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क्यों युद्ध में भी सुरक्षित ईरान का 'काला खजाना'?: चीन से कनेक्शन, फिर भी इस्राइल-अमेरिका नहीं बना रहे निशाना
स्पेशल डेस्क, अमर उजाला
Published by: Kirtivardhan Mishra
Updated Tue, 10 Mar 2026 12:07 PM IST
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सार
यह खर्ग द्वीप क्या है, जिस पर अब तक युद्ध के दौरान एक बार भी हमला नहीं हुआ है? इस द्वीप का इतिहास क्या है? कैसे यह द्वीप ईरान की शक्ति का केंद्र बना हुआ है? इसका चीन से क्या कनेक्शन है? इस्राइल-अमेरिका की तरफ से इस पर हमला न करने की क्या वजह है? अगर इस द्वीप पर किसी तरह का वार किया जाता है तो इसका वैश्विक स्तर पर क्या असर हो सकता है? आइये जानते हैं...
खर्ग द्वीप पर तनाव।
- फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
इस्राइल-अमेरिका के ईरान से युद्ध को अब 10 दिन हो चुके हैं। जहां इस्राइल और अमेरिका ने ईरान में तेहरान से लेकर करमनशाह और कौम से लेकर बंदर अब्बास तक हमले बोले हैं तो वहीं ईरान ने भी पलटवार करते हुए पश्चिम एशिया में उन सभी देशों को निशाना बनाया है, जहां अमेरिकी सैन्य ठिकाने मौजूद हैं। हालांकि, इस बीच ईरान के एक खास द्वीप की चर्चाएं तेज हो गई हैं। दरअसल, ईरान के इस द्वीप पर अब तक न तो इस्राइल ने और न ही अमेरिका ने हमला किया है, जबकि कूटनीतिक तौर पर इस द्वीप को ईरान की रीढ़ माना जाता है। कुछ विश्लेषकों का तो यहां तक कहना है कि अगर पश्चिमी देश ईरान को घुटनों पर लाना चाहते हैं तो वे इस एक 'खास द्वीप' को निशाना बनाकर उसकी लाइफलाइन पर सीधा वार कर सकते हैं।
ईरान के जो द्वीप इस वक्त चर्चा में है, उसका नाम है 'खर्ग'। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस अहम द्वीप को अमेरिकी कब्जे में लेने की कोशिश कर सकते हैं। वह इसके लिए ईरान की धरती पर सेना भेजने पर भी विचार कर रहे हैं।
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ईरान के जो द्वीप इस वक्त चर्चा में है, उसका नाम है 'खर्ग'। रिपोर्ट्स के मुताबिक, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप इस अहम द्वीप को अमेरिकी कब्जे में लेने की कोशिश कर सकते हैं। वह इसके लिए ईरान की धरती पर सेना भेजने पर भी विचार कर रहे हैं।
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर यह खर्ग द्वीप क्या है, जिस पर अब तक युद्ध के दौरान एक बार भी हमला नहीं हुआ है? इस द्वीप का इतिहास क्या है? कैसे यह द्वीप ईरान की शक्ति का केंद्र बना हुआ है? इसका चीन से क्या कनेक्शन है? इस्राइल-अमेरिका की तरफ से इस पर हमला न करने की क्या वजह है? अगर इस द्वीप पर किसी तरह का वार किया जाता है तो इसका वैश्विक स्तर पर क्या असर हो सकता है? आइये जानते हैं...
क्या है खर्ग द्वीप, ये कहां स्थित है?
- खर्ग द्वीप एक छोटा प्रवाल (कोरल) द्वीप है, जो ईरान के कच्चे तेल उद्योग का सबसे बड़ा और मुख्य निर्यात टर्मिनल है।
- यह द्वीप ईरान की अर्थव्यवस्था के लिए रणनीतिक तौर पर अहम है। देश का करीब 90% कच्चे तेल का निर्यात इसी द्वीप से होता है।
- इसकी तेल लोडिंग क्षमता लगभग 70 लाख बैरल प्रतिदिन आंकी गई है। इसे ईरान की तेल की जीवनरेखा भी कहा जाता है।
- यह द्वीप समुद्र के नीचे बिछी पाइपलाइनों के जरिए दक्षिणी ईरान के प्रमुख तेल क्षेत्रों से जुड़ा हुआ है।
- यहां बड़े स्टोरेज टैंक और सुपरटैंकरों में तेल भरने के लिए गहरे पानी तक जाने वाली लंबी जेट्टी (मार्ग) बनी हुई हैं।
क्या है खर्ग द्वीप का इतिहास?
