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पश्चिम एशिया संघर्ष: कैसे अमेरिका-इस्राइल के खिलाफ जंग में महीनेभर से खड़ा है ईरान, रूस-चीन की क्या भूमिका?

स्पेशल डेस्क, अमर उजाला Published by: Kirtivardhan Mishra Updated Sun, 29 Mar 2026 05:37 PM IST
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सार
पश्चिम एशिया में संघर्ष को अब एक महीना पूरा हो चुका है। इस बीच अमेरिका और इस्राइल ने ईरान पर ताबड़तोड़ हमले किए हैं। लेकिन उनके संयुक्त अभियान के बावजूद तेहरान ने अब तक युद्ध में न सिर्फ अपना बचाव किया है, बल्कि पलटवार भी किए हैं। ईरान की इस रणनीति में रूस और चीन ने भी अहम भूमिका निभाई है। जहां रूस ने ईरान को जरूरी खुफिया जानकारी दी है, तो वहीं चीन ने ईरान को तकनीकी और आपूर्ति शृंखला से जुड़ी मदद पहुंचाई है। 
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How Russia China helping Iran in West Asia War with US Israel month of Conflict Donald Trump Strait of Hormuz
ईरान युद्ध। - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

अमेरिका-इस्राइल की तरफ से ईरान के खिलाफ शुरू किए गए युद्ध को अब चार हफ्ते हो गए हैं। जहां पहले अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप दावा कर रहे थे कि अमेरिकी सेना की ताकत के आगे ईरान नहीं टिक पाएगा और यह युद्ध एक हफ्ते या कुछ और दिनों में खत्म हो जाएगा, तो वहीं संघर्ष के तीसरे हफ्ते तक उन्होंने अमेरिका को इस जंग में जीता भी घोषित कर दिया। हालांकि, अब कुछ रिपोर्ट्स में दावा किया जा रहा है कि ट्रंप ने रक्षा मंत्रालय के अपने शीर्ष अधिकारियों से साफ कर दिया है कि इस युद्ध को जितना जल्दी हो सके, खत्म करने का रास्ता देखना चाहिए। 


जहां अमेरिकी राष्ट्रपति के बदलते बयानों को लेकर दुनियाभर में यह चर्चाएं हैं कि अमेरिका का इस संघर्ष में लक्ष्य तय नहीं था, तो वहीं विश्लेषकों ने ईरान की सैन्य क्षमताओं और अमेरिका-इस्राइल जैसे दो शक्तिशाली देशों के खिलाफ खड़े रहने की क्षमताओं पर भी चर्चा की है। 


आइये जानते हैं कि ईरान किस तरह अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियानों के खिलाफ संघर्ष में बीते चार हफ्तों से टिका हुआ है? क्यों ट्रंप के ईरान को नेस्तनाबूत कर देने जैसे दावों के बावजूद अमेरिका अब तक अपने लक्ष्यों में सफल नहीं हो सका है? इस संघर्ष में किस तरह रूस और चीन ने ईरान को मदद पहुंचाई है? आइये जानते हैं...

कैसे अमेरिका और इस्राइल के सैन्य अभियानों के खिलाफ टिका है ईरान?

1. दोहरी सैन्य संरचना

पश्चिम एशिया मामलों के खुफिया विशेषज्ञ डैनी सिट्रिनोविट्ज ने अमेरिकी मीडिया ग्रुप फॉक्स न्यूज को बताया कि ईरान की सेना को जानबूझकर दो हिस्सों में बांटा गया है, ताकि वह अलग-अलग स्तरों पर काम कर के ईरान की सैन्य व्यवस्था को किसी भी संकट से निकाल सके। 

उन्होंने बताया कि ईरान के पास एक पारंपरिक सैन्य बल- आर्तेश हैं, जो कि देश की सीमाओं की दुश्मनों से सुरक्षा के लिए बनाए गए हैं। वहीं, दूसरा हिस्सा इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) है जो कि सैन्य बलों का सबसे शक्तिशाली और वैचारिक हिस्सा है। इसे मुख्य तौर पर ईरानी शासन की रक्षा के लिए तैयार किया गया है। इसके पास पारंपरिक सेना से बेहतर बजट व हथियार हैं। डैनी ने कहा कि ईरानी जमीनी सेना ने अब तक सीधे युद्ध में शामिल होने से परहेज किया है, जिससे उनके सैनिक काफी हद तक सुरक्षित और ताकतवर बने हुए हैं।
 

