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ईरान के अस्पताल बने निगरानी केंद्र?: एजेंटों पर घायलों के इलाज में दखल के आरोप, डॉक्टरों ने सुनाई आपबीती

वर्ल्ड डेस्क, अमर उजाला, बेरूत। Published by: Nirmal Kant Updated Fri, 27 Feb 2026 03:54 PM IST
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सार

सरकार विरोधी प्रदर्शनों के दौरान ईरान के कई अस्पतालों से चौंकाने वाली खबरें सामने आई हैं। आरोप है कि घायल प्रदर्शनकारियों का इलाज करने से डॉक्टरों को रोका गया, कुछ मरीजों को अस्पताल से ही हिरासत में ले लिया गया। डॉक्टरों ने क्या बताया, पढ़ें रिपोर्ट-

Iranian agents obstructed care at hospitals packed with wounded protesters
ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन - फोटो : एएनआई/रॉयटर्स
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विस्तार

पिछले महीने सरकार विरोधी प्रदर्शनों पर कार्रवाई के दौरान जब बड़ी संख्या में घायल प्रदर्शनकारी ईरान के एक अस्पताल में लाए गए, तो एक युवा डॉक्टर आपात कक्ष की ओर दौड़ा। वह करीब 40 साल के एक व्यक्ति का इलाज करना चाहता था। उस व्यक्ति के सिर में बहुत नजदीक से गोली मारी गई थी। डॉक्टर और अन्य कर्मियों ने उसे बचाने की कोशिश की। तभी सादे कपड़ों में हथियारबंद सुरक्षाकर्मी वहां आ गए। उन्होंने डॉक्टरों को रोक दिया। कुछ को अपनी बंदूकों से धक्का दिया। उस डॉक्टर ने समाचार एजेंसी एसोसिएटेड प्रेस को यह बात बताई।
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उत्तरी शहर रश्त के डॉक्टर ने कहा, उन्होंने मुझे घेर लिया। हमें आगे बढ़ने नहीं दिया। कुछ ही मिनट बाद उस व्यक्ति की मौत हो गई। सुरक्षाकर्मियों ने उसका शव काले बैग में रखा। फिर अन्य शवों के साथ उसे एक वैन में डालकर ले गए। 
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यह कोई अकेली घटना नहीं थी। जनवरी की शुरुआत में कुछ दिनों तक कई शहरों के अस्पतालों में ऐसा ही हुआ। ईरानी सुरक्षाबलों ने भीड़ पर गोली चलाई थी। ये प्रदर्शन 47 साल पुराने इस्लामी गणराज्य के खिलाफ थे। हजारों लोग घायल हुए। सादे कपड़ों में एजेंट अस्पतालों में फैल गए। वे इलाज पर नजर रखते थे। कई बार इलाज रोकते थे। कर्मचारियों को डराते थे। प्रदर्शनकारियों को पकड़ लेते थे। शवों को बैग में डालकर ले जाते थे।दर्जनों डॉक्टरों को गिरफ्तार किया गया।

यह रिपोर्ट एसोसिएटेड प्रेस की जांच पर आधारित है। ईरान के तीन डॉक्टरों से बात की गई। विदेश में रह रहे छह ईरानी चिकित्सा विशेषज्ञों से भी बात हुई। ये लोग देश के अंदर के डॉक्टरों से संपर्क में हैं। मानवाधिकार समूहों की रिपोर्ट देखी गई। सोशल मीडिया के एक दर्जन से ज्यादा वीडियो की जांच की गई। ईरान के अंदर के सभी डॉक्टरों ने अपना नाम न छापने की शर्त रखी, क्योंकि उन्हें बदले की कार्रवाई का डर था।

समाचार एजेंसी ने बर्लिन स्थित संगठन म्नेमोनिक के साथ काम किया। इस संगठन ने अस्पतालों में हिंसा से जुड़े ऑनलाइन वीडियो और सामग्री की पहचान की। ईरान और विदेश के डॉक्टरों ने कहा कि अस्पतालों में इस स्तर की हिंसा पहले कभी नहीं देखी गई। ईरान में दशकों से विरोध पर कार्रवाई होती रही है। सार्वजनिक संस्थानों पर निगरानी भी रहती है। लेकिन अस्पतालों का इस तरह सैन्यीकरण अभूतपूर्व है।

उत्तरी शहर गोरगान में एक अस्पताल की छत पर स्नाइपर तैनात थे। चश्मदीद के अनुसार, वे अस्पताल की ओर आ रहे मरीजों पर गोली चला रहे थे। यह जानकारी अमेरिका स्थित ईरानी स्वास्थ्य पेशेवरों के संघ आईआईपीएचए ने दी।