खर्ग द्वीप का इतिहास इसके तेल भंडारण के लिए इस्तेमाल होने से काफी पुराना है। दरअसल, यहां तेल की खोज से पहले मुख्यतः फारस की खाड़ी में व्यापार के लिए इस द्वीप को ट्रांजिट पॉइंट यानी आवाजाही के केंद्र की तह इस्तेमाल किया जाता था।प्राचीन और मध्यकाल: 10वीं शताब्दी के अंत तक इसे खाड़ी के व्यापार और मोती निकालनेके एक प्रमुख केंद्र के रूप में जाना जाता था। 17वीं शताब्दी के दौरान, यह बसरा, बंदर रिग और ईरान के अंदरूनी हिस्से को जोड़ने वाला एक अहम व्यापारिक पड़ाव बन गया था।
1960 और 1970 का दशक: खर्ग के लिए प्रमुख बदलावों का चरण 1960 के दशक में आया। यह वह दौर था, जब ईरान में ऑयल बूम यानी तेल का जबरदस्त उत्पादन शुरू हुआ। अमेरिका के समर्थन वाले पहलवी वंश के 'शाह' के शासनकाल में अमेरिकी तेल कंपनी एमोको ने इसे कच्चे तेल के मुख्य निर्यात टर्मिनल के रूप में विकसित किया।
बाद में फारस की खाड़ी और दक्षिणी ईरान के तेल क्षेत्रों को पाइपलाइनों के जरिए इस द्वीप से जोड़ा गया। 1970 के दशक की शुरुआत तक, इसके बुनियादी ढांचे के विकास ने इसे ईरान का सबसे बड़ा तेल लोडिंग टर्मिनल बना दिया था।
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1979 का संकट और अमेरिकी योजना: 1979 में ईरानी क्रांति के बाद जब अयातुल्ला खोमैनी के वफादार कट्टरपंथी छात्रों ने 52 अमेरिकी राजनयिकों को बंधक बना लिया, तब तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर के तहत एडमिरल जेम्स 'ऐस' लियोन ने ईरान के बंदरगाहों की नाकेबंदी करने और खर्ग द्वीप पर कब्जा करने की योजना का प्रस्ताव रखा था। उनका तर्क था कि ईरान का नया शासन तेल निर्यात पर रोक का जोखिम नहीं उठा सकता। हालांकि, संघर्ष बढ़ने के डर से राष्ट्रपति कार्टर ने इस योजना को खारिज कर दिया था।
1980 का दशक: 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक युद्ध के दौरान खर्ग द्वीप का रणनीतिक महत्व पूरी दुनिया के सामने आया। सद्दाम हुसैन की सेना ने ईरान की अर्थव्यवस्था को तबाह करने के इरादे से इस द्वीप के तेल बुनियादी ढांचे पर कई बार हवाई हमले किए। 1986 तक इन हमलों से टर्मिनल को बहुत भारी नुकसान पहुंचा था। हालांकि, इतनी बमबारी के बावजूद ईरान युद्ध के दौरान भी यहां से तेल का निर्यात जारी रखने में सफल रहा। युद्ध खत्म होने के बाद ईरान ने इस सुविधा की मरम्मत की और इसका विस्तार किया।
मौजूदा स्थिति: आज भी खर्ग द्वीप ईरान की तेल अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा बना हुआ है। यहां से देश के कच्चे तेल का लगभग 90% निर्यात होता है।
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1980 का दशक: 1980 के दशक में हुए ईरान-इराक युद्ध के दौरान खर्ग द्वीप का रणनीतिक महत्व पूरी दुनिया के सामने आया। सद्दाम हुसैन की सेना ने ईरान की अर्थव्यवस्था को तबाह करने के इरादे से इस द्वीप के तेल बुनियादी ढांचे पर कई बार हवाई हमले किए। 1986 तक इन हमलों से टर्मिनल को बहुत भारी नुकसान पहुंचा था। हालांकि, इतनी बमबारी के बावजूद ईरान युद्ध के दौरान भी यहां से तेल का निर्यात जारी रखने में सफल रहा। युद्ध खत्म होने के बाद ईरान ने इस सुविधा की मरम्मत की और इसका विस्तार किया।
मौजूदा स्थिति: आज भी खर्ग द्वीप ईरान की तेल अर्थव्यवस्था की जीवन रेखा बना हुआ है। यहां से देश के कच्चे तेल का लगभग 90% निर्यात होता है।
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कैसे यह द्वीप ईरान की शक्ति का केंद्र बना हुआ है?