2. मिसाइल और ड्रोन की विशाल क्षमता

मिसाइल कार्यक्रम ईरानी सैन्य शक्ति की रीढ़ है। यूं तो अमेरिका का दावा है कि युद्ध के दौरान ईरान की मिसाइल लॉन्च करने की क्षमता में 80% से अधिक की गिरावट आई है, फिर भी उनके पास अभी भी लगभग एक तिहाई क्षमता बची हुई है। यह बची हुई क्षमता पूरे क्षेत्र में कई हफ्तों तक हमले जारी रखने के लिए पर्याप्त है। अमेरिकन एंटरप्राइज इंस्टीट्यूट के विश्लेषक निकोलस कार्ल के मुताबिक, वर्तमान स्थिति एक मिली-जुली तस्वीर पेश करती है। एक तरफ ईरान की सैन्य क्षमता काफी हद तक कमजोर हो गई है, लेकिन शासन के पास अभी भी (हमले करने की) ताकत बची हुई है।"
 

3. दुश्मन की मुश्किलें बढ़ाने की रणनीति

डैनी सिट्रिनोविट्ज के मुताबिक, ईरान की नौसेना बड़े युद्धपोतों पर निर्भर नहीं है। इसके बजाय, वे होर्मुज जलडमरूमध्य में वैश्विक व्यापार को बाधित करने के लिए स्पीडबोट, ड्रोन, समुद्री खदानों और सतह से समुद्र में मार करने वाली मिसाइलों का इस्तेमाल करते हैं। इससे वे बड़ी नौसेना के बिना भी समुद्री रास्ते को रोक सकते हैं। निकोलस कार्ल का कहना है कि यह कहना तकनीकी रूप से सही नहीं है कि ईरान ने होर्मुज जलडमरूमध्य को पूरी तरह बंद कर दिया है। इसके बजाय ईरान चुनिंदा रूप से पहुंच को रोक रहा है। वह कुछ जहाजों पर फायरिंग कर रहा है जबकि अन्य को गुजरने दे रहा है।" अपने इन कदमों के जरिए ईरान जहां अपने मित्र देशों को सुरक्षित रास्ता दे रहा है, वहीं अमेरिका और उसके सहयोगियों के लिए मुश्किलें बढ़ा रहा है, जो कि ट्रंप पर अप्रत्यक्ष तौर पर दबाव बना रहे हैं। 



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4. अपने प्रॉक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल

ईरान अपनी सीमाओं के बाहर युद्ध लड़ने और अपनी पहुंच बढ़ाने के लिए प्रॉक्सी नेटवर्क का इस्तेमाल कर रहा है। आईआरजीसी की विशेष कुद्स फोर्स ने हिजबुल्ला, हमास और हूती जैसे गुटों को नेतृत्व, हथियार, खुफिया जानकारी और धन मुहैया कराना जारी रखा है, जिससे वह अमेरिका की किसी भी बड़ी कार्रवाई के जवाब में पूरे पश्चिम एशिया को लंबे युद्ध में घसीट सकता है।

निकोलस कार्ल के मुताबिक, ईरान के प्रॉक्सी नेटवर्क को एक्सिस ऑफ रेजिस्टेंस कहा जाता है और यह वो केंद्रीय तंत्र है जिसके जरिए ईरान संघर्ष को क्षेत्रीय स्तर पर फैला सकता है। और ज्यादा से ज्यादा विरोधियों के हितों को खतरे में डाल सकता है।"


5. जीतने के लिए नहीं, खड़े रहने की नीति

विश्लेषकों के मुताबिक, ईरान की सेना को अमेरिका या इस्राइल जैसे देश के खिलाफ पारंपरिक युद्ध जीतने के लिए नहीं, बल्कि हमलों को झेलने, लचीले बने रहने और लंबे समय तक युद्ध जारी रखने के हिसाब से तैयार किया गया है। इसका असर यह हुआ है कि ईरान के पास भले ही हथियार लगातार कम हुए हैं, लेकिन उसने अमेरिका-इस्राइल के हमलों का बराबरी से जवाब देने के बजाय चुनिंदा तरह से हमले जारी रखे हैं।

क्यों अमेरिका अब तक ईरान के खिलाफ नहीं जीत पाया?

