ट्रंप की बेहद करीबी हस्तियों को काम पर रखा।

2. व्यक्तिगत चापलूसी और नोबेल पुरस्कार का नामांकन 
पाकिस्तान के सैन्य प्रमुख असीम मुनीर ने ट्रंप को खुश करने के लिए उनकी जमकर प्रशंसा की कूटनीति अपनाई। मई 2025 में भारत-पाकिस्तान के बीच हुए सैन्य संघर्ष को रोकने का पूरा श्रेय ट्रंप को दिया गया और पाकिस्तान ने उन्हें वैश्विक शांतिदूत बताते हुए नोबेल शांति पुरस्कार के लिए नामित कर दिया। इसके जवाब में ट्रंप ने भी मुनीर को एक महान व्यक्ति कहना शुरू कर दिया। जून 2025 में ट्रंप ने व्हाइट हाउस में मुनीर के साथ एक विशेष निजी लंच भी किया, जो पाकिस्तानी कूटनीति के लिए अहम पड़ाव रही। बताया जाता है कि इस लंच से ठीक पहले डोनाल्ड ट्रंप कनाडा में जी20 सम्मेलन में हिस्सा लेने पहुंचे थे। यहां उन्होंने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को भी भारत लौटने से पहले व्हाइट हाउस आने का न्योता दिया था। हालांकि, पीएम मोदी ने इस आमंत्रण को ठुकराते हुए अपने पूर्व के कार्यक्रम को महत्व देने की बात कही। 

3. ट्रंप परिवार के साथ व्यापारिक और क्रिप्टो सौदे
कूटनीति के साथ-साथ पाकिस्तान ने ट्रंप को लुभाने के लिए बड़े व्यापारिक प्रस्ताव भी दिए। पाकिस्तान ने ट्रंप परिवार की क्रिप्टो कंपनी- वर्ल्ड लिबर्टी फाइनेंशियल के साथ साझेदारी की पेशकश की और अमेरिका के सामने 50 करोड़ डॉलर का अहम खनिजों के खनन का समझौता पेश किया। इसके अलावा, पाकिस्तान ने न्यूयॉर्क में अपने बंद पड़े रूजवेल्ट होटल को फिर से विकसित करने का सौदा भी ट्रंप के एक करीबी स्टीव विटकॉफ के साथ किया।

*व्हाइट हाउस में डोनाल्ड ट्रंप के साथ पाकिस्तान के फील्ड मार्शल आसिम मुनीर और प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ
 

4. अपने कृषि क्षेत्र को कुर्बान करने में भी गुरेज नहीं
इस लॉबिंग और कूटनीतिक प्रयासों का सीधा आर्थिक फायदा पाकिस्तान को मिला। ट्रंप प्रशासन ने पाकिस्तानी सामानों पर लगने वाले टैरिफ को घटाकर 19% कर दिया, जो प्रमुख एशियाई अर्थव्यवस्थाओं में सबसे कम दरों में से एक है, जबकि इसके ठीक उलट भारत के टैरिफ को बढ़ाकर 50% कर दिया गया। पाकिस्तान ने इसके बदले अमेरिकी कृषि उत्पादों के लिए अपने बाजार भी खोल दिए।

5. अपने ही पाले आतंकियों को सौंपकर नजर में आया
अमेरिका की नजर में पाकिस्तान की अहमियत तब और बढ़ गई जब पाकिस्तान ने 2021 के काबुल एयरपोर्ट (एबी गेट) हमले के एक कथित साजिशकर्ता (आईएसआईएस आतंकी) को पकड़कर अमेरिका को सौंप दिया। ट्रंप ने इसके लिए कांग्रेस में खुले तौर पर पाकिस्तान को धन्यवाद दिया। 

दूसरी तरफ इसी पाकिस्तान में 2011 में ओसामा बिन-लादेन छिपा हुआ था। जिसे अमेरिकी सैनिकों ने पाकिस्तान में घुसकर मारा था।  इसके अलावा लश्कर-ए-तैयबा का संस्थापक हाफिज सईद, जो कि अमेरिका-संयुक्त राष्ट्र की तरफ से घोषित आतंकी है, वह भी पाकिस्तान में ही छिपा हुआ है। इसी तरह हिज्बुल मुजाहिद्दीन का सैयद सलाउद्दीन, डी-गैंग का सरगना दाऊद इब्राहिम, और अन्य कई नाम, जिन्हें अमेरिका वांछित आतंकी घोषित कर चुका है, वह भी लगातार पाकिस्तान में छिपे हैं, लेकिन ट्रंप ने इसे पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया है।

 

क्या अमेरिकी फायदे के लिए पाकिस्तान फिर मोहरा बना? 