खर्ग द्वीप सिर्फ ईरान की व्यापारिक शक्ति या तेल निर्यात के लिए ही अहम नहीं है, बल्कि यह ईरान की सेना के लिए भी एक मजबूत केंद्र है। पूर्व अमेरिकी उप-विशेष दूत रिचर्ड नेफ्यू के अनुसार, इसके बिना ईरान की अर्थव्यवस्था पूरी तरह से गर्त में चली जाएगी।
ईरान के लिए चीन को साथ लाने का जरिया भी रहा खर्ग
खर्ग से निर्यात होने वाले तेल का सबसे बड़ा खरीदार चीन है। अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद चीन को होने वाले इस तेल निर्यात से ईरान को न केवल भारी राजस्व मिलता है, बल्कि एक महाशक्ति के रूप में चीन का रणनीतिक साथ भी मिलता है। यह द्वीप चीन के लिए भी जबरदस्त रूप से अहम है, क्योंकि उसकी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने में इस द्वीप से होने वाला निर्यात सबसे अहम है।इस्राइल-अमेरिका की तरफ से खर्ग पर हमला न करने की क्या वजह?
ऐसा नहीं है कि इस्राइल और अमेरिका की तरफ से ईरान को खर्ग से काटने की योजना नहीं बनाई गई। हाल ही में इस्राइल में विपक्ष के नेता याइर लापिड ने खुले तौर पर मांग की है कि खर्ग द्वीप के सभी तेल क्षेत्रों और ऊर्जा उद्योग को नष्ट कर दिया जाना चाहिए, ताकि ईरान की अर्थव्यवस्था ढह जाए और शासन गिर जाए।दूसरी ओर मीडिया समूह ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट के मुताबिक, जब इस्राइल ने 2024 में हिजबुल्ला और हमास के कई नेताओं को मार गिराया था, तब ईरान ने इस्राइल पर मिसाइल हमला किया था। इसके बाद इस्राइल ने जवाबी कार्रवाई के रूप में खर्ग द्वीप पर हमला करने पर गंभीरता से विचार किया। हालांकि, बाद में उसने इस योजना को टाल दिया। बताया जाता है कि खर्ग द्वीप पर अब तक इस्राइल और अमेरिका की तरफ से हमला न करने की कई वजहें हैं...
वैश्विक तेल संकट और महंगाई बढ़ने का डर: खर्ग द्वीप पर हमले या इसके बंद होने से वैश्विक तेल आपूर्ति में भारी रुकावट आएगी। विशेषज्ञों के मुताबिक, इससे कच्चे तेल की कीमतें 150 डॉलर प्रति बैरल के पार जा सकती हैं। इससे पूरी दुनिया में भारी महंगाई का संकट पैदा होने का खतरा है। दरअसल, इसकी मुख्य वजह चीन होगा, जिसकी अधिकतर ऊर्जा जरूरतें ईरान से पूरी हो जाती हैं। हालांकि, अगर उसका यह स्रोत खत्म होता है तो चीन तेल खरीदने के लिए पश्चिम एशिया का रुख कर सकता है, जो कि पहले से ही ईरानी हमलों के बाद से तेल उत्पादन में कमजोर हो गया है। यानी तेल के लिए पूरी दुनिया में मारामारी की स्थिति पैदा हो सकती है।
ईरान के जवाबी हमले का डर: ईरान ने स्पष्ट चेतावनी दी है कि अगर उसके ऊर्जा ठिकानों पर हमला किया गया, तो वह तुरंत इसके जवाब में पूरे खाड़ी क्षेत्र में अमेरिका और उसके सहयोगी देशों के ऊर्जा बुनियादी ढांचे को निशाना बनाएगा। चूंकि, सऊदी अरब, कतर, कुवैत, बहरीन, आदि देश मुख्यतः ऊर्जा निर्यात पर आधारित अर्थव्यवस्था हैं, ऐसे में ईरान का कोई भी बड़ा हमला, इनकी आर्थिक स्थिति को डंवाडोल करने की क्षमता रखता है।
अमेरिका की घरेलू राजनीति पर असर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर भारी राजनीतिक दबाव है। ऐसे में तेल की कीमतों में कोई भी बड़ा उछाल और इसके चलते बढ़ने वाली महंगाई और सप्लाई चेन में कमजोरी उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