विश्लेषकों के मुताबिक, अमेरिका की कुछ नीतियों में असंगतता और आर्थिक प्रतिबंधों को लागू करने में दी गई ढील ने भी ईरान और उसके सहयोगियों खासकर चीन और रूस के आपूर्ति तंत्र को मजबूत होने का मौका दिया है। 


1. होर्मुज जलडमरूमध्य की नाकाबंदी 

ईरान की सबसे प्रभावी कूटनीतिक और रणनीतिक चाल होर्मुज जलडमरूमध्य को प्रभावी रूप से बंद करने की रही है। इस रास्ते से दुनिया की 20% तेल आपूर्ति होती है। इसे बंद करने से वैश्विक स्तर पर तेल की कीमतें आसमान छूने लगी हैं, जिससे वैश्विक आर्थिक मंदी का खतरा पैदा हो गया है और अमेरिका पर घरेलू और अंतरराष्ट्रीय दबाव बढ़ गया है। 

2. तेल प्रतिबंधों में ढील से ईरान को फायदा

अमेरिका और इस्राइल की तरफ से तेज होते हमलों के बाद ईरान ने युद्ध के पांचवें दिन ही होर्मुज जलडमरूमध्य को नियंत्रित करना शुरू कर दिया और दुनियाभर के व्यापार को बाधित कर दिया। इसकी वजह से ऊर्जा की कीमतें तेजी से बढ़ी हैं। इस आर्थिक दबाव बढ़ती तेल कीमतों को कम करने के लिए, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूसी तेल के शिपमेंट पर से प्रतिबंधों को अस्थायी रूप से निलंबित करना पड़ा और ईरान पर भी लगे तेल प्रतिबंधों में ढील देनी पड़ी है। इससे ईरानी अर्थव्यवस्था को एक बार फिर युद्ध से जुड़ी रकम जुटाने में मदद मिली है, जिससे उन्हें युद्ध जारी रखने के लिए पैसा मिल रहा है।

इसका एक फायदा यह भी हुआ है कि ईरान से अब उन देशों को तेल खरीदने का मौका मिल रहा है, जो कि अमेरिकी प्रतिबंधों की वजह से पहले उससे तेल-गैस नहीं खरीद पा रहे थे। विश्लेषकों का मानना है कि अगर अमेरिका इस संघर्ष को और लंबा खींचता है तो ईरान इन देशों के साथ या तो मजबूत रिश्ते बना सकता है या कम से कम इन देशों से आर्थिक लाभ पा सकता है।

3. ईरान के खिलाफ लक्ष्य न तय होने का अमेरिका को नुकसान

  • शुरुआत में ट्रंप ने ईरान में इस्लामी शासन में परिवर्तन यानी तख्तापलट का समर्थन करते हुए ईरानी जनता से अपनी सरकार को उखाड़ फेंकने का आह्वान किया, लेकिन बाद में उन्होंने अपना यह रुख नरम कर दिया। 
  • उनके मुख्य सैन्य उद्देश्यों में ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमताओं को पूरी तरह खत्म करना, उसकी नौसेना को तबाह करना और उसे परमाणु हथियार हासिल करने से रोकना शामिल रहा है। 
  • इसके साथ ही ट्रंप ने स्पष्ट किया कि ईरान के साथ 'बिना शर्त आत्मसमर्पण' के अलावा कोई समझौता नहीं करेंगे। हालांकि, इन सभी मकसद को पूरा कर पाने की ट्रंप की नीतियां अब तक असफल रही हैं।

4. लगातार जवाबी हमले

हफ्तों के हवाई हमलों के बाद भी ईरान शांत नहीं बैठा है। उसने इस्राइल और खाड़ी देशों पर बड़े पैमाने पर जवाबी हमले किए हैं। ईरान ने खाड़ी देशों में अमेरिकी संपत्तियों और ऊर्जा सुविधाओं को निशाना बनाते हुए सैकड़ों मिसाइलें और ड्रोन दागे हैं। अलजजीरा से बातचीत में विश्लेषकों के एक पैनल ने कहा कि ट्रंप प्रशासन ने युद्ध में जाने से पहले ईरान की ताकत और क्षमताओं पर ठीक से विचार नहीं किया। विशेषज्ञों के अनुसार, अमेरिका ने बिना किसी स्पष्ट लक्ष्य के युद्ध शुरू कर दिया और इस बात का पूरी तरह से गलत अनुमान लगाया कि तेहरान अमेरिकी हमलों पर कैसी प्रतिक्रिया देगा। तैयारी में यह चूक उन पर भारी पड़ी है।

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ईरान-अमेरिका युद्ध में रूस-चीन की क्या भूमिका?

