Explainer: ईरान ने परमाणु ठिकाना बदला, US ने सऊदी के साथ की न्यूक्लियर डील, क्या खाड़ी में अब परमाणु युद्ध तय?
अमेरिका से युद्ध के बीच ईरान ने अपनी परमाणु संवर्धन योजना में क्या बदलाव किया है और यह इस वक्त क्यों किया गया है? क्या ईरानी सुरक्षाबल अमेरिका से संघर्ष की अपनी नीति बदलने की तैयारी कर रहे हैं? इसके अलावा अमेरिका की तरफ से हाल ही में सऊदी से जो परमाणु समझौता किया गया है, उसका सार क्या है? क्या इससे पश्चिम एशिया में शक्ति का संतुलन बदलने की कोशिश की जा रही है?
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विस्तार
इस बीच सामने आया है कि ईरान ने अपने परमाणु संवर्धन कार्यक्रम को पूर्व के ठिकानों से हटाकर एक नई पहाड़ी शृंखला पिकैक्स में शिफ्ट कर दिया है। खबर है कि ईरान रेवोल्यूशनरी गार्ड कोर (आईआरजीसी) ने कुछ परमाणु ठिकानों में मौजूद परमाणु संवर्धन के लिए जरूरी सेंट्रीफ्यूजेस को इस पहाड़ी में पहुंचा दिया है। इसके अलावा एक और खबर ने पूरी दुनिया को चौंकाया है। यह खबर है अमेरिका के अचानक सऊदी अरब से परमाणु संवर्धन के समझौते को उच्चस्तरीय मंजूरी देने की। कई विशेषज्ञों ने इस बात पर चिंता जताई है कि जो अमेरिका पहले ईरान को परमाणु संवर्धन से रोक रहा था, वही अब पश्चिम एशिया में एक और देश की परमाणु संवर्धन में मदद करने जा रहा है।
पहले जानें- क्या है परमाणु कार्यक्रम को लेकर ईरान की बदली हुई योजना?
1. ईरान ने बदला परमाणु संवर्धन केंद्र का ठिकानाईरान ने अमेरिका-इस्राइल के पिछले हमलों के बाद नतांज के पास पिकैक्स पहाड़ी क्षेत्र में एक नया और अत्यधिक गहरा भूमिगत परमाणु केंद्र बनाना शुरू किया है। यह कदम उसके परमाणु बुनियादी ढांचे को नष्ट होने से बचाने की रणनीति का हिस्सा है, क्योंकि यह नई सुविधा जमीन के 80 से 100 मीटर (या उससे भी ज्यादा) नीचे मौजूद है।
इसके पीछे एक बड़ी वजह यह है कि ईरान के पिछले सेंट्रीफ्यूज कार्यक्रम को अमेरिकी-इस्राइली हमलों में जबरदस्त नुकसान हुआ था। इसके बाद से ही ईरान ने बड़े पैमाने पर कोई असेंबली प्लांट बनाने को लेकर स्थिति साफ नहीं की। हालांकि, यह माना जा रहा है कि वह परमाणु हथियार कार्यक्रम के लिए एक छोटी सेंट्रीफ्यूज असेंबली सुविधा स्थापित कर सकता है।
2. संवर्धन के स्तर की जानकारी देना भी बंद
ईरान की ओर से परमाणु संवर्धन के स्तर को लेकर भी स्थिति में बदलाव देखा गया है। एक पूर्ण परमाणु बम बनाने के लिए ईरान को यूरेनियम को 90% की शुद्धता तक संवर्धित करना होगा। 2025 में हुए हमलों से पहले ईरान ने 60% (हथियारों के स्तर के करीब) तक यूरेनियम संवर्धित कर लिया था, लेकिन हमलों के बाद से उसने संवर्धन फिर से शुरू नहीं किया। हालांकि, उसके बाद से संवर्धन फिर से शुरू होने की कोई जानकारी नहीं है और माना जाता है कि उनका भंडार अभी भी बमबारी वाले स्थलों पर ही है, जिसे वह चुपके से निकालने की कोशिश में है।
नीतिगत स्तर पर भी ईरान के रुख में बदलाव के संकेत मिले हैं। जहां पहले दिवंगत सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई ने परमाणु हथियारों को गैर-इस्लामी बताते हुए एक फतवा (धार्मिक आदेश) जारी किया था, वहीं हाल के युद्धों से पहले ईरानी अधिकारियों ने परमाणु बम बनाने की धमकियां लगातार तेज कर दी थीं। हालांकि, ईरान के नए सर्वोच्च नेता मोजतबा खामेनेई ने अभी तक परमाणु बमों के निर्माण को लेकर कोई बयान जारी नहीं किया है और न ही इससे जुड़ी धमकियां दी हैं। इसके चलते ईरान की भावी परमाणु योजनाएं अस्पष्ट बनी हुई हैं।
क्या परमाणु हथियार बनाने की तैयारी कर रहा ईरान?