अमेरिका ऐतिहासिक रूप से और वर्तमान समय में भी अपने भू-राजनीतिक और सुरक्षा लक्ष्यों को हासिल करने के लिए पाकिस्तान का इस्तेमाल करता रहा है। 

1980 का दशक: अमेरिका ने अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ लड़ने वाले मुजाहिदीन को पैसे और हथियार मुहैया कराने के लिए पाकिस्तान का भरपूर इस्तेमाल किया था।

9/11 के बाद का युद्ध: 2001 के हमलों के बाद 'आतंकवाद के खिलाफ युद्ध' के नाम पर भी अमेरिका ने पाकिस्तान को अपना एक प्रमुख गैर-नाटो सहयोगी बनाकर अफगानिस्तान में अपने ऑपरेशन्स के लिए उसका इस्तेमाल किया। हालांकि, बाद में ओसामा बिन-लादेन का पनाहगार पाकिस्तान ही निकला था।

और अब ट्रंप का दौर: हाल ही में खबर आई कि अमेरिका-ईरान के बीच जो युद्ध विराम हुआ, इसमें पाकिस्तान से ज्यादा खुद ट्रंप प्रशासन की भूमिका रही। द फाइनेंशियल टाइम्स और न्यूयॉर्क टाइम्स की रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप पश्चिम एशिया में चल रहे युद्ध से छुटकारा पाना चाहते थे। इसलिए उन्होंने पाकिस्तान पर ईरान को युद्धविराम के लिए मनाने का दबाव बनाया। 

बाद में जब ईरान ने अमेरिका की 15-सूत्रीय शर्तों को मानने से इनकार कर दिया, तो ट्रंप ने ईरान की 10-सूत्रीय मांगों पर ही विचार करने की हामी भर दी। रिपोर्ट के मुताबिक, इसे लेकर पाकिस्तान को युद्ध विराम से जुड़ा एक संदेश भेजा गया, जिसे व्हाइट हाउस से मंजूरी मिली थी। इसी युद्ध विराम के संदेश को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने जस का तस कॉपी-पेस्ट कर दिया, जिससे यह खुलासा हो गया कि युद्ध विराम का संदेश उन्हें किसी और जरिए से आया था। 

Draft' tag in Pakistan PM Sharif's X post to Trump: Was it written by  someone else? – Firstpost
* शहबाज शरीफ का एक्स पर कॉपी-पेस्ट पोस्ट
 

क्या सिर्फ अमेरिका ने पाकिस्तान का इस्तेमाल किया?

विशेषज्ञों का मानना है कि यह रिश्ता केवल एकतरफा नहीं है। मौजूदा परिदृश्य में, पाकिस्तान का सैन्य नेतृत्व भी अपने निजी और घरेलू फायदों के लिए अमेरिका (खासकर ट्रंप प्रशासन) का बहुत चालाकी से इस्तेमाल कर रहा है।

हाल ही में पाकिस्तानी सेना प्रमुख असीम मुनीर ने भारी लॉबिंग और कुछ समझौतों के जरिए डोनाल्ड ट्रंप से रिश्ते मजबूत किए और अपने लिए ट्रंप का समर्थन हासिल किया। इस अमेरिकी समर्थन का फायदा उठाकर मुनीर ने पाकिस्तान में 27वां संवैधानिक संशोधन पारित करवा लिया है, जिसने उन्हें चीफ ऑफ डिफेंस फोर्सेज के तौर पर निरंकुश शक्तियां और जीवन भर के लिए कानूनी छूट दे दी है। अमेरिका ने पाकिस्तान के इस संवैधानिक तख्तापलट पर पूरी तरह से चुप्पी साधी हुई है।

इसके अलावा पाकिस्तान अपनी आर्थिक स्थिति को सुधारने के लिए भी अमेरिका के साथ रिश्तों को तवज्जो देने की कोशिश में जुटा है। इसके जरिए वह एफएटीएफ की आतंकी देशों की सूची में जाने से बचने की कोशिश कर रहा है। साथ ही लगातार अलग-थलग होने की वजह से हुए नुकसानों को ट्रंप के जरिए कम करने की कोशिश में भी लगा है। 

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