ओस्लो स्थित ईरान मानवाधिकार केंद्र ने अस्पतालों के अंदर की कई घटनाएं दर्ज कीं। उसके अनुसार सुरक्षाकर्मियों ने इलाज रोका। मरीजों को वेंटिलेटर से हटाया। डॉक्टरों को परेशान किया। प्रदर्शनकारियों को हिरासत में लिया। इस संगठन के संस्थापक अमिरी-मोघद्दम ने कहा, यह व्यवस्थित है। ऐसा पैटर्न पहले नहीं देखा गया। 

सरकार का क्या पक्ष है?
  • सरकार ने कहा कि ये प्रदर्शन विदेश समर्थित हथियारबंद आतंकियों की वजह से थे।
  • स्वास्थ्य मंत्रालय के प्रवक्ता हुसैन केरमनपुर ने इलाज रोके जाने की खबरों को गलत बताया।
  • उन्होंने कहा, यह 'सच नहीं' है और असंभव है। सभी घायलों का इलाज बिना किसी भेदभाव के किया गया।

संयुक्त राष्ट्र में ईरान के मिशन ने डॉक्टरों के आरोपों पर तुरंत कोई जवाब नहीं दिया। जनवरी 8 और 9 को कार्रवाई अपने चरम पर थी। 1979 में इस्लामी गणराज्य के सत्ता में आने के बाद यह सबसे दमनकारी कार्रवाई थी। इंटरनेट प्रतिबंधों के कारण पूरी जानकारी सामने आने में देरी हुई।

विरोध प्रदर्शनों के दौरान कितने लोगों की मौत हुई?
ह्यूमन राइट्स एक्टिविस्ट्स न्यूज एजेंसी ने कहा कि उसने सात हजार से ज्यादा मौतों की पुष्टि की है। हजारों मामलों की जांच जारी है। सरकार ने 3,000 से ज्यादा लोगों की मौत होने की बात मानी है। लेकिन पहले भी मौतों की संख्या कम बताने के आरोप लगे हैं।

डॉक्टर ने सुनाई आपबीती
रश्त के डॉक्टर ने बताया कि उन्होंने 66 घंटे लगातार काम किया। वह एक दिन ट्रॉमा केंद्र में रहे। फिर एक अस्पताल में। फिर एक निजी क्लिनिक में। 8 जनवरी को हर 15 से 30 मिनट में आपात वार्ड खाली होता था। फिर नए मरीज आ जाते थे। 9 जनवरी को हालात और बिगड़ गए। ज्यादा लोग असली गोलियों से घायल हुए। सुरक्षाकर्मी और आक्रामक हो गए।

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उन्होंने बताया, वे घायल प्रदर्शनकारियों को लाते थे। इलाज के दौरान खड़े रहते थे। वार्ड में घुस जाते थे। स्वचालित राइफल लिए रहते थे। स्टाफ को धमकाते थे। मरीजों की वीडियो बनाते थे। कागजात की जांच करते थे। डिस्चार्ज के समय अगर कोई प्रदर्शनकारी साबित होता तो उसे ले जाते थे। एक बार वे एक मृत व्यक्ति का शव लाए। उसके हाथ आगे से बंधे थे। पेट और सीने में छर्रे थे। सिर में गोली का घाव था। डॉक्टर ने उसे पहचान लिया। कुछ देर पहले उसका परिवार उसकी फोटो दिखाकर पूछ रहा था कि क्या वह भर्ती है।

एमनेस्टी इंटरनेशनल ने क्या कहा?
एमनेस्टी इंटरनेशनल ने कहा कि प्रदर्शनकारियों को नजदीक से निशाना बनाकर गोली मारी गई और यह पहले की तुलना में कहीं बड़े स्तर पर हुआ। दो वीडियो में नजदीक से गोली लगे शव दिखे। उनसे चिकित्सा उपकरण जुड़े थे। डॉक्टरों ने घायलों को बचाने के लिए रिकॉर्ड में गलत बीमारी लिखी। पेट की गोली को साधारण पेट दर्द लिखा। टूटी हड्डी को गिरने से चोट बताया। जननांग में गोली लगे मरीज को मूत्र रोगी बताया। डॉक्टर ने कहा, हमें पता था कि अस्पताल से बाहर निकलते ही वे सुरक्षित नहीं रहेंगे।




 
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