ईरान ने अपने परमाणु संवर्धन और सेंट्रीफ्यूज निर्माण का ठिकाना मुख्य रूप से अपने परमाणु बुनियादी ढांचे को लगातार हो रहे सैन्य हमलों और तोड़फोड़ से बचाने के लिए बदला है। इंस्टीट्यूट फॉर साइंस एंड इंटरनेशनल सिक्योरिटी (आईएसआईएस) ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि पिकैक्स पहाड़ी पर स्थित केंद्र अभी पूरी तरह से चालू नहीं है, लेकिन अगर ईरान अपनी नष्ट हो चुकी सेंट्रीफ्यूज निर्माण क्षमता को दोबारा विकसित करता है, तो वह यहां एक छोटी सेंट्रीफ्यूज असेंबली सुविधा स्थापित कर संभावित रूप से परमाणु हथियार कार्यक्रम को बढ़ाया जा सकता है।
क्यों हुआ ईरान की परमाणु नीति में बदलाव?
पिछले हमलों में हुआ भारी नुकसान: 2025 में हुए 12-दिन के युद्ध, जिसे 'ऑपरेशन मिडनाइट हैमर' नाम दिया गया, के दौरान अमेरिका और इस्राइल ने ईरान के तीन प्रमुख परमाणु केंद्रों नतांज, इस्फहान और फोर्डो पर बमबारी की थी। खासकर से नतांज में हुए एक हमले, जिसका आरोप इस्राइल पर लगा, में ईरान का सेंट्रीफ्यूज निर्माण स्थल तबाह हो गया था। इसके बाद ईरानी अधिकारियों ने एक नई और सुरक्षित जगह बनाने का काम शुरू किया।सुरक्षित और गहरी जगह की जरूरत: हवाई हमलों से बचने के लिए ईरान ने पिकैक्स माउंटेन नाम की एक नई जगह चुनी है, जो नतांज के ठीक दक्षिण में स्थित है। यह नया ठिकाना पहाड़ के नीचे 80 से 100 मीटर या उससे भी ज्यादा की गहराई में बनाए जाने की बात सामने आई है। इतनी गहराई इसे हवाई हमलों और यहां तक कि अमेरिका के सबसे शक्तिशाली बंकर-बस्टर बमों (जैसे जीबीयू-57) से भी सुरक्षा दे सकता है।
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अब जानें- अमेरिका-सऊदी के बीच परमाणु क्षेत्र में क्या समझौता हुआ?
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच 30-वर्षीय ऐतिहासिक नागरिक परमाणु समझौता हुआ है, जिसे अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने हाल ही में मंजूरी दी है। इसे अब अमेरिकी संसद (कांग्रेस) को अंतिम समीक्षा के लिए भेजा जाएगा, जिसके बाद सऊदी अरब में अमेरिका परमाणु इन्फ्रास्ट्रक्चर खड़ा करने और रिएक्टरों (जैसे एपी1000) के निर्माण में अग्रणी भूमिका निभाएगा। इसके अलावा वह यूरेनियम संवर्धन की कवायद शुरू कर सकता है। यह समझौता एक ऐसे बेहद संवेदनशील समय में हुआ है जब अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर उसके साथ सीधे सैन्य संघर्ष में उलझा हुआ है। इस समझौते का मकसद सऊदी अरब में स्वच्छ ऊर्जा और आर्थिक सहयोग को बढ़ावा देना बताया गया है, लेकिन इसके कुछ रणनीतिक प्रावधानों ने वैश्विक स्तर पर बहस छेड़ दी है।इस समझौते के तहत अमेरिकी कंपनियों, जैसे वेस्टिंगहाउस इलेक्ट्रिक को सऊदी अरब के नागरिक परमाणु बुनियादी ढांचे और रिएक्टरों के निर्माण का जिम्मा मिलेगा, जो संभवतः अरबों डॉलर का प्रोजेक्ट होगा। इससे अमेरिकी परमाणु उद्योग को पुनर्जीवित करने में मदद मिलेगी। सऊदी अरब का उद्देश्य अपनी बढ़ती घरेलू बिजली की मांग को पूरा करना और बिजली उत्पादन में इस्तेमाल होने वाले कच्चे तेल को बचाकर उसका निर्यात बढ़ाना है।
क्या ईरान का सामना करने के लिए सऊदी को तैयार कर रहा अमेरिका?