विशेषज्ञों और खुफिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, रूस और चीन सीधे तौर पर पश्चिम एशिया में जारी युद्ध में दखल नहीं दे रहे हैं। हालांकि, वे एक्सिस ऑफ इवेजन यानी बचाव की धुरी का हिस्सा बनकर ईरान को अहम खुफिया जानकारी, तकनीकी पुर्जे और आपूर्ति श्रृंखला प्रदान कर रहे हैं। 

1. रूस की भूमिका 

खुफिया जानकारी और टारगेटिंग: यूरोपीय संघ (ईयू) की शीर्ष राजनयिक काजा कैलास ने पुष्टि की है कि रूस ने युद्ध के दौरान ईरान को खुफिया जानकारी देना जारी रखा है, ताकि वह अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बना सके और अमेरिकी सैनिकों को मार सके। रूस अपने लियाना जासूसी उपग्रहों के जरिए अमेरिकी युद्धपोतों (कैरियर स्ट्राइक ग्रुप्स) और विमानों की सटीक स्थिति ईरान को मुहैया करा रहा है। इतना ही नहीं वह ईरान की तरफ दागी गई मिसाइलों के हमलों को लेकर भी उसे पूर्व अलर्ट जारी कर रहा है, जिससे ईरानी सेना को कम से कम नुकसान हो रहा है। 

हथियार, ड्रोन और प्रशिक्षण: यूरोपीय खुफिया एजेंसियों के मुताबिक, रूस ईरान को विस्फोटक ड्रोनों, भोजन और दवाओं की खेप भेजने के अंतिम चरण में है। इसके अलावा, रूस ईरानी ड्रोनों को 'कोमेटा-बी' जैसे एंटी-जैमिंग नेविगेशन शील्ड से अपग्रेड कर रहा है और हवाई सुरक्षा को भेदने (चकमा देने) की रणनीतियां भी ईरान के साथ साझा कर रहा है। रूस ने ईरान को कई सारे असली और नकली ड्रोन एक साथ भेजकर दुश्मन के हवाई रक्षा तंत्र को थकाने की रणनीति भी सिखा रहा है, जिसे रूस ने यूक्रेन युद्ध में इस्तेमाल किया है। ब्रिटिश रक्षा सचिव जॉन हीली के अनुसार, युद्ध शुरू होने से पहले रूस ने ईरानी बलों को प्रशिक्षण भी दिया था। 



रूस की मंशा: विश्लेषकों का मानना है कि रूस की मदद ईरान को युद्ध जिताने के लिए नहीं, बल्कि एक सद्भावना का संकेत है। रूसी राष्ट्रपति पुतिन को उम्मीद है कि पश्चिम एशिया का यह युद्ध यूक्रेन से पश्चिमी देशों का ध्यान भटकाएगा, और युद्ध के कारण बढ़ रही कच्चे तेल की कीमतों से रूस को आर्थिक फायदा होगा।

2. चीन की भूमिका

तकनीक और हथियारों के पुर्जों की सप्लाई: अमेरिकी थिंक टैंक अटलांटिक काउंसिल की रिपोर्ट के मुताबिक, चीन ईरान को ड्रोन, एंटी-शिप क्रूज मिसाइलों और सतह से हवा में मार करने वाली मिसाइलों के पुर्जे (जैसे सेमीकंडक्टर और बैटरी) लगातार मुहैया करा रहा है। चीनी अपने बिचौलियों के जरिए पश्चिम में इस्तेमाल होने वाली दोहरे उपयोग वाली तकनीक भी ईरान तक पहुंच रही है।

नैविगेशन में मदद: चीन ने ईरान को अपने बीडौ (BeiDou) सैटेलाइट नेविगेशन सिस्टम का एक्सेस दिया है। ईरान इसका इस्तेमाल दुश्मन को बहकाने, डिकॉय (नकली) सिग्नल पैदा करने, अपनी सैन्य गतिविधियों को छिपाने और खतरे के विश्लेषण को भ्रमित करने के लिए कर रहा है।

रॉकेट ईंधन के लिए रसायन: चीनी रासायनिक कंपनियां ईरान को मिसाइलों और विस्फोटकों के लिए जरूरी केमिकल प्रिकर्सर्स (ठोस रॉकेट ईंधन बनाने वाले रसायन) की आपूर्ति कर रही हैं, जिससे ईरान का मिसाइल उत्पादन जारी है।



तेल की खरीद भी जारी: चीन ने ईरान और रूस दोनों का प्रतिबंधित तेल खरीदकर उन्हें आर्थिक जीवनदान देना जारी रखा है। 

रूस और चीन के ईरान के लिए इस गठजोड़ को ब्रिटेन के रक्षा मंत्री ने आक्रामकता की धुरी कहा है। ये दोनों देश ईरान को युद्ध के झटके सहने, अपने हथियारों के भंडार को फिर से भरने और अमेरिका-इस्राइल के खिलाफ अपने हमलों को जारी रखने में सक्षम बना रहा है।

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