अमेरिका की घरेलू राजनीति पर असर: अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप पर अमेरिका में आगामी मध्यावधि चुनावों से पहले ईंधन की बढ़ती कीमतों को लेकर भारी राजनीतिक दबाव है। ऐसे में तेल की कीमतों में कोई भी बड़ा उछाल और इसके चलते बढ़ने वाली महंगाई और सप्लाई चेन में कमजोरी उनके लिए राजनीतिक रूप से नुकसानदायक हो सकती है।
जमीनी सेना उतारने का जोखिम: हालिया समय में ऐसी भी रिपोर्ट्स आई हैं, जिनमें कहा गया है कि डोनाल्ड ट्रंप इस द्वीप पर कब्जा करने के लिए सैनिकों को उतार सकते हैं। हालांकि, सैन्य विश्लेषकों का कहना है कि इस द्वीप पर सुरक्षित तरीके से कब्जा करना मुश्किल है, क्योंकि अमेरिकी सेना का मुकाबला ईरानी सेना से सीधे तौर पर होगा। इस तरह आमने-सामने के सैन्य युद्ध को शुरू करने से अमेरिकी प्रशासन फिलहाल हिचकिचा रहा है। खासकर पश्चिम एशिया में उसके पुराने अभियानों को देखते हुए।
यूरेशिया ग्रुप के विश्लेषक और व्हाइट हाउस सिचुएशन रूम के पूर्व प्रमुख मार्क गुस्टाफसन ने चेतावनी दी कि इस द्वीप को कब्ज़े में लेने से अमेरिकी सैनिक कई हफ्तों तक ईरानी ड्रोन के निशाने पर रहेंगे और यह भी हो सकता है कि तेहरान द्वीप को आपूर्ति करने वाली पाइपलाइनों को खुद ही तबाह कर दे।
भविष्य की ईरानी सरकार के लिए चिंता: कई ऊर्जा विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का मानना है कि अगर खर्ग द्वीप के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर दिया गया, तो ईरान की तेल निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था लंबे समय के लिए बर्बाद हो जाएगी। ऐसे में युद्ध के बाद अगर मौजूदा शासन गिर भी जाता है, तो भविष्य में आने वाली किसी नई सरकार के पास देश का पुनर्निर्माण करने और अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिए कोई आर्थिक स्रोत नहीं बचेगा। अमेरिका फिलहाल ईरान में शासन बदलने का लक्ष्य तो रख रहा है लेकिन वह देश के तेल भंडारों को खत्म करने का जोखिम नहीं लेना चाहता।
भविष्य की ईरानी सरकार के लिए चिंता: कई ऊर्जा विशेषज्ञों और नीति-निर्माताओं का मानना है कि अगर खर्ग द्वीप के बुनियादी ढांचे को पूरी तरह तबाह कर दिया गया, तो ईरान की तेल निर्यात आधारित अर्थव्यवस्था लंबे समय के लिए बर्बाद हो जाएगी। ऐसे में युद्ध के बाद अगर मौजूदा शासन गिर भी जाता है, तो भविष्य में आने वाली किसी नई सरकार के पास देश का पुनर्निर्माण करने और अर्थव्यवस्था को फिर से खड़ा करने के लिए कोई आर्थिक स्रोत नहीं बचेगा। अमेरिका फिलहाल ईरान में शासन बदलने का लक्ष्य तो रख रहा है लेकिन वह देश के तेल भंडारों को खत्म करने का जोखिम नहीं लेना चाहता।
द अटलांटिक पत्रिका में एक अरब अधिकारी ने इस मुद्दे की संवेदनशीलता पर टिप्पणी करते हुए कहा कि राष्ट्रपति ट्रंप समझते हैं कि यह मुद्दा कितना विस्फोटक है। यह वेनेजुएला से कहीं बड़ा है। इसी वजह से अमेरिकी अधिकारियों ने खुले तौर पर तेल के बजाय केवल सैन्य ठिकानों पर ध्यान केंद्रित करने की सलाह दी है। इन्हीं भारी जोखिमों और इसके गंभीर वैश्विक परिणामों के डर के चलते ही अमेरिका खर्ग द्वीप को एक रेड लाइन मानता आया है। इसके साथ ही वह इस्राइल को भी इस द्वीप पर हमला करने से रोकता रहा है।
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