अमेरिका और सऊदी अरब के बीच हुआ परमाणु समझौता आधिकारिक तौर पर स्वच्छ ऊर्जा और आर्थिक सहयोग के लिए है, लेकिन कूटनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से इसे ईरान के खिलाफ सऊदी अरब की स्थिति मजबूत करने के कदम के रूप में भी देखा जा रहा है।
ईरान के परमाणु हथियार बनाने की कोशिश का जवाब: सऊदी क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने 2018 में स्पष्ट रूप से चेतावनी दी थी कि अगर ईरान परमाणु हथियार विकसित करता है, तो सऊदी अरब भी परमाणु हथियार हासिल करने का प्रयास करेगा। यह समझौता, जिसमें संभावित रूप से सऊदी अरब की धरती पर यूरेनियम संवर्धन की इजाजत शामिल है, सऊदी अरब को भविष्य में छिपी हुई परमाणु हथियार क्षमता हासिल करने का मौका देता है।
निगरानी और शर्तों में ढील: यह सौदा अमेरिकी कूटनीति के पारंपरिक गोल्ड स्टैंडर्ड यानी उच्च मानक और निगरानी वाले समझौतों से अलग है। इसमें आमतौर पर भागीदार देशों (जैसे यूएई) को अपने देश में यूरेनियम संवर्धन न करने की शर्त माननी होती है। हालांकि, सऊदी अरब को इससे छूट दी गई है। इसके अलावा, सऊदी अरब ने अंतरराष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (आईएईए) के कड़े निरीक्षण वाले अतिरिक्त प्रोटोकॉल को भी अस्वीकार कर दिया है। इसकी जगह अमेरिका-सऊदी द्विपक्षीय निगरानी व्यवस्था लागू होगी। यानी सऊदी के परमाणु संवर्धन या परमाणु हथियार बनाने की जानकारी का खुलासा भी नहीं हो सकेगा।
क्यों अमेरिका-सऊदी अरब के समझौते पर जताई जा रही चिंता?
1. युद्ध के समय की तैयारीयह ऐतिहासिक समझौता ऐसे समय में हुआ है जब अमेरिका सीधे तौर पर ईरान के परमाणु बुनियादी ढांचे को नष्ट करने के लिए सैन्य हमलों में उलझा हुआ है। एक तरफ अमेरिका ईरान के परमाणु कार्यक्रम को खत्म करना चाहता है, वहीं दूसरी तरफ वह सऊदी अरब को परमाणु तकनीक दे रहा है, जिसे कई विशेषज्ञ विरोधाभासी मानते हैं।
2. हथियारों की नई होड़ का खतरा
विशेषज्ञों और अमेरिकी सांसदों को इस बात की गहरी चिंता है कि सऊदी अरब को घरेलू स्तर पर यूरेनियम संवर्धित करने की छूट देने से पश्चिम एशिया में ईरान, इस्राइल और खाड़ी देशों के बीच एक नई परमाणु प्रतिस्पर्धा शुरू हो सकती है।
3. पाकिस्तान का 'परमाणु कवच'
कूटनीतिक मोर्चे पर सऊदी अरब ने परमाणु-हथियार संपन्न पाकिस्तान के साथ एक पारस्परिक रक्षा समझौता पहले भी किया है। पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ने यहां तक कहा है कि जरूरत पड़ने पर उनका परमाणु कार्यक्रम सऊदी अरब के लिए उपलब्ध कराया जाएगा, जिसे क्षेत्र में एक कड़ी चेतावनी के रूप में देखा जा रहा है।
ईरान के अलावा अमेरिका की एक बड़ी रणनीतिक मंशा यह भी है कि इस समझौते के जरिए वह सऊदी अरब के परमाणु विकास को अपनी निगरानी और नियंत्रण में रखे। ट्रंप प्रशासन का मानना है कि ऐसा करने से रूस या चीन को सऊदी अरब में अपना भू-राजनीतिक प्रभाव बढ़ाने का मौका नहीं मिलेगा।
अमेरिका का दावा है कि यह समझौता पूरी तरह से शांतिपूर्ण और कड़े अमेरिकी नियंत्रण में है, लेकिन यूरेनियम संवर्धन की संभावित इजाजत और ताजा युद्ध के हालात स्पष्ट रूप से इस ओर इशारा करते हैं कि यह समझौता सऊदी अरब को ईरान के बढ़ते परमाणु प्रभाव के खिलाफ एक मजबूत रणनीतिक विकल्प प्रदान कर रहा है।